कबीर...एक फक्कड़
कबीर...एक फक्कड़...
समय की कसौटी पर परखा गया वो आदमी जिसने अपनी निडरता से, अपने बेख़ौफ़ अंदाज़ से, बेबाकी से पूरे समाज की दिशा व दशा को बदलने का साहस किया...
कबीर...हिंदी साहित्य के जेम्स बांड है, जो काशी के चौराहे से हिन्दू संस्कृति की रूढ़िवादिता पर सीधा तंज कसने का जिगरा रखते हैं...पूरे देश में जिस वक्त मुस्लिम आक्रांताओं के भय से कोई घरों से निकलने का दुस्साहस नहीं करता था उस वक़्त जो मौलानाओं के भोरे के अज़ान को बहरे खुदा को सुनाने की बात कहने, का साहस शायद ही किसी और में हो...
मैं जब भी कबीर को पढ़ता हूँ न...मेरे भीतर एक अज़ीब सी शक्ति का संचार हो जाता, एक निर्भीकता आ जाती...
व्यक्तित्व में एक अलग ही फक्कड़पन आ जाता....
बुद्ध और महावीर का सन्यास भौतिकता की चरमता पर पहुंचकर हुई विरक्ति से पैदा हुआ है,किन्तु कबीर...एक ऐसा प्रबुद्ध पुरूष जो बिल्कुल ही सामान्य जुलाहे की ज़िंदगी जीकर ईश्वर के प्रति इतना गहरा अनुराग रखकर भौतिकता की तुच्छता का भान रखते हैं...
कबीर आम आदमी का एक विश्वास है,कि परमानन्द को पाया जा सकता...बुद्ध और महावीर की प्रबुद्धता को देखकर तनिक संशय होती कि इतना तप,संयम कौन करें ?
किन्तु, कबीर...जनमानस के लिए सबसे सुलभ मार्ग प्रेषित करते हैं और भरोसा दिलाते हैं कि जब कबीर को परमानन्द मिल सकता तो किसी को भी मिल सकता !
कबीर जयंती पर उन्हें नमन !
हम सभी कभी भी अपने भीतर के कबीर को मरने न दें,यही उनको एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी..
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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