घूंघट में खान सर की दुल्हनियाँ...
पूरे भारत के हिंदी पट्टी के सबसे चर्चित शिक्षक खान सर ने भारत-पाक युद्ध के समय गुपचुप तरीके से शादी कर ली, जिसका कारण उन्होंनें पारिवारिक दबाव को बताया... और सबसे खुशी की बात यह है कि इस शादी का खुलासा उन्होंने अपने क्लास में अपने बच्चों को बताकर किया और क्लासरूम खुलकर कहा कि कि उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उनके स्टूडेंट्स हैं...
मगर, २ जून को अपने पारिवारिक सदस्यों व पूरे भारत के सभी स्टार्स शिक्षकों व राजनेताओं के साथ उन्होंने अपनी शादी का रिसेप्शन पार्टी रखा... और हैरतअंगेज बात यह है कि इस रिसेप्शन पार्टी में खान सर की दुल्हनियाँ A.S khan घूंघट में थी...एक लाइव वीडियो में तो मैंने यहाँ तक देखा कि सभी अतिथि खान सर को ही बधाई स्वरूप तोहफे देकर, उन्हीं के साथ फोटो खिंचवाकर स्टेज से उतर रहे थे... दुल्हनियों का न कोई स्वागत, न उनसे कोई बात... फोटो की तो बात ही छोड़िए, सभी ने उसी घूंघट वाली के साथ फोटो खिंचवाई जिनकी तस्वीर देखने के लिए गूगल पर सर्च किया जा रहा है।
खान सर... के साथ यह पहला मुद्दा नहीं है ,ऐसी रहस्यमयता पैदा करना इनकी फितरत रही है। शुरुआत में जब इनकी वीडियो वायरल हुई तो इनके हिंदू अमित सिंह होने की खबर को अपनी पहचान खूब उछाला गया... सनसनी पैदा करना इनकी पुरानी आदत है..इनके बिजनेस का एक प्रोपेगेंडा रहा है ..या ऐसा करना इन्हे अच्छा लगता है।
अब आइए बात करते हैं कि रिसेप्शन में दुल्हन का इस कदर घूंघट में रहना..... क्या कोई प्रोपेगेंडा का हिस्सा है या फिर एक ऐसा सामाजिक दबाव जिससे एक चर्चित शिक्षक भी बाहर नहीं निकल पा रहा.... कई लोग इसे व्यक्तिगत नीज़ता का मामला बतला रहे, जो सरासर बेबुनियाद है... यदि इसे निजी ही रखना था तो यह रिसेप्शन के नाम पर जमघट लगाने की क्या जरूरत थी ? रिसेप्शन का सीधा व सरल अर्थ होता है स्वागत... किसका स्वागत, दुल्हन का.. नई नवेली दुल्हन का..अपने परिवार व मित्रों के द्वारा... और जब दुल्हन ही घूंघट में हो तो क्या सच में उसका स्वागत हुआ, क्या वह अन्य सदस्यों के साथ घुल-मिल पाई... क्या उसका सच में रिसेप्शन हुआ ?
कुछ लोग कह रहे कि यह एक लड़की का निजी फैसला हो सकता है। तो मेरा सवाल है कि क्या यह फैसला किसी कुंठित सोच व संकीर्णता के साथ उसके परवरिश का परिणाम तो नहीं...क्या एक समाज के नाते हमारी रूढ़िवादी परवरिश का प्रतिफल तो नहीं ?
खान सर.. एक पब्लिक फिगर है... समाज उनसे प्रेरणा लेता है और ऐसे लोग अगर इस तरह की रूढ़िवादी परंपराओं को प्रश्रय देगे तो हम कैसे एक प्रगतिशील समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ स्त्री-पुरुष को समान समझा जाए...
पूरे दुनिया में स्त्री को लेकर तीन अवधारणा है एक अरब में है वो स्त्री को प्राइवेट प्रोपर्टी समझते, दूसरी यूरोप की अवधारणा जो लेडी को पब्लिक प्रॉपर्टी समझती...और तीसरी भारत की अवधारणा जो नारी को नारायणी मानते वामांगी मानते...
और इस भारत के सबसे चर्चित शिक्षक की दुल्हनियाँ अपने रिसेप्शन पार्टी में घूंघट में रहे इसे कोई कितना भी निजी मामला क्यों न कह दै मगर यह मूलतः हमारी प्रगतिशीलता के गालों पर तमाचा है, विशेषकर मुस्लिम समाज के लड़के इस घटना के बाद और अधिक पोजेसिव होंगे और अपनी पत्नी को और अधिक बंदिश में रखने का प्रयास करेंगे और यह तर्क देंगे कि खान सर जैसे पढ़े लिखे शिक्षक ऐसा कर रहे तो जरूर कोई सार्थक बात है !
मैं अंगों के फूहड़ प्रदर्शन का समर्थक नहीं और न ही हमारी संस्कृति हमें ऐसा करने की बात सिखलाती...किंतु, एक लड़की के स्वागत के लिए हुए इतने बड़े कार्यक्रम में उसे अपने अतिथियों तक को चेहरा न दिखाना और न ही उन्हें अच्छे तरीके से देखना, एक स्त्री गरिमा, उसकी निजी पहचान का अपमान नहीं !
कुछ लोग इसे परम्परा का नाम देकर, खान सर व उनकी पत्नी की तारीफ़ भी कर रहे... मैं उनसे पूछना चाहूंगा कि 21वीं सदी के इस प्रगतिशील समाज में परम्परा के नाम पर ऐसे कृत्यों को इतने चर्चित शिक्षक के द्वारा प्रोत्साहन देना, क्या हमें रूढ़िवादिता के जंजीरों में जकड़ तो नहीं रहा...
एक तरफ हमारा देश नारी सशक्तिकरण को अपने 11 संकल्पों में शामिल करके आगे बढ़ रहा है, देश की सेना के कारनामों को व्योमिका सिंह और सोफ़िया कुरैशी पूरी दुनिया के सामने बेबाकी से रख रही,देश में पहली NDA की महिला टुकड़ी ने अपने कोर्स को पुरुष के समान ही पूरी दक्षता से पूरा किया है... जीवन के हर क्षेत्र में नारी ने यह साबित किया है कि वो किसी मामले में पुरुषों से कमतर नहीं है...और वहीं दूसरी तरह अपने ही स्वागत समारोह में घूंघट में खान सर की दुल्हनियाँ...
सम्भवतः एक स्त्री के तौर पर यह घूंघट में रहना उस स्त्री का अपना फैसला हो किंतु यह देखना दिलचस्प होगा कि खान सर के संसर्ग में उसकी चेतना का कब विकास होता ? वरना, शिक्षा से क्रांति का बिगुल फूंकने वाले खान सर जैसे शिक्षक घर में ही एक स्वतंत्र माहौल बनाने में असफल हो जाएंगे तो यह हास्यस्पद है...
प्रभाकर कुमार 'माचवे'
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