मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता !

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता !

सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...
                    जब कोई सरकार जनता की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो उसकी यह मौलिक जिम्मेवारी बनती है कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले उसे वो पब्लिक डोमेन में लाए,इससे उसके निरंकुश व्यवहार का अंदेशा कम होगा...

 जिस तरह से सोशल मीडिया पर बिना किसी फ़िल्टर के सूचनाओं का बेतरतीब प्रवाह हो रहा उसमें यह बेहद जरूरी है कि किसी भी  ऐसी योजना को लागू करने से पूर्व केंद्र सरकार को राज्य सरकार और विपक्ष को भी समायोजित तरीके से अपने पक्ष में करने की कोशिश की जानी चाहिए...
मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता !

सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...
                    जब कोई सरकार जनता की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो उसकी यह मौलिक जिम्मेवारी बनती है कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले उसे वो पब्लिक डोमेन में लाए,इससे उसके निरंकुश व्यवहार का अंदेशा कम होगा...

 जिस तरह से सोशल मीडिया पर बिना किसी फ़िल्टर के सूचनाओं का बेतरतीब प्रवाह हो रहा उसमें यह बेहद जरूरी है कि किसी भी  ऐसी योजना को लागू करने से पूर्व केंद्र सरकार को राज्य सरकार और विपक्ष को भी समायोजित तरीके से अपने पक्ष में करने की कोशिश की जानी चाहिए...

जिस तरह सरकार अग्निपथ योजना के तहत रोज नए-नए प्रावधान जोड़ रही, चाहे वो 2 वर्ष की रियायत हो या अलग-अलग मंत्रालय द्वारा अग्निवीरों को दिए जाने वाली आरक्षण का प्रावधान...यह कहीं न कहीं इस बात को इंगित कर रहा कि इस पर उतनी चर्चा तो नहीं ही हुई है जितनी होनी चाहिए थी...

 सरकार की योजना निर्माण में  NDA के प्रतिनिधियों से भी बात होती है,मुझे इस पर सन्देह हो रहा है...

क्या वर्तमान में सरकार सिर्फ मोदीजी और उनके कुछ करीबी मित्रों के इर्द गिर्द तो नहीं चल रही ?

कृषि बिल और अग्निपथ योजना में सरकार अपने पूरे सांसद को भी विश्वास में लेने में नाकामयाब रही है,पहले जनता तक सूचनाओं का इतना तीव्रता से प्रवाह नहीं होता था किंतु आज की तारीख़ में सूचनाएं भले वो गलत ही हो उनका तेजी से वायरल हो जाना कहीं न कहीं किसी भी योजना को लागू  करने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता जान पड़ रही है...

कमजोर विपक्ष को यदि सत्ता पक्ष इसी कदर नज़रअंदाज़ करती रही तो ऐसी हिंसात्मक विरोध से आम जनों को परेशानी का सामना करना पड़ता रहेगा ! लोकतंत्र भले ही बहुमत की सरकार का शासन है,किन्तु इसे सर्वमत से ही चलाया जाए तो बेहतर है...

सरकार को यथाशीघ्र देश और राज्य स्तर पर सभी विपक्षी दलों के प्रमुख को एकजुट कर अपनी योजना को बड़ी स्पष्टता से प्रस्तुत करने का प्रयास करना चाहिए,क्योंकि छात्रों का कोई निश्चित संगठन नहीं अतएव विपक्षी दल और देश की प्रमुख मीडिया विशेषकर तथाकथित मोदी सरकार की सख्त आलोचना करने वाले पत्रकारों के समूह के साथ शीर्ष अधिकारी के संवाद के ज़रिए ही इस हिंसा को रोकने में सफलता पाई जा सकती....

"बात करने से ही बनेगी बात"....

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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