स्पोर्ट्स फीस के नाम पर लूट !
स्पोर्ट्स फीस के नाम पर लूट !
जी, हां दोस्तों...विद्यालय सरकारी हो या प्राइवेट बड़े पैमाने पर वहां खेल शुल्क के नाम पर वर्षों से लूट हो रही है..जिले के अधिकांश सरकारी और प्राइवेट स्कूल के पास खेल के मैदान तक नहीं हैं...खेल सामग्री के नाम पर वही टूटे फूटे 2 बैट, एक दो बैडमिंटन,एक फुटबॉल और कैरमबोर्ड...
इलाके के 90% प्राइवेट और सरकारी स्कूल के पास खेल मैदान नहीं है...
सरकारी विद्यालय में औसतन सभी बच्चों से लगभग 100 रुपये प्रति वर्ष खेल शुल्क लिया जा रहा और इसे संख्या से गुणा किया जाए तो कुल रकम लाखों में पहुंच जाती है...जिनसे 1-2 वर्षों में मैदान खरीदा जा सकता,उच्च स्तर के खेल संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते...
वहीं प्राइवेट स्कूल में ये शुल्क 300 से 500 रुपये प्रतिवर्ष वसूला जा रहा, यदि विद्यार्थियों की कुल संख्या औसतन 800 मानी जाए तो ये आकंड़ा करीब 3 लाख सलाना हो जाता है और आश्चर्य की बात ये है कि इन स्कूलों में न ही खेल शिक्षक होते... न ही खेल के संसाधन...खेल के मैदान की बात ही क्या कहें !
मेरा अभिभावकों से नम्र निवेदन होगा कि अबकी जब आप पैरेंट टीचर मीटिंग में जाएं तो ये सवाल जरूर उठाएं... क्योंकि ये आपका हक है...
इससे न सिर्फ आपके धन का नुकसान हो रहा,बल्कि इसे बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय क्षति भी हो रही...बहुत सारी प्रतिभाएं संसाधनों की लूटमारी की वजह से अच्छे मुकाम तक नहीं पहुंच पाती...यदि भारत को विश्व गुरु बनना है तो खेल के नाम पर हो रहे लूट के खेल को बंद करना होगा !
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
#जागोअभिभावकजागो #खेल
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