इन्तेहाँ हो गयी थी इंतेज़ार की !
इन्तेहाँ हो गई थी...इंतेज़ार की...
1021 दिनों के बाद किंग कोहली के बल्ले से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में शतक आया...एक ऐसा बल्लेबाज जिसके बल्ले से हर साल करीब 10 शतक आ रहे हो, जो 70 शतक के आंकड़े को ऐसे छू लिया था,जैसे उसका बल्ला नहीं कोई रन मशीन हो...क्रिकेट के हर शॉट में ऐसा क्लासिक अंदाज़ जिसे देखकर दुश्मन भी वाह-वाह कर उठे...
इन आँखों को आप गौर से देखें...कितनी मासूमियत है...एक अजीब सी ख़ुशी, जो छलक पड़ रही है...
मैं तो उनके जीवन की ये 1021 बीती रातें का अनुमान लगा रहा, हर वो रात...जब विराट खुद के बेहद करीब होते होंगे... रात का वो पहर जब नींद न आती और उठने का मन भी नहीं करता होगा...उस वक़्त रोज क्या सोचते होंगे वो ?
आख़िर अगला शतक कब ?
आज उनकी आंखों से छलकते खुशी के आँसू...साफ बयां कर रहे थे कि ये शतक उनके लिए कितना मायने रखता है...वो बच्चों की तरह मासूमियत से मुस्कुराना,अपने लॉकेट को चूमना..हेलमेट को खोलकर बल्ले को उठाना...
ये देखकर मुझे बस...यही चार पंक्तियाँ याद आ गई...
"रख हौसला वो मंज़र भी आएगा,
प्यासे के पास चलकर खुद समंदर भी आएगा...
थक कर यूँ न बैठ, मंजिल के मुसाफ़िर,
मंज़िल भी मिलेगी, मिलने का मजा भी आएगा"
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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