श्रीलंका से मैंने क्या सीखा ?
जनता के हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है...
जनता जिधर चाहती है,काल उधर ही मुड़ती है...
बीता गवाक्ष अम्बर दहके जाते हैं,
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो....
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...
श्रीलंका के इस हाल की पटकथा किसी एक दिन में नहीं लिखी गयी है...राजनीति के सत्ता पर परिवारवाद के दीमक ने उसे ऐसा खोखला किया है कि आज उसकी जनता दाने-दाने को मोहताज़ हो गयी है...
पड़ोसी की इस बदहाली पर चुटकी लेने वाले इससे सतर्क हो जाएं...यदि राजनीति की धुरी यदि सिर्फ एक परिवार या किसी व्यक्ति विशेष के ही इर्द गिर्द घूमेगी तो यही हश्र होगा...
श्रीलंका की इस घटना से मुझे मिली निजी जीवन के लिए एक बड़ी सीख -
कभी भी अपने जीवन की अर्थव्यवस्था को सिर्फ एक तम्बू पर खड़े रहने न दें, मतलब multi source of income 21वीं सदी की मौलिक आवश्यकता है...वरना कोरोना जैसे भूचाल तबाही मचा देंगे"...
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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