KBC की यह घटना बहुत कुछ कहती है...

टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति (KBC) में घटित एक छोटी-सी घटना ने पूरे समाज को सोचने पर विवश कर दिया... मंच पर किसी बच्चे की एक हरकत ने न केवल दर्शकों को चौंकाया बल्कि सोशल मीडिया पर यह बहस छेड़ दी कि — क्या आज की परवरिश में कहीं कुछ गड़बड़ है ? क्या बच्चे अब संस्कारों की जगह केवल आत्म-प्रदर्शन में विश्वास करने लगे हैं ? दरअसल, हर बच्चा अपने परिवेश का प्रतिबिंब होता है। उसकी बातें, हाव-भाव, और व्यवहार कहीं न कहीं उस संस्कृति, घर और समाज की छाया लिए होते हैं जिसमें वह पलता-बढ़ता है... यही कारण है कि यह घटना केवल एक बालक की हरकत नहीं, बल्कि हमारे समय की परवरिश, शिक्षा और सामाजिक परिवेश पर प्रश्नचिह्न बनकर उभरी है...

 परवरिश के बदलते स्वरूप  - आज के माता-पिता बच्चों को खुला माहौल देना चाहते हैं — आत्मविश्वासी, स्पष्टवक्ता और निडर बनाना उनकी प्राथमिकता है। यह निश्चय ही आवश्यक भी है, लेकिन कहीं न कहीं इस प्रक्रिया में मर्यादा और विनम्रता की रेखा धुंधली होती जा रही है...आत्मविश्वास और अभिमान के बीच का फर्क मिटता जा रहा है। यह घटना हमें यह सोचने को बाध्य करती है कि बच्चे को केवल ‘बोलना’ नहीं, बल्कि ‘कैसे बोलना है’ यह सिखाना भी उतना ही ज़रूरी है...अतिआत्मविश्वास अभिमान बनकर अपना ही नुकसान करता है...

 मीडिया और मंच की भूमिका - KBC जैसे लोकप्रिय मंच बच्चों के लिए प्रेरणा और सीख का अवसर हो सकते हैं, लेकिन जब ऐसे मंचों पर किसी बच्चे का व्यवहार विवाद का विषय बन जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या इन मंचों पर बच्चों को भावनात्मक तैयारी दी जाती है ? या फिर मनोरंजन और TRP की होड़ में उनकी मासूमियत को ही “ड्रामा” के रूप में पेश किया जाता है ? कहीं न कहीं, यह घटना हमें याद दिलाती है कि मीडिया की जिम्मेदारी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का संचार भी है...और जिस तरीके से उस बच्चे को केंद्र में रखकर सोशल मीडिया पर मीम की बाढ़ सी आई है उसका उस बच्चे वो परिवार के सदस्यों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा उसका जिम्मेवार कौन होगा ?

 मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण - आधुनिक डिजिटल युग में बच्चे छोटी उम्र से ही ध्यान और ताली की भूख लेकर बड़े हो रहे हैं... सोशल मीडिया के ‘लाइक’ और ‘व्यूज़’ ने उनके भीतर एक प्रदर्शनकारी प्रवृत्ति जगा दी है... "कूल दिखने के चक्कर में वो फूल बन रहे...इस वजह से कभी-कभी वे सहजता से नहीं, बल्कि दिखावे की भावना से व्यवहार करते हैं...यह केवल उनकी गलती नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति का परिणाम है जिसने “कैसा दिखते हैं” को “कैसे हैं” से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया है..

 शिक्षा तंत्र -  स्कूल आज सिर्फ किताबी ज्ञान दे रहे हैं, पर मूल्य नहीं... परीक्षा परिणामों की अंकों दौड़ में भावनात्मक शिक्षा, शिष्टाचार, संवेदनशीलता और नैतिकता जैसे मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं... अगर शिक्षा केवल अंक देती है, बोध नहीं..व्यावहारिक ज्ञान नहीं तो ऐसे परिणाम तय है...KBC जैसी घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि ‘संस्कार शिक्षा’ केवल धार्मिक या नैतिक विषय नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनिवार्यता है...

 समाज का प्रतिबिंब -  बच्चे वही करते हैं जो वे अपने आस-पास देखते हैं — चाहे वह माता-पिता की बोलचाल हो, राजनीतिक बहसों का स्तर हो, या सोशल मीडिया पर चलती कटुता... जब समाज में विनम्रता की जगह व्यंग्य, और संवाद की जगह शोर बढ़ने लगे, तो बच्चे भी उसी का प्रतिबिंब बन जाते हैं... इसलिए बच्चे को दोष देना आसान है, लेकिन सच्चा आत्ममंथन तो इस सामाजिक चेतना को ही करनी होगी कि हमारा व्यवहार कैसा है? बच्चे वो कदापि नहीं सीखते जो हम कहते हैं,असल में वो अनुकरण करते जैसा हम करते हैं...

 KBC में बच्चे की हरकत केवल एक मनोरंजन शो की छोटी घटना नहीं, बल्कि हमारे दौर की बड़ी सीख है...यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं — केवल अंकों की अंधी दौड़, झूठा अतिआत्मविश्वास...यदि आने वाली पीढ़ी को हम सच्चे अर्थों में सभ्य, संवेदनशील और संस्कारित बनाना चाहते हैं, तो हमें परवरिश को फिर से नई सोच के साथ जोड़कर बच्चों को संवेदनशील और मर्यादित बनाने का प्रयास करना होगा...यह हमारी आपकी सबकी जिम्मेवारी है...

प्रभाकर कुमार 'माचवे


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