ज़िन्दगी : ताश का खेल


52 पत्तों के ताश का खेल है यह जिंदगी...
 बड़ा रोचक है यह खेल ..हर किसी के पास अपने- अपने पत्ते, हर कोई एक दूसरे से अनजान..
 फिर भी सब में जीतने का वही जुनून.. वही प्यास.. वही शिद्दत...

 जिंदगी हो या ताश का खेल इसकी अनिश्चितता ही इसे रोचक बनाती है। यदि जिंदगी में सब कुछ पूर्व निर्धारित हो तो जिंदगी नीरस हो जाएगी । यकीनन, ताश के खेल में पत्ते हर बार मन पसंद नहीं आते, कभी बुरे पत्ते आते तो कभी अच्छे पत्ते ..  ताश के खेल की तरह जिंदगी भी कुछ अपना खेल ऐसे ही खेला करती है ।

बुरे पत्ते देखकर खेल छोड़ देना सबसे बड़ी मूर्खता है और अच्छे पत्ते पाकर कोई अपनी जीत की गारंटी कर रहा है यह भी सरासर अन्याय ही है।

 खेल को खेलना और जिंदगी को बेहतर बनाने के प्रयास में जीना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। जिस तरह कम शक्ति वाले पत्ता भी मौका मिलते ही बड़ा खेल दिखा देता है ठीक उसी प्रकार कभी भी कोई भी जिंदगी के इस रंगमंच पर बाजी मार सकता है बस जब तक जिंदगी है खेल जारी रखना होगा...
प्रभाकर कुमार 'माचवे'

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