क्या भारत में हो सकते तख्तापलट ?
क्या भारत में हो सकता तख़्तापलट?
भारत आज़ादी के बाद से जिस लोकतांत्रिक राह पर बढ़ा है, वहाँ तख़्तापलट की संभावना पर चर्चा अपने आप में रोचक भी है और गंभीर भी...अभी जिस तरह से दक्षिण एशियाई देशों में जिस तीव्रता के साथ रातों-रात सत्ता बदलते देखा है,उससे इस बिंदु पर विचार करना लाज़मी हो गया है...कई देशों में बंदूक़ की नली पर लोकतंत्र को गिरफ़्तार कर लिया गया, लेकिन भारत के मामले में सवाल उठता है—क्या यहाँ ऐसा संभव है ? इसका उत्तर है—इतनी आसानी से नहीं... इसके पीछे कई ठोस कारण हैं, जो हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव को दर्शाते हैं...
सबसे पहली बात, भारत का संविधान सिर्फ़ एक कानूनी किताब नहीं है, बल्कि यह समाज की विविधता और लोकतंत्र की गहराई को समेटे हुए है... इसका सबसे बड़ा गुण है लचीलापन... जब भी देश में सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ा, तो संविधान ने संशोधन और व्याख्या के रास्ते खोल दिए..यही वजह है कि किसी भी वर्ग या समुदाय को ऐसा महसूस नहीं होता कि उनकी आवाज़ पूरी तरह दबा दी गई है..
दूसरी बात आती है भारत के संघीय ढाँचे की... यहाँ सत्ता सिर्फ़ केंद्र में सिमटी नहीं है, बल्कि राज्यों और स्थानीय संस्थाओं तक बँटी हुई है.. पंचायतों से लेकर नगरपालिकाओं तक लोकतंत्र की जड़ें फैली हैं.. इसका मतलब यह है कि यदि केंद्र में अस्थिरता भी हो, तो पूरा सिस्टम धराशायी नहीं होता.. सत्ता का यह विकेंद्रीकरण एक बफर की तरह काम करता है, जो तख़्तापलट जैसी अचानक की घटनाओं को लगभग असंभव बना देता है..
तीसरा कारण है—भारतीय सेना और संस्थागत परंपराएँ कई एशियाई और अफ़्रीकी देशों में तख़्तापलट सेना के सहारे ही हुए हैं.. लेकिन भारत में सेना ने हमेशा स्वयं को लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन माना है.. यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है...यहाँ सैन्य शक्ति राजनीतिक महत्वाकांक्षा का साधन नहीं बनी, इतिहास ऐसे उदाहरणों की गवाही देता है...
चौथा पहलू है भारत की सांस्कृतिक विविधता। यहाँ धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीय पहचानें इतनी विविध हैं कि किसी एक विचारधारा या शक्ति को सम्पूर्ण समर्थन मिलना कठिन है.. यह विविधता कभी-कभी चुनौती भी लगती है, लेकिन तख़्तापलट रोकने में यही सबसे बड़ी ताक़त है.. क्योंकि क्रांति या सत्ता-परिवर्तन तभी सफल होता है जब जनता एकजुट होकर एक ही दिशा में खड़ी हो...भारत में यह स्थिति दुर्लभ है...
इसके अलावा भारत का लोकतांत्रिक अनुभव भी बहुत गहरा है.. आज़ादी के बाद से लेकर अब तक करोड़ों लोग वोट डालते रहे हैं, सत्ता बदलते देखी है, और शांतिपूर्ण तरीक़े से सरकारें गिरती-बनती रही हैं...जनता ने समझ लिया है कि बदलाव का रास्ता बंदूक़ नहीं, बल्कि बैलेट बॉक्स है... यही विश्वास लोकतंत्र को मज़बूत करता है.. इतिहास में आपातकाल के बाद भी जनता ने बुलेट नहीं बैलेट से जवाब दिया...
अधिकांश जागरूक नागरिक जो आज के वैश्विक हालात को भी भली भांति समझते हैं और सुपर पावर्स के द्वारा रचे षड्यन्त्र में नहीं फंसते, चाहे कोई कितना भी बरगला ले, हमें अपने संवैधानिक मूल्यों पर बहुत भरोसा है और यही भरोसा यहां तख्तापलट को असम्भव सा बना देता और उनके सारे मंसूबे को नेस्तनाबूत कर देता...
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत की मीडिया और न्यायपालिका लोकतंत्र की सेफ़्टी वाल्व की तरह काम करती हैं... मीडिया की ताक़त है कि वह जनता तक सच्चाई पहुँचाती है, और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि संविधान के मूल्यों की रक्षा हो.. यह दोनों संस्थाएँ मिलकर किसी भी अधिनायकवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगा देती हैं...
अब प्रश्न यह उठता है कि अगर इतनी सारी सुरक्षा दीवारें हैं तो क्या तख़्तापलट कभी हो ही नहीं सकता? लोकतंत्र में यह दावा करना भी अतिशयोक्ति होगा... हाँ, आंतरिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और असमानता जैसी समस्याएँ जनता के बीच असंतोष ज़रूर पैदा करती हैं...लेकिन इस असंतोष का परिणाम तख़्तापलट नहीं, बल्कि चुनावों में सत्ता परिवर्तन के रूप में सामने आता है...यही भारतीय लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है...
संक्षेप में कहा जाए तो भारत में तख्तापलट एक सैद्धांतिक कल्पना हो सकती,व्यावहारिक हक़ीक़त नहीं... हमारे संविधान का लचीलापन, संघीय ढाँचे की मज़बूती, सेना की तटस्थता, समाज की विविधता,जागरूक नागरिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं का जीवंत होना यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत में यह इतना आसान नहीं... लोकतंत्र की कई चुनौतियों का सामना भारत कर रहा है,मगर यहां के लोगो को इनका समाधान भी लोकतंत्र में ही दिखता...
यही वजह है कि जब दुनिया के कई लोकतंत्र अस्थिरता के भंवर में फँस जाते हैं, भारत वहाँ अपनी जड़ों को और गहरी करता जाता है... तख़्तापलट के बजाय यहाँ सत्ता परिवर्तन बैलेट से होता है, और यही हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है...
प्रभाकर कुमार 'माचवे'
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