अलसंख्यक समाज किन्तु भारत के विकास में सबसे आगे !

वो सम्प्रदाय जो अपने अल्पसंख्यक होने का रोना नहीं रोते, बल्कि देश की प्रगति में बढ़-चढ़ हिस्सा लेने को लालायित रहते हैं...
              वो सम्प्रदाय जिनकी भारत की कुल आबादी में हिस्सेदारी मात्र 0.37% है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनकी भारत के कुल टैक्स में हिस्सेदारी लगभग 24% है..  

जी हां, दोस्तों...मैं बात कर रहा "जैन सम्प्रदाय"की...मुझे इस बात का गर्व है,कि भले ही मेरा जन्म किसी जैन परिवार में नहीं हुआ लेकिन तीर्थंकर महावीर विद्या मंदिर में पढ़कर सात्विकता और राष्ट्रप्रेम ने मेरी आत्मा तक को सिंचित किया है...

भगवान महावीर स्वामी के त्याग,संयम और संकल्प से सिद्धि के मंत्र ने मेरे जीवन को सत्मार्ग की ओर प्रेरित किया है...बारूद की ढ़ेर पर बैठी इस दुनिया को यदि कोई बचा सकता है वो है सत्य व अहिंसा का सिद्धांत...

आज भारत के हर प्रतिष्ठित कार्यों में अपनी श्रेष्ठ भूमिका देकर यह समाज पूरे विश्व में अपनी दिव्य पहचान बनाने में सफल हुआ है...पूरे भारत में 16000 पंजीकृत गौशालाओं में से 12000 का संचालन जैन समाज के द्वारा हो रहा है,ये आंकड़े इस बात को स्थापित कर रहें कि यह समाज सनातन भारतीय संस्कृति का सबसे प्रमुख संरक्षक है..  

भारत के पर्यटन में एक बड़ा हिस्सा जैन समाज का होता है,जिससे अर्थव्यवस्था को तीव्र गति प्रदान होती है...महावीर स्वामी के आदर्शों को व्यावहारिक स्तर पर स्वीकारते हुए यह समाज न सिर्फ 100 फीसदी अहिंसा के मार्ग पर चलता है बल्कि भारत की कुल दान राशि का 62% दान करके अपरिग्रह के व्रत का पालन करते हुए जरूरतमंदों की मदद करने में सबसे आगे होता है...
                            99 के चक्कर में पड़े आज के भौतिकवादी युग में इस तरह का व्यवहार बिना संस्कार के असम्भव है.. 

देश के अलग-अलग क्षेत्र चाहे वो साहित्य का हो, प्रशासनिक सेवा का हो या व्यापार का...हर क्षेत्र में जैन समाज ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवा दिया है...

JITO जैसी अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संगठन की स्थापना करके इन्होंने पूरे विश्व को यह साफ सन्देश दिया है कि यदि रगों में संस्कार का प्रवाह हो तो आर्थिक संवृद्धि भी पाई जा सकती है...और वो आर्थिक संवृद्धि से राष्ट्र कल्याण किया जा सकता है...

पूरे विश्व के जितने भी अल्पसंख्यक समुदाय हैं,उन्हें जैन समाज से प्रेरणा लेते हुए ये संकल्प लेना चाहिए कि कम संख्या सुविधाओं की मोहताज़ नहीं बनाती बल्कि संगठित होकर राष्ट्र निर्माण में सहायक भी हो सकती !

प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से.. 

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