अब वो चिट्ठी नहीं आती !

अब चिट्ठी नहीं आती....

वो भी क्या दिन थे,जब चिट्ठी आया करती थी...अपने साथ संवेदना भरी सन्देशा लाया करती थी...चिट्ठी जिसमें संलिप्त होते थे पिताजी की डांट,माँ की दुलार,बहन का स्नेह,भाई की परवाह....

"आज फोन पर बातें तो होती है हज़ार...मगर वो प्यार नहीं...चिट्ठी के लिए बेसब्री भरा वो इंतज़ार नहीं....शब्दों का जादुई संसार नहीं...संवेदना भरी पुकार नहीं...."

आधुनिकता की दौर में यक़ीनन हमनें बहुत कुछ खोया है, करीब आने की जद्दोजहद में न चाहकर भी दूर हो गए हैं हम...फोन पर की गई घण्टों बातें बेफिजूल लग रही है, वो चिट्ठी दौर ही कितना प्यारा था, कितनी बेसब्री होती थी...

बॉर्डर से सब सैनिक का ख़त उसके घर आता होगा तो कितनी सहजता से छलक पड़ते होंगे आंसू...कितनी मासूमियत से संस्कार भरे शब्दों के आवरण में पूछता होगा वो अपनी पत्नी का हाल...

जब एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को लिखता होगा पहला ख़त तो कितनी संवेदना होगी उसमें, वो झिझक...वो डर...वो प्रेम का इजहार...वो बातें...वो मुलाकातें...और न जाने क्या-क्या ?

सच में, आज चिट्ठी नहीं आती...
डिजिटल दौर में वीडियो कॉल पर की गई बात में भी वो एहसास नहीं, जो किसी के ख़त को पढ़ते वक्त को खास बनाता है..."तेरे शब्द-शब्द दर्पण हैं, ख़त में ही वो प्रेम,संवेदना और समपर्ण  हैं "....

तो, क्यों न ?

एक कोशिश की जाए...साल में बहुत ही खास दिन अपने करीबियों को एक चिट्ठी भेजी जाए...कमसेकम एक चिट्ठी...एक ख़त... और वो एक लिफ़ाफ़ा... यक़ीन मानिये, आपका वो ख़त आपके उस खास के लिए बेहद ही खास होगा...

तो चलिए एक नई शुरुआत करते हैं...अपने सबसे खास को एक ख़त लिखते हैं....

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से....


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