ऐसे मनाये 'कलम के सिपाही' का जन्मदिन !

समाज की विषमताओं पर कलम से चोट का प्रहार करने वाले "कलम के सिपाही" का आज जन्मदिन  है...आज मुझे ज्वर से तड़पते एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा सामने दिख रहा जिसे परमात्मा ने जीवन के अंतिम दिनों में शारीरिक वेदना के गहरे आघात दिये...

प्रेमचन्द्र की कलम समाज के चीखती पुकार को,अंतर्मन में उपजी पीड़ा को,परिवार के आंतरिक कलह को,अंग्रेजी शासन के शोषण को,बदलते वक्त की तस्वीर को जीवंतता के साथ पन्नो पर उकेरती है...
                                          प्रेमचन्द्र के उपन्यास हो या फिर कहानियां...अपने आप में जीवन की समग्रता को समेटने का अद्भुत काबिलियत रखती है...
                                           प्रेमचन्द्र हिंदी साहित्य से लोगो को जोड़कर रखने वाले एक गज़ब के कथानक थे...आज प्रेमचन्द्र की आत्मा खुद को न जाने क्यों कोसती होगी, हिंदी के गिरते स्तर,लेखको के व्यापारपने पर...मीडिया की दलाली पर...

आज कलम भूल गया है अपना दायित्व..और जिस समाज का कलम अपने दायित्व के निर्वहन से चूक जाए,उस समाज के भविष्य के उज्ववलता की परिकल्पना करना व्यर्थ है..

प्रेमचन्द्र की जन्मदिन पर यदि कोई सच्चा उत्सव होगा तो वो होगा..

"कलम से समाज में लानी होगी पुनर्जागृति,कलम से बचानी होगी अपनी संस्कृति, कलम से ही करनी होगी क्रांति"....

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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