लोकतंत्र में ऐसा विरोध कितना जायज !
लोकतंत्र में विरोध का यह तरीका कितना जायज !
आज सुबह बिहार के लखीसराय स्टेशन पर खड़ी ट्रैन विक्रमशिला एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया...विरोध करने वाले लोग केंद्र सरकार के द्वारा जारी नई आर्मी भर्ती योजना "अग्निपथ" का विरोध कर रहे हैं...
अग्निपथ योजना के प्रावधानों को लेकर अभ्यर्थियों में संशय की स्थिति है,महज़ 4 वर्ष की सेवा को लेकर भी कई तरह की बातें की जा रही है,कुछ लोग इसे आर्मी का निजीकरण करना कह रहे तो कोई इससे भी गम्भीर आरोप लगाते हुए विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया के चूल्हे में भारतीय युवाओं को झोंकने तक की योजना का नाम दे रहे...
विरोध करने वाले में कई स्वर तो यह भी कह रहे कि यह मोदी सरकार की देश में साम्प्रदायिक माहौल तैयार करने की एक सुनियोजित योजना है...
और मुझे लगता है, ये सारे सन्देह का उत्पन्न होना लोकतंत्र की जीवन्तता का प्रतीक है...लोकतंत्र में सत्ता का विरोध,उनकी नीतियों पर सवाल उठाना इसकी मौलिक प्रवृति है...और ये होना चाहिए...
किन्तु,
क्या विरोध का यह हिंसात्मक तरीका लोकतंत्र में जायज है ?
क्या विरोध के नाम पर आप सरकारी संपत्ति का इस कदर नुकसान पहुंचा सकते हैं ?
क्या आप किसी तानाशाह से मुक्ति चाहते हैं,जिसने वर्षो तक आपका शोषण किया है...अगर ऐसी बात होती तो 2019 का लोकसभा चुनाव का परिणाम तो कुछ और ही कह रहा !
सरकार की किसी नीति का इस कदर विरोध कहीं न आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी, जब हमारा पूरा देश अमृत महोत्सव मना रहा...वो भी ऐसी सरकार से जिसे अभी 3 वर्ष पूर्व ही आपने प्रचंड बहुमत से दूसरी बार केंद्र का शासन सौंपा है...मुझे यह सोचने पर विवश कर रहा कि क्या आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी हमारे देश के नागरिक लोकतंत्र को अपनाने के योग्य हुए भी या नहीं...
लोकतंत्र सिर्फ अधिकारों के मांग पर आधारित नहीं होता,न ही मुट्ठी भर लोगों के विचारों पर आधारित...यह तो कर्तव्यों और अधिकारों के बीच के सन्तुलन का शासन है...जनता की आकांक्षाओं को जनप्रतिनिधियों के द्वारा पूर्ति का शासन है...यह लोक का तंत्र है...
जिस देश की युवा पीढ़ी जिसमें खासकर वो बच्चें जो इस तरह की आगजनी में शामिल हैं जिन्हें कल के तारीख़ में भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करनी है...अगर कल को देश की आर्थिक स्थिति की विफलता की वजह से एक सैनिक के रूप में इनकी तनख्वाह को देने में सरकार असमर्थता दिखाए तब तो ये देश की संसद भवन पर हमला कर सकते हैं ! उसे आग के हवाले कर सकते हैं !
क्रोधित होना, विरोध करना, आक्रोश में सत्ता पक्ष के खिलाफ़ बयानबाज़ी करने को मैं स्वाभाविक मानता हूँ...मगर, इस कदर पूरे ट्रैन में आग लगा देना कहीं न कहीं इनके भीतर की असंवेदनशीलता को परिलक्षित कर रहा है...
इस तरह हिंसक विरोध में यदि किसी की जान चली जाती,तो इसकी जिम्मेवारी कौन लेते ?
क्या विपक्ष में इतनी ताकत है जो इस घटना की जिम्मेवारी ले सके, सिर्फ़ भड़काऊ बयानबाज़ी करके युवाओं को आक्रोशित करके आग में रोटी सेंकना इनका राजनीतिक एजेंडा है !
क्या वो बोल बच्चन इस घटना की जिम्मेवारी लेंगे जिन्होंने कल से सोशल मीडिया पर इतने भड़काऊ बयान दिए हैं,जिसने इस प्रदर्शन की आग में घी का काम किया है ...
सभी एक सिरे से इसे कुछ सनकी युवाओं के द्वारा किये निंदनीय कार्य कह रहे, सभी एक सिरे से कह रहे भीड़ की न शक्ल होती,न कोई सूरत...
किसी योजना के विरोध में ऐसी मनोदशा हो सकती है,इसकी खबर सरकार को होनी चाहिए, निश्चित तौर यह सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों की धरातलीय कमी को उजागर करता है...और यह भी स्पष्ट करता है कि जिस योजना के प्रति सरकार का पूरा कुनबा...यहां तक उसके सांसद तक भ्रम की स्थिति में,ऐसी योजना का इतनी शीघ्रता से बिना किसी धरातलीय पृष्ठभूमि को बनाये लागू करने के पीछे क्या मंशा थी ?
किसान बिल पर सत्ता पक्ष की यही विफलता उजाकर हुई...और इस बार #AgnipathScheme पर...
आज इस जलती ट्रैन में यदि कुछ जल रहा तो वो है आम लोगों का लोकतंत्र पर से विश्वास !
मेरा विनम्र आग्रह होगा हर उस व्यक्ति से जो इस योजना के पक्ष या विपक्ष में हैं...कृपया इस तरह आम आदमी का लोकतंत्र पर जो विश्वास है उसे धू- धू कर जलने से बचाएं !
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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