विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन !

विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन !

आज पूरे देश में अग्निपथ योजना के विरोध में जिस तरह के हिंसात्मक रुख देखने को मिला है,उससे यह बात तो स्पष्ट है कि सेना में भर्ती के लिए इच्छुक युवा कभी भी देश की सम्पत्ति को जला नहीं सकता,और यदि वो ऐसे हिंसा को जायज मानता है तो निश्चित तौर पर उसके सेना में आने का कोई मतलब नहीं !
                                      मैं मानता हूँ, एक अभ्यर्थी होने के नाते इस नई योजना के प्रति सन्देह होना स्वाभाविक है,सवाल किए जाने चाहिए...यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है...किन्तु, जिस प्रायोजित तरीके से इसे हिंसात्मक रूप दिया गया है वो निश्चित तौर पर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करता है...
     देश के किसी भी शीर्षस्थ विपक्षी नेता का एक भी ट्वीट इस हिंसा के विरोध में न आना कहीं न कहीं उनके मौन समर्थन को रेखांकित करता है...
                                          सत्ता से दूरी यदि इस कदर युवाओं के भविष्य के साथ खेलने पर मजबूर कर रही है,तो यक़ीनन यह लोकतंत्र की आत्मा की हत्या है...
                           यदि इस तरह की हिंसात्मक विरोध की वजह से युवाओं का नाम किसी मुकदमे में दर्ज हो जाता है तो क्या विपक्ष उसकी जिम्मेवारी लेगा ?

एक सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की जीवन्तता की अनिवार्य कसौटी होता है,किन्तु पिछले दो मामलों में चाहे वो पिछले शुक्रवार को नूपुर शर्मा के बयान पर हुई पत्थरबाज़ी की घटना हो या फिर इस शुक्रवार को हुई यह ट्रेन जलाओ उपद्रव ! इनदोनो ही घटनाओं में विपक्ष में सुलगती आग पर अपने मतलब की सियासी रोटी सेंकने का काम किया है...

#विपक्ष 

प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से...

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