अपने या सपने
मगर सच कहें तो दुःखी दोनों ही हैं...
पहला व्यक्ति जब रात को बिस्तर पर करवटें बदलता है तो उसके भीतर एक हूक उठती है—“काश, मैंने वो सपना पूरा किया होता !” और दूसरा जब अपनी सफलता की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा होता है, तो उसे भी कहीं न कहीं अपनेपन की कमी सालती है—“काश, ये सब बाँटने के लिए अपने साथ होते !”
दरअसल, जीवन किसी गणितीय समीकरण की तरह सरल नहीं है... यहाँ ‘सही’ और ‘ग़लत’ का तराजू अक्सर परिस्थितियों और स्वभाव से झुकता है..
- कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और रिश्तों का दबाव हमें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जिससे अपने सपनों को रोकना पड़ता है.…
- और कभी हमारे भीतर का स्वभाव—आज़ादी की प्यास, उड़ान की ललक—हमें अपनों से दूर खींच ले जाती है...
जरा सोचिए, जो पुत्र गाँव में रहकर पिता की खेती सँभालता है, वह अपने सपनों का त्याग कर रहा है...और वही पुत्र यदि महानगर जाकर कोई नौकरी करता है, तो अपनों के प्रेम से वंचित हो जाता है... दोनों की कहानियाँ अलग हैं, पर उनके भीतर एक साझा पीड़ा है—पछतावा...
जीवन का यह द्वंद्व हमें बार-बार सिखाता है कि यहाँ कोई पूर्ण विजेता नहीं होता... दोनों राहों पर चुनौतियाँ हैं, दोनों में दर्द है, और दोनों में एक अधूरापन छिपा हुआ है...
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमें जीवन केवल इसी द्वंद्व में काट देना चाहिए ?
क्या ‘अपने’ और ‘सपने’ हमेशा दो अलग दिशाएँ हैं ?
क्या यही एक मात्र सत्य है कि 'एक को चुनना ही नियति है' ?
शायद नहीं....
आज के इस तकनीकी और गतिशील युग में, जब दुनिया हमारी हथेलियों में सिमट आई है, तो क्यों न हम दोनों को साथ लेकर चलें ?
क्यों न अपनों की मुस्कुराहट के साथ ही नए सपनों का ताना-बाना बुनें ?
सपनों का सौंदर्य यही है कि वे पूरी तरह हमारी कल्पना पर आधारित होते हैं—हम चाहे तो उन्हें अकेले जी लें, या फिर अपनों के संग एक नया सपना गढ़ लें...
जीवन का असली आनंद ‘अपने बनाम सपने’ में नहीं, बल्कि उनके समन्वय में है...
और शायद यही जीवन का सबसे सुुंदर समंवय होगा - जहाँ अपने भी हों और सपने भी...
प्रभाकर कुमार 'माचवे'
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