सिद्धार्थ से बुद्ध की यात्रा
दुनिया के पहले धर्म वैज्ञानिक के पावन जयंती पर श्रद्धासुमन अर्पित !
बुद्ध...यह नाम सुनते ही मस्तिष्क पटल एक यात्रा की तस्वीर खींच जाती है..."सिद्धार्थ से बुद्ध तक का सफ़र"...
एक ऐसा राजकुमार जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा था,भौतिक संसार की हर सुख सुविधाएं उसके पास थी...लेकिन,फिर भी उसे किसी और की तलाश थी...
भौतिकता की संकीर्णता और क्षुद्रता को परिलक्षित करता है यह सफ़र... बुद्ध ने चेतना के वजूद को इतनी वैज्ञनिकता से स्थापित किया है,कि आज भी रहस्य बनकर ही हमारे सामने है,कि कोई मनुष्य अपने भीतर इतनी सूक्ष्मता से यात्रा कैसे कर सकता है!
बुद्ध ने कभी भी अपने सत्य को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं किया,उन्होंने सदैव माना कि एक गुरु होने के नाते वो अपने शिष्यों में सत्य की खोज के प्रति इच्छा को जीवित भर ही कर सकते ,सत्य के मार्ग पर चलना तो उन्हीं को है...
वर्तमान समय में ज्ञान का जो बाज़ारीकरण हुआ है,उससे आध्यात्मिकता भी बस दिखावे की चीज़ बनकर रह गयी है...और आज के तारीख़ में ये बेहद अनिवार्य हो गया है कि भौतिकता के इस चकाचौंध को छोड़कर हम कुछ वक्त के लिए भीतर की ओर मुड़े... भीतर की यात्रा करें..आत्मवार्तालाप करें...तनिक मौन होकर 'मैं कौन हूँ?' इस सवाल को भीतर कौंधने दें...
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से....
#BuddhPurnima
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