संदेश

2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अविवाहित मित्रों के नाम खुले ख़त...

चित्र
       मेरे प्यारे अविवाहित मित्रों,                         स्नेहपूर्ण अभिनंदन ! सोचा एक ख़त लिखूं  आपको...यह पत्र उन सभी अविवाहित मित्रों को समर्पित जिनको अपने लिए किसी जीवन संगिनी की तलाश है... जीवन संगिनी...हमसफ़र... जिसके साथ ज़िन्दगी के सुख- दुःख बाँटें जाए, जिस अजनबी के साथ जीवन को और बेहतर तरीके से जीने के सुनहरे सपने आप बुन रहे हैं...उनका चयन बहुत ही सावधानीपूर्वक करना निहायत ही जरूरी है...जी,मैं चयन की बात कर रहा हूँ क्योंकि विवाह निश्चित तौर पर आपका चुनाव है... तो सवाल उठता है,कि आख़िर कैसी हो आपकी जीवनसंगिनी ? क्या हो उसके मौलिक गुण ?  देखिये, भाईयों... विवाह करने का यदि आपने फैसला कर ही लिया है तो मेरा विनम्र आग्रह होगा कि आपको सबसे पहले खुद से ही यह सवाल करना चाहिए कि "आख़िर आपको क्यों करना है विवाह ? " थोड़ा अज़ीब लग रहा होगा आपको...क्यों करना है ? ये भी कोई सवाल है...सब करते हैं...कोई सोचता थोड़ी, कि क्यों करना है ! जी, यही तो विडम्बना है कि लोग एक छोटी सी खर्च के पहले सौ मर्तबा...

गांधी जी का चौथा बन्दर !

चित्र
गांधी जी का चौथा बंदर ! नमस्ते दोस्तो ! आज मैं अपने आलेख के साथ आपके साथ जुड़ा हूँ...शीषर्क और तस्वीर देखकर शायद कुछ न कुछ आपने अनुमान लगा ही लिया होगा...जी हाँ.. आप बिल्कुल सही सोच रहे, मैं 21वीं सदी के सबसे अनोखे बन्दर.. "गांधी जी का चौथा बन्दर" की बात कर रहा... बड़ा अनोखा है ये बन्दर...और सबसे खास बात, ये आपको आज कल हर चौक,चौराहे पर,  बस के इंतेज़ार में खड़े,ट्रैन के इंतेज़ार में बैठे...कभी-कभी तो खाते वक़्त, टीवी देखते वक़्त...क्लास रूम में पीछे की सीट पर बैठे बच्चों के हाथों में...कईयों को तो अब शौच करते वक़्त भी ऐसी स्थिति में पाया गया है... जी, हां...  इस छोटी सी मायावी मशीन ने हमें सच में  गांधी जी का चौथा बन्दर बना दिया है...इस छः इंच के मायावी यंत्र ने मनुष्य को दुनिया से कितना जोड़ा है पता नहीं...मगर, इसकी वजह से मनुष्य खुद से तो कोसो दूर हो गया है...अपनों से कोसो दूर हो गया है... अब वो बचपन की खिलखिलाती हँसी... छोटी उम्र में किताबों से दिल्लगी...परिवार के साथ की वो गप्पें...दादी नानी की कहानियां...सब कुछ को बड़े ही आहिस्ते आहिस्ते...इस मायावी यंत्र ने छीन लि...

ये खिलाड़ी गेंद नहीं, गेंदबाज़ के दिमाग से खेलता !

चित्र
अनन्त आकाश की अनन्त गहराईयों में सूर्य सा चमकने वाले SKY को नमन ! यह न तो सचिन की तरह शानदार स्ट्रैट ड्राइव लगाता और न ही कोहली की तरह बेहतरीन कवर ड्राइव...न ही युवराज की पैरों पर बैठकर गगनचुम्बी छक्के...और न ही सहवाग की तरह कवर और पॉइंट के ऊपर से चौके...न लक्ष्मण की तरह कलामती कलाई है...और न ही गांगुली की तरह कदम बढ़ाकर चौके मारने का जिगरा.... इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो क्रिकेट बुक के क्रिकेटिंग शॉट के रूप में दर्ज है...लेकिन, फिर भी यह बल्लेबाज़ स्पेशल है...इसने अपने शॉट ईजाद किये हैं... "लीक-लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत... एकै लीके न चले...सुरमा...सिंह ...और सपूत" इस खिलाड़ी ने यह साबित कर दिया है कि बने बनाये रास्ते पर तो हर कोई चलता है,किन्तु जो सुरमा होते हैं वो अपने रास्ते खुद बनाते...यदि काबिलियत पर भरोसा हो तो दुनिया एक न एक दिन आपके कारनामे को चमत्कार मानती है, और चमत्कार को नमस्कार करती है... सूर्य कुमार यादव भारतीय क्रिकेट का वो उभरता हुआ सितारा है,जिसके बल्लेबाज़ी ने ये बतलाया है कि क्रिकेट सिर्फ़ शारीरिक खेल नहीं है...अच्छा बल्लेबाज़ बॉल को खेलता है,उसके मेर...

समान खेल, समान वेतन ! क्रिकेट के एक मैच खेलने का कितना फीस मिलता इनको ?

चित्र
BCCI ने भारतीय महिला क्रिकेट के बेहतरीन प्रदर्शन और बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इन्हें भी पुरुषों के बराबर फीस देने की बात कही है... दिखने में, ये बस एक साधारण सी खबर लग रही है...मगर, मुझे इस ख़बर में भारत के बदलते दौर की बानगी मिल रही है...21वीं सदी निःसन्देह भारत की सदी है,इस सदी में भारत विश्व गुरु बनेगा इसमें कोई दो मत नहीं है... मगर, सवाल उठता है कि इस विश्व गुरु के सपने को साकार करने में सबसे अहम भूमिका किनकी होगी ? मेरा सीधा और स्पष्ट जवाब होगा..."नारी शक्ति" पिछले कई सदियों से भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की सीधी भागीदारी नहीं हो रही थी, जो हिंदुस्तान की गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है...बदलते दौर में , महिलाओं की अर्थव्यवस्था में सीधी भागीदारी न सिर्फ आर्थिक रूप से भारत को मजबूत बनाएगा बल्कि साथ ही साथ इससे भारत समाजिक और राजनीतिक रूप से भी और मजबूत होगा... BCCI के द्वारा लिए इस फैसले के कई मायने हैं, इससे न सिर्फ़ लड़कियों का क्रिकेट के प्रति आकर्षण बढ़ेगा बल्कि साथ ही साथ अन्य खेल और संस्थानों पर भी "समान काम, समान वेतन" का दबाव बढ़ेगा.. आर...

वाह रे ! कोटा नगरी...सच में फैक्ट्री हो...फैक्ट्री...

चित्र
वाह रे ! कोटा नगरी...सच में, फैक्ट्री हो ...फैक्ट्री...  कोटा फैक्ट्री....जी, हां यह एक फैक्ट्री ही है जहां इंसानी बच्चें को मशीन बनाना जाता है...उसकी संवेदनाओ को मारकर, उसके भीतर के मनुष्यत्व को मारकर , उसके सपनों को मारकर, बस...एक प्रतिस्पर्धी बनाया जाता है... आपको लग रहा होगा, ऐसा क्या है इस तस्वीर में ?  यह एक सीलिंग फैन की तस्वीर है, जिसे एक जाली से ढक दिया गया है... आपके मन में सवाल आया होगा, आख़िर पंखे को जाली से ढंकने की क्या जरूरत ? जी हां,दोस्तों ...पंखे को जाली से ढका है ताकि कोई बच्चा जिसे मशीन बनाने की अंधी चाहत में उसके माता-पिता इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की माया नगरी में भेज देते हैं...और इस माया नगरी में प्रवेश के बाद बच्चा बच्चा नहीं रहता मशीन बन जाता है...उसे बड़े सलीके से मशीन बनाया जाता... अपने दिमाग पर पड़ने वाले दबाव से  परेशान होकर,जब वो अंधेरे कमरे में चीखता है तो उसकी चीख बाहर सुनाई  नहीं देती,वो भीतर ही भीतर घुट जाता है...   न वो चीख बच्चें के माता-पिता को ही सुनाई देती,जो छोटे शहर , गांव कस्बो...

ये हार बहुत कुछ सिखाती है !

चित्र
दो बार के विश्व विजेता वेस्टइंडीज विश्व कप से बाहर ! ज़िन्दगी हो या खेल यहां सिर्फ एक ही चीज़ निश्चित है,कि यहां कुछ भी निश्चित नहीं...                                 जीवन में निश्चितता,स्थायित्व के पीछे भाग रही युवा पीढ़ी को इस घटना से सीखना चाहिए कि आप कभी भी अर्श से फ़र्श  पर गिर सकते या फर्श से अर्श पर पहुंच सकते...  दो बार की विश्व विजेता टीम भी आयरलैंड जैसी छोटी टीम से हारकर विश्व कप प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती है...और हम यहां भविष्य की कोरी कल्पना में अपने आज को गवां रहे...स्थायित्व की चाह की वजह से ही यहां कई प्रतिभाएं खो जाती है...आज जो खुद को सिकन्दर मान रहे उन्हें इस अहम से बचना चाहिए और जो हताश हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता उन्हें बस लगे रहना चाहिए...क्योंकि  जीवन मे कुछ भी स्थायी नहीं... न खुशी, न ग़म ...न प्रसिद्धि न गुमनामी... तो आख़िर क्या है जीवन ? जीवन एक गूढ़ रहस्य है, जीवन सत्य है...जीवन अद्भुत है, विलक्षण है...जीवन सृष्टि और स्रष्टा का एकाकार होना है... तो क्या हो जीवन...

क्या भारत पाकिस्तान से भी ज्यादा भूखा है ?

चित्र
प्रश्न :- क्या हिंदुस्तान अपने पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा भूखा है ?  मेरा उत्तर :- बिल्कुल नहीं.... अगला प्रश्न :- तो क्या ये आंकड़े झूठे हैं ? मेरा उत्तर :- बिल्कुल,आंकड़े के लिए प्रयोग किया गया पैमाना अनुचित है... 2022 में जारी इस सूचकांक में भारत 107वें स्थान पर, वहीं पाकिस्तान 99वां, बंगलादेश 84 वें, नेपाल 81वें स्थान पर है... यूरोपियन एजेंसियों के द्वारा इस सूचकांक के लिए चार पैमानों का निर्धारण किया गया है :- 1.अल्पपोषण - उम्र के हिसाब से वजन का कम होना 2.चाइल्ड वेस्टिंग -  पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों का कद (लम्बाई) के हिसाब से वजन का कम होना 3.स्टंटिंग :- उम्र के हिसाब से कद का कम होना 4. पांच वर्षों से कम के बच्चों का मृत्यु दर इन चार पैमानों में दो पैमानें चाइल्ड वेस्टिंग और स्टंटिंग को सार्वभौमिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि लम्बाई और वजन सिर्फ भोजन पर निर्भर नहीं करते, ये मूलतः क्षेत्रीयता, भौगोलिक जलवायु और अनुवांशिकता पर भी निर्भर करते हैं... अतः, इस सूचक के पैमाने सार्वभौमिक नहीं होने के कारण इसे एक आदर्श सूचक नहीं माना जा सकता... प्रभाकर कुमार 'म...

अब वो चिट्ठी नहीं आती !

चित्र
अब चिट्ठी नहीं आती.... वो भी क्या दिन थे,जब चिट्ठी आया करती थी...अपने साथ संवेदना भरी सन्देशा लाया करती थी...चिट्ठी जिसमें संलिप्त होते थे पिताजी की डांट,माँ की दुलार,बहन का स्नेह,भाई की परवाह.... "आज फोन पर बातें तो होती है हज़ार...मगर वो प्यार नहीं...चिट्ठी के लिए बेसब्री भरा वो इंतज़ार नहीं....शब्दों का जादुई संसार नहीं...संवेदना भरी पुकार नहीं...." आधुनिकता की दौर में यक़ीनन हमनें बहुत कुछ खोया है, करीब आने की जद्दोजहद में न चाहकर भी दूर हो गए हैं हम...फोन पर की गई घण्टों बातें बेफिजूल लग रही है, वो चिट्ठी दौर ही कितना प्यारा था, कितनी बेसब्री होती थी... बॉर्डर से सब सैनिक का ख़त उसके घर आता होगा तो कितनी सहजता से छलक पड़ते होंगे आंसू...कितनी मासूमियत से संस्कार भरे शब्दों के आवरण में पूछता होगा वो अपनी पत्नी का हाल... जब एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को लिखता होगा पहला ख़त तो कितनी संवेदना होगी उसमें, वो झिझक...वो डर...वो प्रेम का इजहार...वो बातें...वो मुलाकातें...और न जाने क्या-क्या ? सच में, आज चिट्ठी नहीं आती... डिजिटल दौर में वीडियो कॉल पर की गई बात में भी वो एहसास न...

इन्तेहाँ हो गयी थी इंतेज़ार की !

चित्र
इन्तेहाँ हो गई थी...इंतेज़ार की... 1021 दिनों के बाद किंग कोहली के बल्ले से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में शतक आया...एक ऐसा बल्लेबाज जिसके बल्ले से हर साल करीब 10 शतक आ रहे हो, जो 70 शतक के आंकड़े को ऐसे छू लिया था,जैसे उसका बल्ला नहीं कोई रन मशीन हो...क्रिकेट के हर शॉट में ऐसा क्लासिक अंदाज़ जिसे देखकर दुश्मन भी वाह-वाह कर उठे... इन आँखों को आप गौर से देखें...कितनी मासूमियत है...एक अजीब सी ख़ुशी, जो छलक पड़ रही है... मैं तो उनके जीवन की ये 1021 बीती रातें का अनुमान लगा रहा, हर वो रात...जब विराट खुद के बेहद करीब होते होंगे... रात का वो पहर जब नींद न आती और उठने का मन भी नहीं करता होगा...उस वक़्त रोज क्या सोचते होंगे वो ?  आख़िर अगला शतक कब ? आज उनकी आंखों से छलकते खुशी के आँसू...साफ बयां कर रहे थे कि ये शतक उनके लिए कितना मायने रखता है...वो बच्चों की तरह मासूमियत से मुस्कुराना,अपने लॉकेट को चूमना..हेलमेट को खोलकर बल्ले को उठाना... ये देखकर मुझे बस...यही चार पंक्तियाँ याद आ गई... "रख हौसला वो मंज़र भी आएगा, प्यासे के पास चलकर खुद समंदर भी आएगा... थक कर यूँ न बैठ, मंजिल के मुसाफ़िर, ...

स्पोर्ट्स फीस के नाम पर लूट !

चित्र
स्पोर्ट्स फीस के नाम पर लूट ! जी, हां दोस्तों...विद्यालय सरकारी हो या प्राइवेट बड़े पैमाने पर वहां खेल शुल्क के नाम पर वर्षों से लूट हो रही है..जिले के अधिकांश सरकारी और प्राइवेट स्कूल के पास खेल के मैदान तक नहीं हैं...खेल सामग्री के नाम पर वही टूटे फूटे 2 बैट, एक दो बैडमिंटन,एक फुटबॉल और कैरमबोर्ड... इलाके के 90% प्राइवेट और सरकारी स्कूल के पास खेल मैदान नहीं है... सरकारी विद्यालय में औसतन सभी बच्चों से लगभग 100 रुपये प्रति वर्ष खेल शुल्क लिया जा रहा और इसे संख्या से गुणा किया जाए तो कुल रकम लाखों में पहुंच जाती है...जिनसे 1-2 वर्षों में मैदान खरीदा जा सकता,उच्च स्तर के खेल संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते... वहीं प्राइवेट स्कूल में ये शुल्क 300 से 500 रुपये प्रतिवर्ष वसूला जा रहा, यदि विद्यार्थियों की कुल संख्या औसतन 800 मानी जाए तो ये आकंड़ा करीब 3 लाख सलाना हो जाता है और आश्चर्य की बात ये है कि इन स्कूलों में न ही खेल शिक्षक होते... न ही खेल के संसाधन...खेल के मैदान की बात ही क्या कहें ! मेरा अभिभावकों से नम्र निवेदन होगा कि अबकी जब आप पैरेंट टीचर मीटिंग में जाएं तो ये सवाल जरू...

राष्ट्रकवि को नमन !

चित्र
खड़ी हिंदी को साहित्य में प्रमाणिकता से दर्ज़ करवाने वाले राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन ! गुप्तजी ही वो साहित्यकार हैं जिन्होंने समाज मे उपेक्षित महिलाओं को उनके कर्म की पराकाष्ठा के लिए यथोचित स्थान दिलवाया...चाहे वो लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला हो या फिर महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा...                     इनके त्याग को भारतीय समाज की जनचेतना में आदर्श रूप में प्रस्तुत करने का सबसे प्रभावशाली कार्य गुप्त जी ने ही किया...इनकी स्पष्ट खड़ी बोली ने जिस तरह भारतीय संस्कृति के ध्वज को पूरे विश्व क्षितिज पर लहराने में सफलता पाई है,यकीनन..पूरा देश उनका ऋणी है !                                       जिस वक्त तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग पाश्चात्य संस्कृति को विकास का मापदंड मानने की भूल करने पर उतारू था,उस वक़्त इनकी खड़ी तीखी बोली ने भारतीय सनातन संस्कृति के आदर्शों को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया... "यह ठीक...

ऐसे मनाये 'कलम के सिपाही' का जन्मदिन !

चित्र
समाज की विषमताओं पर कलम से चोट का प्रहार करने वाले "कलम के सिपाही" का आज जन्मदिन  है...आज मुझे ज्वर से तड़पते एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा सामने दिख रहा जिसे परमात्मा ने जीवन के अंतिम दिनों में शारीरिक वेदना के गहरे आघात दिये... प्रेमचन्द्र की कलम समाज के चीखती पुकार को,अंतर्मन में उपजी पीड़ा को,परिवार के आंतरिक कलह को,अंग्रेजी शासन के शोषण को,बदलते वक्त की तस्वीर को जीवंतता के साथ पन्नो पर उकेरती है...                                           प्रेमचन्द्र के उपन्यास हो या फिर कहानियां...अपने आप में जीवन की समग्रता को समेटने का अद्भुत काबिलियत रखती है...                                            प्रेमचन्द्र हिंदी साहित्य से लोगो को जोड़कर रखने वाले एक गज़ब के कथानक थे...आज प्रेमचन्द्र की आत्मा खुद को न जाने क्यों कोसती होगी, हिंदी के गिरते स्तर,लेखको के व्यापारपने पर...

फ़र्श से अर्श तक का सफ़र

चित्र
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीवन्तता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कुछ नहीं हो सकता...जब समाज के सबसे निचले तबके से आने वाली एक महिला देश के शीर्ष पर पहुंचती है... लिंग व जाति के आधार पर भेदभाव करने के झूठे आरोप  लगाकर जिस पाश्चात्य संस्कृति ने हम भारतीयों को असभ्य कहने की जहमत उठायी थी,जिन्होंने अपने शोषण को हमें सभ्य बनाने के प्रयास के नाम दिए थे,उनके गालों पर तमाचा है यह...  भगवान जगन्नाथ की साधिका व राघवेंद्र राम सरकार को ध्येय-पथ सुझाने वाली हमारी माँ शबरी की वंशबेलि, आदरणीय  श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का देश के शीर्ष पद पर सुशोभित होना न सिर्फ भारतीय लोकतंत्र बल्कि हमारी सनातन संस्कृति के जीत का उत्सव है...और समाज के सबसे निचले स्तर के व्यक्ति को एक भरोसा कि लोकतंत्र में फ़र्श से अर्श तक का सफ़र किया जा सकता है... भारतीय गणतंत्र के राज-उपवन को यह पवित्र वनफूल मंगलकारी हो और पूरे विश्व में इसकी सुवास फैलती रहे... मुझे उम्मीद है देश की नवनिर्वाचित राष्ट्रपति देश की राजनीतिक पटल पर बिखरे और संकुचित विपक्ष की वजह से सत्ता के निरंकुश और असंवेदनशील होने की संभावना को ...

श्रीलंका से मैंने क्या सीखा ?

चित्र
जनता के हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है... जनता जिधर चाहती है,काल उधर ही मुड़ती है... बीता गवाक्ष अम्बर दहके जाते हैं, दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो.... सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...  श्रीलंका के इस हाल की पटकथा किसी एक दिन में नहीं लिखी गयी है...राजनीति के सत्ता पर परिवारवाद के दीमक ने उसे ऐसा खोखला किया है कि आज उसकी जनता दाने-दाने को मोहताज़ हो गयी है...                           पड़ोसी की इस बदहाली पर चुटकी लेने वाले इससे सतर्क हो जाएं...यदि राजनीति की धुरी यदि सिर्फ एक परिवार या किसी व्यक्ति विशेष के ही इर्द गिर्द घूमेगी तो यही हश्र होगा... श्रीलंका की इस घटना से मुझे मिली निजी जीवन के लिए एक बड़ी सीख - कभी भी अपने जीवन की अर्थव्यवस्था को सिर्फ एक तम्बू पर खड़े रहने न दें, मतलब multi source of income 21वीं सदी की मौलिक आवश्यकता है...वरना कोरोना जैसे भूचाल तबाही मचा देंगे"... प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से...

धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने वालों इनसे सीखो....

चित्र
मेरे देशप्रेमियों आपस में प्रेम करो..मेरे देशप्रेमियों... पटना के राजाबाजार से जब ये अर्थी निकली तो आस-पास के लोग देखकर अपनी दांतों तले उंगलियां दबा लिए... 75 वर्षीय रामदेव जी का शव मोहम्मद रिजवान, अरमान, राशिद और इजहार के कंधों पर था। ये चारों "राम नाम सत्य है" बोलते हुए शव को गंगा घाट तक ले गए और हिंदू रीति से रामदेव जी का अंतिम संस्कार किया...रामदेव जी इनके दुकान पर पिछले 25 वर्षों से काम करते थे... इस घटना ने साबित कर दिया कि आज भी इंसानियत जिंदा है...कुछ सरफिरों की वजह से हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब कभी खत्म नहीं हो सकती.... उदयपुर,अमरावती की घटनाओं ने भीतर ऐसा ज़हर घोला है कि नफ़रत जीतने लगी थी,इंसानियत हारने लगी थी...मगर,इस ख़बर ने मुझे फिर से एक भरोसा दिया है कि हिंदुस्तान जिंदाबाद था,जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा... जीवन में सबसे मुश्किल दौर से व्यक्ति तब गुज़रता है जब उसका भरोसा टूटने लगता है...इस ख़बर ने मेरे जैसे कितनों के टूटते भरोसे को एक उम्मीद तो जरूर दिया है... प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से... #उम्मीद #इंसानियत

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता !

चित्र
मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता ! सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...                     जब कोई सरकार जनता की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो उसकी यह मौलिक जिम्मेवारी बनती है कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले उसे वो पब्लिक डोमेन में लाए,इससे उसके निरंकुश व्यवहार का अंदेशा कम होगा...  जिस तरह से सोशल मीडिया पर बिना किसी फ़िल्टर के सूचनाओं का बेतरतीब प्रवाह हो रहा उसमें यह बेहद जरूरी है कि किसी भी  ऐसी योजना को लागू करने से पूर्व केंद्र सरकार को राज्य सरकार और विपक्ष को भी समायोजित तरीके से अपने पक्ष में करने की कोशिश की जानी चाहिए... मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता ! सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...    ...

विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन !

चित्र
विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन ! आज पूरे देश में अग्निपथ योजना के विरोध में जिस तरह के हिंसात्मक रुख देखने को मिला है,उससे यह बात तो स्पष्ट है कि सेना में भर्ती के लिए इच्छुक युवा कभी भी देश की सम्पत्ति को जला नहीं सकता,और यदि वो ऐसे हिंसा को जायज मानता है तो निश्चित तौर पर उसके सेना में आने का कोई मतलब नहीं !                                       मैं मानता हूँ, एक अभ्यर्थी होने के नाते इस नई योजना के प्रति सन्देह होना स्वाभाविक है,सवाल किए जाने चाहिए...यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है...किन्तु, जिस प्रायोजित तरीके से इसे हिंसात्मक रूप दिया गया है वो निश्चित तौर पर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करता है...      देश के किसी भी शीर्षस्थ विपक्षी नेता का एक भी ट्वीट इस हिंसा के विरोध में न आना कहीं न कहीं उनके मौन समर्थन को रेखांकित करता है...                                        ...

लोकतंत्र में ऐसा विरोध कितना जायज !

चित्र
लोकतंत्र में विरोध का यह तरीका कितना जायज ! आज सुबह बिहार के लखीसराय स्टेशन पर खड़ी ट्रैन विक्रमशिला एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया...विरोध करने वाले लोग केंद्र सरकार के द्वारा जारी नई आर्मी भर्ती योजना "अग्निपथ" का विरोध कर रहे हैं... अग्निपथ योजना के प्रावधानों को लेकर अभ्यर्थियों में संशय की स्थिति है,महज़ 4 वर्ष की सेवा को लेकर भी कई तरह की बातें की जा रही है,कुछ लोग इसे आर्मी का निजीकरण करना कह रहे तो कोई इससे भी गम्भीर आरोप लगाते हुए विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया के चूल्हे में भारतीय युवाओं को झोंकने तक की योजना का नाम दे रहे... विरोध करने वाले में कई स्वर तो यह भी कह रहे कि यह मोदी सरकार की देश में साम्प्रदायिक माहौल तैयार करने की एक सुनियोजित योजना है...                       और मुझे लगता है, ये सारे सन्देह का उत्पन्न होना लोकतंत्र की जीवन्तता का प्रतीक है...लोकतंत्र में सत्ता का विरोध,उनकी नीतियों पर सवाल उठाना इसकी मौलिक प्रवृति है...और ये होना चाहिए... किन्तु,           ...

कबीर...एक फक्कड़

चित्र
कबीर...एक फक्कड़... समय की कसौटी पर परखा गया वो आदमी जिसने अपनी निडरता से, अपने बेख़ौफ़ अंदाज़ से, बेबाकी से पूरे समाज की दिशा व दशा को बदलने का साहस किया... कबीर...हिंदी साहित्य के जेम्स बांड है, जो काशी के चौराहे से हिन्दू संस्कृति की रूढ़िवादिता पर सीधा तंज कसने का जिगरा रखते हैं...पूरे देश में जिस वक्त मुस्लिम आक्रांताओं के भय से कोई घरों से निकलने का दुस्साहस नहीं करता था उस वक़्त जो मौलानाओं के भोरे के अज़ान को बहरे खुदा को सुनाने की बात कहने, का साहस शायद ही किसी और में हो... मैं जब भी कबीर को पढ़ता हूँ न...मेरे भीतर एक अज़ीब सी शक्ति का संचार हो जाता, एक निर्भीकता आ जाती... व्यक्तित्व में एक अलग ही फक्कड़पन आ जाता.... बुद्ध और महावीर का सन्यास भौतिकता की चरमता पर पहुंचकर हुई विरक्ति से पैदा हुआ है,किन्तु कबीर...एक ऐसा प्रबुद्ध पुरूष जो बिल्कुल ही सामान्य जुलाहे की ज़िंदगी जीकर ईश्वर के प्रति इतना गहरा अनुराग रखकर भौतिकता की तुच्छता का भान रखते हैं... कबीर आम आदमी का एक विश्वास है,कि परमानन्द को पाया जा सकता...बुद्ध और महावीर की प्रबुद्धता को देखकर तनिक संशय होती कि इतना तप,संय...

पत्थरबाज़ी का जुम्मा कनेक्शन !

चित्र
पत्थरबाज़ी का जुम्मा कनेक्शन ! नमस्ते दोस्तों ! ये हर 'शुक्रवार' को कोई ना कोई कांड धारावाहिक की तरह क्यों रिलीज़ हो रहा है भाई?  देश के अलग-अलग इलाकों में जुम्मे की नमाज़ के बाद पिछले 2-3 जुम्मे से  मुस्लिम अनुयायियों के द्वारा पत्थरबाजी और आक्रोशक जुलूस निकालें जा रहे हैं...इसके पीछे कभी किसी बीजेपी नेत्री के बयान का हवाला दिया जाता तो कभी पाकिस्तानी के पूर्व प्रधानमंत्री के मृत्यु के अफवाह का...मगर, मुझे इस पत्थरबाज़ी में जुम्मा कनेक्शन दिख रहा है..  आज, रांची के ही मामले को लें, तो नमाज़ पढ़कर लौट रहे लोग एकाएक बिना किसी पूर्व सूचना के पथरबाज़ी करते हुए किसी जुलूस का हिस्सा कैसे बन जाते हैं,कौन सी ऐसी एकात्मक संगठन है जो इन्हें इतनी जल्दी एकजुट कर सकती ! पिछले सप्ताह भी कानपुर में नमाज़ पढ़कर आने के बाद,एकाएक इतनी बड़ी संख्या में लोग जुलूस का हिस्सा बनकर पथरबाज़ी कैसे करने लगें ! क्या मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ के बाद इन्हें कोई सूचना दी जाती है ? क्या कोई अलगाववादी ताकत इनके भावनाओं को भड़काकर देश के माहौल को बिगाड़ना चाह रही है ? वोट के धार्मिक ध्रुवीकरण क...

हिंदी माध्यम के भी अच्छे दिन आएंगे !

चित्र
हिंदी माध्यम के भी अच्छे दिन आएंगे ! जी हाँ दोस्तों... 15 वर्ष पहले तक  देश के प्रशासनिक सेवा में हिंदी पट्टी के युवाओं  का धाक हुआ करता था, बिहार और उत्तर प्रदेश के युवाओं का एक मात्र सपना जो उनकी ज़िंदगी बन जाता था वो होता था IAS बनना... मगर, परीक्षा में हुई बदलाव ने उन्हें पूरी प्रतियोगिता से इस कदर बाहर किया जैसे भारतीय हॉकी टीम जो एक समय मिट्टी के मैदान पर विश्व विजेता हुआ करती थी और मैट पर फिसड्डी हो गयी...कुछ वैसा ही हाल UPSC की परीक्षा में हिंदी भाषी प्रतियोगियों का हुआ..  मगर, अब बदलते हालात को जिस तरह हॉकी में हम अपने पक्ष में करने में धीरे-धीरे ही सही सफल हो रहे...ठीक उसी प्रकार अब उम्मीद लगाई जा रही कि हिंदी माध्यम से भी UPSC की असाध्य वीणा को अब साधा जा सकता है.. हालात उतने संतोषजनक तो नहीं,मगर एक उम्मीद का दीया कई वर्ष पूर्व Nishant Jain निशान्त जैन  के रूप में जला था...और अब रवि सिहाग के रूप में एक जुगनू टिमटिमाता हुआ दिख रहा है... पिछले 12-15 वर्षों में शीर्ष 20 में सिर्फ  इन 2 हिंदी भाषी  प्रतियोगी का होना मेरे इस बात...

रणभूमि में हारने से पहले मनोभूमि में हार गए थे पन्त...

चित्र
रणभूमि में हारने से पहले मनोभूमि में हार गए थे पन्त.... कल रात मुंबई और दिल्ली के बीच हो रहे आईपीएल के एक अहम मुकाबले में यही देखने को मिला...दिल्ली के कप्तान ऋषव पन्त की टीम पूरी तरह दूसरी पारी के 15वें ओवर तक मैच को अपने गिरफ़्त में रखने में कामयाब लग रही थी,ऐसा जान पड़ रहा था कि इस मुक़ाबले को जीतकर भले वो मुंबई को हराने में कामयाब होगी लेकिन इस खेल का रोमांच ये था कि इस जीत के साथ वो बेंगलुरु के टीम के प्ले ऑफ में पहुंचने के मंसूबे पर पानी फेर देगी... मुंबई के लिए ये मुकाबला प्रतियोगिता के दृष्टिकोण से उतना अहम नहीं था,और न ही इससे उनके अंकतालिका में खास परिवर्तन आने वाला था...इन सबसे इतर बेंगलुरु टीम के लिए मुम्बई का जीतना उनके प्लेऑफ में एंट्री दिलवा सकता था..  कुलदीप के गेंद पर ऋषव का ब्रेविस का कैच छोड़ने से ज्यादा नुकसान... 16वें ओवर में शार्दूल ठाकुर की पहली गेंद टीम डेविड के बल्ले को हल्का सा छूते हुए विकेटकीपर कप्तान ऋषव पन्त के हाथों में गयी,गेंदबाज़ के साथ साथी खिलाड़ियों ने भी अपील किया,जिसे अम्पायर के द्वारा ख़ारिज कर दिया गया,अगल-बगल के खिलाड़ियों ने कप्तान ऋषव...

एक बच्चे की फ़रियाद बिहार के मुख्यमंत्री से

चित्र
"हमें धन-दौलत नहीं,हमें शिक्षा दे दीजिए...ताकि हम पढ़कर लिखकर आईएएस बनकर अपने बिहार को बेहतर बना सकें"... जी हां... दोस्तों...ये फरियाद हैं  बिहार के नालन्दा जिले के अंतर्गत हरनौत के महज़ 11 वर्ष के एक छोटे से लड़के सोनू की...बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी से... ऐसा जिगरा, ऐसी फ़रियाद एक बिहारी ही कर सकता है...       आज एक चन्द्रगुप्त शासन से सच्ची व अच्छी शिक्षा की मांग करके खुद को काबिल बनाकर बिहार को बेहतर बनाने की हुंकार भर रहा है...क्योंकि बिहार के चन्द्रगुप्त को यह भरोसा है कि वो अपनी काबिलियत से बिहार को फिर से वही गौरव का दर्जा दिलवा सकता है...                             बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी इस फ़रियादी की आवाज़ में आप बिहार के दर्द को समझें, आधारभूत शिक्षा व्यवस्था पर तनिक विशेष ध्यान देने की कृपा करें...शिक्षा वो हथियार है जिससे बिना रक्त बहाए हम फिर से अखण्ड साम्राज्य की स्थापना कर सकते हैं...बिहार की दिशा व दशा को बदलने की एक मात्र कुंजी शिक्षा ही है.... ...

सिद्धार्थ से बुद्ध की यात्रा

चित्र
दुनिया के पहले धर्म वैज्ञानिक के पावन जयंती पर श्रद्धासुमन अर्पित ! बुद्ध...यह नाम सुनते ही मस्तिष्क पटल एक यात्रा की तस्वीर खींच जाती है..."सिद्धार्थ से बुद्ध तक का सफ़र"... एक ऐसा राजकुमार जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा था,भौतिक संसार की हर सुख सुविधाएं उसके पास थी...लेकिन,फिर भी उसे किसी और की तलाश थी...                         भौतिकता की संकीर्णता और क्षुद्रता को परिलक्षित करता है यह सफ़र... बुद्ध ने चेतना के वजूद को इतनी वैज्ञनिकता से स्थापित किया है,कि आज  भी रहस्य बनकर ही हमारे सामने है,कि कोई मनुष्य अपने भीतर इतनी सूक्ष्मता से यात्रा कैसे कर सकता है! बुद्ध ने कभी भी अपने सत्य को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं किया,उन्होंने सदैव माना कि एक गुरु होने के नाते वो अपने शिष्यों में सत्य की खोज के प्रति इच्छा को जीवित भर ही कर सकते ,सत्य के मार्ग पर चलना तो उन्हीं को है...                    वर्तमान समय में ज्ञान का जो बाज़ारीकरण हुआ है,उससे आध्यात्मिकता भी बस ...

अलसंख्यक समाज किन्तु भारत के विकास में सबसे आगे !

चित्र
वो सम्प्रदाय जो अपने अल्पसंख्यक होने का रोना नहीं रोते, बल्कि देश की प्रगति में बढ़-चढ़ हिस्सा लेने को लालायित रहते हैं...               वो सम्प्रदाय जिनकी भारत की कुल आबादी में हिस्सेदारी मात्र 0.37% है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनकी भारत के कुल टैक्स में हिस्सेदारी लगभग 24% है..   जी हां, दोस्तों...मैं बात कर रहा "जैन सम्प्रदाय"की...मुझे इस बात का गर्व है,कि भले ही मेरा जन्म किसी जैन परिवार में नहीं हुआ लेकिन तीर्थंकर महावीर विद्या मंदिर में पढ़कर सात्विकता और राष्ट्रप्रेम ने मेरी आत्मा तक को सिंचित किया है... भगवान महावीर स्वामी के त्याग,संयम और संकल्प से सिद्धि के मंत्र ने मेरे जीवन को सत्मार्ग की ओर प्रेरित किया है...बारूद की ढ़ेर पर बैठी इस दुनिया को यदि कोई बचा सकता है वो है सत्य व अहिंसा का सिद्धांत... आज भारत के हर प्रतिष्ठित कार्यों में अपनी श्रेष्ठ भूमिका देकर यह समाज पूरे विश्व में अपनी दिव्य पहचान बनाने में सफल हुआ है...पूरे भारत में 16000 पंजीकृत गौशालाओं में से 12000 का संचालन जैन समाज के द्वारा हो रहा है,ये आंकड़े इ...

समय का गुल्लक..

चित्र
                    "समय का गुल्लक" समय वो अनमोल धन है, जिसे एक बार खो जाने के बाद कभी भी पाया नहीं जा सकता...हम इसकी अहमियत को बचपन से नज़रअंदाज़ करते आते हैं,क्योंकि कभी हमें ऐसा लगता ही नहीं कि इसे भी बचाया जा सकता,इसका भी निवेश किया जा सकता...                          दुनिया के हर सफल व्यक्ति ने इसके महत्व को समझा है, यक़ीनन तभी वो सफल हो सके हैं...आज सोशल मीडिया के इस दौर में रील्स और fb स्क्रॉल करते हुए कैसे वक़्त गुज़र जाता ये पता ही नहीं चलता...और अचरज़ की बात ये है कि फिर अगले दिन हम वही काम करते जिसकी वजह से पिछले दिन पछतावा हुआ था.. चाहे व्हाट्सएप्प पर दोस्तों के बीच बेफिजूल की बकैती हो या फिर बिना मतलब के दिन भर न जाने किन ख्यालों में खोए रहना..  फोन पर घण्टों किसी से बेमतलब की बात करके न सिर्फ़ हम अपना बल्कि सामने वाले का भी ऊर्जा और समय नष्ट करते हैं,भले ही सामने वाला आपकी इज्जत करता हो लेकिन आपके इस व्यवहार से उसे दुःख तो जरूर होता है.... कमाल की बा...

मायके का अनावश्यक हस्तक्षेप दाम्पत्य जीवन की असफलता का मूल कारण

चित्र
लड़की पक्ष वाले लड़की के ससुराल का पानी भी न पीते.                               सुनने में थोड़ा अज़ीब लगता,किन्तु व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो इसके पीछे एक बहुत ही मजबूत दर्शन छिपा है...आज अधिकांश दाम्पत्य जीवन की असफलता की एक बहुत बड़ी वजह मायके पक्ष का नव दाम्पत्य जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप है...                          मोबाइल युग में सम्पर्क के साधन की बेहतरीन उपलब्धता ने इस हस्तक्षेप को और अधिक बढ़ा दिया है...किसी भी नव विवाहिता को नए घर में सामंजस्य बिठाने थोड़ा वक्त तो लगता ही है,किन्तु शुरुआती आवेश में मायके पक्ष का अनावश्यक हस्तक्षेप आग में घी का कार्य करता है...                              इतिहास गवाह है, चाहे रामायण में राम का वन गमन हो या फिर महाभारत में कुरुक्षेत्र का वो भीषण युद्ध...कहीं न कहीं मन्थरा और शकुनि के रूप में मायके पक्ष का अनावश्यक हस्तक्षेप ...

घर हो या देश..बेहतर प्रबन्धन तो एक स्त्री ही कर सकती !

चित्र
घर हो या देश...बेहतर प्रबन्धन तो एक स्त्री ही कर सकती है ! जी, हां दोस्तों... इस तस्वीर में भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नार्डिक देशों के प्रधानों के साथ हैं...जिनके पांच देशों में चार की प्रधान एक महिला है...नार्डिक देश जिसमें डेनमार्क,नॉर्वे,स्वीडन,फ़िनलैंड,आइसलैंड देश शामिल हैं,ये सभी देश वैश्विक सूचकांक के हर अच्छे आयाम में अव्वल हैं....चाहे वो विश्व खुशहाली रिपोर्ट हो या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता... शिक्षा हो या फिर स्वास्थ्य... मुझे मोदीजी की इस यात्रा से पहले इस सन्तुलित व आदर्शवादी प्रगति की मूल वजह वहां की जलवायु जान पड़ती थी,मगर अब मैं पूरे दावे से ऐसा कह सकता हूँ,जिस इलाके में महिलाएं राजनीतिक,आर्थिक,प्रशासनिक,सामाजिक और बौद्धिक रूप से सबल होंगी,राष्ट्र के प्रगति में जितनी बड़ी भूमिका महिलाओं की होगी,निश्चित तौर पर वहां बेहतर प्रबंधन और सन्तुलित विकास कार्यक्रम बनेंगे...वो राष्ट्र उतनी ही शांति से प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा.... भारत जैसे देश में नारी को राजनीति में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए तैयार होना होगा,आधी आबादी को विकास पथ से दूर रखकर कभी भी कोई...

आतातायियों के कृत्यों पर तमाचा है यह प्रकाश पर्व

चित्र
जिस लालकिले से जुल्म का साम्राज्य फैलाने वाले औरंगजेब की सलामती के लिए अज़ान गुंजा करते थे,जिस किले पर एक समय मुगलिया सल्तनत का झंडा फहरता रहता था,जिसे देखकर देश की आम जनता के आंखों से खून के आंसू निकलते थे... जिस औरंगजेब की कुरुरता का कभी गवाह बनी,लालकिला की ये दीवारें जालिमों के बेतहाशा अट्हास के गूंज में  आम लोगों की चीखों को दफ़न कर देती थी...           जिस किले से शासन करते हुए,औरंगजेब ने सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर को इस्लाम न कबूलने पर उनके शीश काटने का मुगलिया फरमान सुनाया था... आज वही लालकिला..जी,हाँ.. वही लालकिला... गुरु तेगबहादुर की 400वीं जयंती प्रकाश पर्व पर इस तरह सज-धज के उन आतातायियों का उपहास उड़ाएगा,ये मैंने कल्पना भी नहीं की थी... मैं अपने आप को धन्य मानता हूँ,जो मेरा जन्म इस बलिदानी धरा पर हुआ...जहां हँसते-हँसते अपने चार बेटो को बलिदान करने वाला बाप,खुद की जान दे दी...मगर अपने धर्म को नहीं छोड़े... प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

प्राइवेट स्कूल :- लूट घर

चित्र
लूट के लिए अब बाजार सज चुका है...लुटेरों ने अपने बाज़ार लगा लिए हैं...और वो भी पूरे ताम- झाम के साथ... जी, हां दोस्तों...अब विद्यालय वह स्थान नहीं जहां विद्या अर्जन की चाह रखने वाले विद्यार्थी जाया करते थे...बाज़ारीकरण के इस दौर में बड़े ही सलीके से इसे लूट का अड्डा बनाया गया है.. प्राइवेट स्कूलों के लिए यह महीना किसी लग्न से कम नहीं, पांच - पांच सौ की कई गड्डियां रोज रबड़ के जोड़ से खुद को बंधा हुआ महसूस कर रही है..  पिछले दो वर्षों से ऑनलाइन पढ़ाई की वजह से प्राइवेट स्कूलों को ठीक से अपने प्रायोजित कारोबार को चलाने का मौका नहीं मिल पा रहा था...इन दो वर्षों में न तो उनकी किताबें-कॉपियां (जिन पर उन्हें 50% तक का कमीशन मिलता),बिक सकी... और न ही रंग-बिरंगे बेमतलब के ड्रेस,जूते और न जाने क्या क्या... इस बार उन दो वर्षों की पूरी वसूली का इंतज़ाम है...अभिभावक अपने जेब ढीली करने को तैयार रहें... आज प्राइवेट स्कूल विद्यालय कम एक मॉल ज्यादा लगता है,जहां बिकती हैं कॉपियां,किताबें,कपड़े,जूते और भी कई चीजें...और एकरूपता के नाम आपको वहीं से खरीदने को होना पड़ता है मजबूर...वरना साफ कहा जाता ...

RRR

चित्र
शानदार पटकथा,बेहतरीन निर्देशन और उम्दा कलाकारी...का संयोग है RRR          RISE...ROAR...REVOLT... जूनियर NTR और राम चरन की जबरदस्त जुगलबन्दी...अजय देवगन और आलिया भट्ट का छोटा लेकिन दमदार रोल... इस फ़िल्म ने न सिर्फ़ राष्ट्रवाद की भावना  केंद्र में है,बल्कि राम के सशक्त स्वरूप को भी बड़ी ही विलक्षणता के साथ प्रस्तुत किया गया है...सिनेमेटोग्राफी की दुनिया में बाहुबली की टक्कर की यह फ़िल्म दर्शकों को रोमांचित कर देती है... इस फ़िल्म की सफलता ने इस बात को साबित किया है,कि बिना किसी फूहड़ता और नँगा नांच के भी फ़िल्म को सुपर डुपर हिट बनाया जा सकता है...बिना किसी की भावना को आहत किये भी दर्शकों को रोमांचित करते हुए अपनी बात को जिस सरलता व सहजता से इस फ़िल्म ने प्रस्तुत किया है वो निश्चित तौर पर काबिल ए तारीफ़ है... फ़िल्म में दिखलाये गए कई दृश्य जैसे बाघ से लड़ाई,पानी में लगे आग से बच्चे को बचाने का सफल प्रयास,महल पर बाघ और जंगली जानवरों के साथ आक्रमण और अंत में रामावतार के साथ जंगल की आख़िरी लड़ाई ...सच मानिए एकदम रोमांच से भर देती है... वहीं अपने भाई को कोड़े से म...

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम..

चित्र
पांच राज्यों के विधानसभा के  चुनाव परिणाम ने यह साफ कर दिया है, कि बीजेपी ने जनता के नब्ज को बखूबी सही मायने में पकड़ने में कामयाबी पाई है।                                               उत्तर प्रदेश जो जनसंख्या की दृष्टिकोण से भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जहां की राजनीति जातीय बुनावट, बाहुबल और क्षेत्रीयता के आधार पर तय होती रही है,वहां धार्मिक ध्रुवीकरण से लगातार दूसरी बार सत्ता को हासिल करना यह स्पष्ट करता है कि बीजेपी का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और योगी आदित्यनाथ जैसे हिंदुत्व का चेहरा बहुसंख्यक वर्ग को पसंद है । बीजेपी ने ना सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण से उत्तर प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय योजनाओं से जमीन स्तर पर आम लोगों को लाभान्वित कर उत्तराखंड मणिपुर और गोवा में भी सफलता पाई है । पंजाब के लोगों ने 'दिल्ली मॉडल' को खुले दिल से अपनाया और अपनी क्षेत्रीयता को महत्व देते हुए 'आप' पार्टी को बड़ी जीत दी ।  पंजाब से कांग्रेस को जनता ने सत्ता से बेदखल करके साफ स...

अर्धनारीश्वर का यथार्थ

चित्र
शिव पार्वती के बिना शव...शंकर अपने गौरी के बिना कंकड़ है... आज महाशिवरात्रि के मौके पर मेरे मन में सवाल आया कि जिस संस्कृति ने देवियों को देवताओं से भी श्रेष्ठ माना है,देवताओं के अस्तित्व की मूल देवियां हैं...वो संस्कृति 21वीं सदी में भी आधुनकिता के वायुयान पर सवार होकर अपने मौलिकता के ईंधन को क्यों भूल गयी है...ईंधन के बिना ये वायुयान न जाने हमें कहाँ की यात्रा करवाएगा... जीवन की सम्पूर्णता के लिए व्यक्तित्व में नारीत्व और पौरुषत्व के गुण अनिवार्य हैं.. हम कब तक इस दुनिया को लिंग भेद के नाम पर यूं बाटते रहेंगे? यक़ीन मानिए, इस बंटवारे ने हमारा बहुत नुकसान किया है... एक स्त्री के भीतर करुणा, दया,ममता और वात्सल्य की अधिकता का होना उसकी कमजोरी नहीं हो सकती;और वहीं एक पुरूष के भीतर साहस,दृढ़ संकल्प और निडरता की अधिकता उसके अहंकार का परिचायक नहीं... मेरा ऐसा मानना है,कि हर पुरुष के भीतर स्त्री और हर स्त्री के भीतर पुरुष हो...ये पुरुष व स्त्री सिर्फ़ लिंग न होकर एक आपेक्षित गुण हो..स्वभाव हो.. नारी और नर की लैंगिक समानता की वकालत करना मुझे पता नहीं क्यों  इस पीढ़ी की सबसे बड़ी मूर...

ज़िन्दगी : ताश का खेल

चित्र
52 पत्तों के ताश का खेल है यह जिंदगी...  बड़ा रोचक है यह खेल ..हर किसी के पास अपने- अपने पत्ते, हर कोई एक दूसरे से अनजान..  फिर भी सब में जीतने का वही जुनून.. वही प्यास.. वही शिद्दत...  जिंदगी हो या ताश का खेल इसकी अनिश्चितता ही इसे रोचक बनाती है। यदि जिंदगी में सब कुछ पूर्व निर्धारित हो तो जिंदगी नीरस हो जाएगी । यकीनन, ताश के खेल में पत्ते हर बार मन पसंद नहीं आते, कभी बुरे पत्ते आते तो कभी अच्छे पत्ते ..  ताश के खेल की तरह जिंदगी भी कुछ अपना खेल ऐसे ही खेला करती है । बुरे पत्ते देखकर खेल छोड़ देना सबसे बड़ी मूर्खता है और अच्छे पत्ते पाकर कोई अपनी जीत की गारंटी कर रहा है यह भी सरासर अन्याय ही है।  खेल को खेलना और जिंदगी को बेहतर बनाने के प्रयास में जीना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। जिस तरह कम शक्ति वाले पत्ता भी मौका मिलते ही बड़ा खेल दिखा देता है ठीक उसी प्रकार कभी भी कोई भी जिंदगी के इस रंगमंच पर बाजी मार सकता है बस जब तक जिंदगी है खेल जारी रखना होगा... प्रभाकर कुमार 'माचवे'