नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

नेपाल में उठती अशांति और भारत की चिंता

नेपाल की सड़कों पर जो हलचल मची है, उसकी गूँज केवल काठमांडू की गलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के कानों तक भी पहुँच रही है। पिछले तीन वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में हिंसक और अराजक तख़्तापलट हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सचमुच जनता की स्वतःस्फूर्त आवाज़ है या इसके पीछे कोई गहरी साज़िश बुन रही है?

अक्सर लोग मान लेते हैं कि यह सब छात्रों या GenZ युवाओं के आकस्मिक आंदोलन हैं, लेकिन यह सोच सरासर भ्रम है.. दरअसल, दुनिया की बड़ी ताक़तें किसी भी देश में अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए अदृश्य चालें चलती रहती हैं। जब तक सत्ता उनके अनुकूल रहती है, सब ठीक रहता है। लेकिन जैसे ही कोई मज़बूत नेतृत्व उनके हितों पर रोक लगाता है, तभी ये महाशक्तियाँ सक्रिय होकर उस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती हैं।

उनकी चाल का तरीका भी तय होता है। सबसे पहले विपक्ष को मज़बूत किया जाता है, चुनावी फंडिंग कराई जाती है और अपने मीडिया नेटवर्क व इंटरनेट कंपनियों के माध्यम से वातावरण बनाया जाता है। जब यह उपाय नाकाम होते हैं, तब तख़्तापलट की योजना तैयार होती है। युवाओं की नाराज़गी के मुद्दे खोजे जाते हैं, उनके बीच किसी लोकप्रिय गैर-राजनीतिक चेहरे को हीरो की तरह पेश किया जाता है। पश्चिमी मीडिया उसे रातों-रात उद्धारक बना देता है और सोशल मीडिया उसकी छवि को युवाओं के बीच मसीहा के रूप में गढ़ देता है। वर्षों तक अपार धन बहाकर गुप्त नेटवर्क खड़ा किया जाता है और जैसे ही सत्ता दबाव में आती है, अचानक से तख़्ता पलट दिया जाता है। इसके बाद वह मज़बूत सरकार, जिसने कभी आँख दिखाने की हिम्मत की थी, सत्ता से बाहर हो जाती है और देश लंबे समय तक अराजकता के दलदल में धँस जाता है।

इसी पृष्ठभूमि में नेपाल की अशांति भारत के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि भारत की मज़बूत सरकार भी इन महाशक्तियों को रास नहीं आ रही। पिछले सात-आठ वर्षों में कई तरह से भारत को अस्थिर करने की कोशिशें की गईं—किसान आंदोलन, खालिस्तान का शोर, जातीय राजनीति, मणिपुर संकट, द्रविड़वाद और भाषायी विवाद। हाल ही में संवैधानिक संस्थाओं की साख पर उठे प्रश्न भी उसी कड़ी का हिस्सा हैं।

सौभाग्य से भारत एक संगठित और परिपक्व राष्ट्र है। यहाँ के नागरिक इतने समझदार हैं कि वे इन मुद्दों की असली जड़ और इसके पीछे छिपे विदेशी हाथों को पहचान लेते हैं। यही कारण है कि अस्थिरता की साज़िशें बार-बार विफल हो जाती हैं।

लेकिन फिर भी एक गंभीर चिंता बनी हुई है। भारत की आधी आबादी GenZ है। यह पीढ़ी अपार ऊर्जा और रचनात्मकता से भरी है, पर साथ ही अपने संघर्षों और दबावों के कारण बेचैनी और कुंठा से भी जूझ रही है। यही वह जगह है जहाँ देश के दुश्मन उन्हें मोहरा बनाकर अराजकता फैलाने की कोशिश कर सकते हैं।

इसलिए ज़रूरी है कि सरकार युवाओं की मानसिकता और समस्याओं को समझने के लिए विशेष आयोग बनाए। उनकी असीम ऊर्जा और रचनात्मकता को सही दिशा देने के लिए नए मंच तैयार किए जाएँ। राजनीति के केंद्र में युवाओं के मुद्दे आएँ। प्रतिभाशाली युवाओं को नेतृत्व और महत्वपूर्ण पदों पर अवसर मिले। और सबसे अहम—राजनीतिक दल अपने वृद्ध नेतृत्व की जगह 30–40 वर्ष के युवाओं को कमान सौंपें।

कहावत है—“नया लोहा ही सबसे मज़बूत औज़ार गढ़ता है।”
ठीक वैसे ही, देश का भविष्य भी युवाओं के कंधों पर टिका है। सृजन हो या प्रलय, दोनों उन्हीं के रास्ते से होकर आते हैं। हमें तय करना है कि इस ऊर्जा को किस दिशा में मोड़ना है...

प्रभाकर कुमार 'माचवे'

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