प्राइवेट स्कूल :- लूट घर
लूट के लिए अब बाजार सज चुका है...लुटेरों ने अपने बाज़ार लगा लिए हैं...और वो भी पूरे ताम- झाम के साथ...
जी, हां दोस्तों...अब विद्यालय वह स्थान नहीं जहां विद्या अर्जन की चाह रखने वाले विद्यार्थी जाया करते थे...बाज़ारीकरण के इस दौर में बड़े ही सलीके से इसे लूट का अड्डा बनाया गया है.. प्राइवेट स्कूलों के लिए यह महीना किसी लग्न से कम नहीं, पांच - पांच सौ की कई गड्डियां रोज रबड़ के जोड़ से खुद को बंधा हुआ महसूस कर रही है..
पिछले दो वर्षों से ऑनलाइन पढ़ाई की वजह से प्राइवेट स्कूलों को ठीक से अपने प्रायोजित कारोबार को चलाने का मौका नहीं मिल पा रहा था...इन दो वर्षों में न तो उनकी किताबें-कॉपियां (जिन पर उन्हें 50% तक का कमीशन मिलता),बिक सकी... और न ही रंग-बिरंगे बेमतलब के ड्रेस,जूते और न जाने क्या क्या...
इस बार उन दो वर्षों की पूरी वसूली का इंतज़ाम है...अभिभावक अपने जेब ढीली करने को तैयार रहें...
आज प्राइवेट स्कूल विद्यालय कम एक मॉल ज्यादा लगता है,जहां बिकती हैं कॉपियां,किताबें,कपड़े,जूते और भी कई चीजें...और एकरूपता के नाम आपको वहीं से खरीदने को होना पड़ता है मजबूर...वरना साफ कहा जाता है,कि ये नहीं कर सकते तो जाइए सरकारी स्कूल...
और बिहार में सरकारी स्कूल का क्या हाल है,वो किसी से छुपा नहीं है ....
आपको लग रहा होगा,कि ये तो बेफिजूल के व्यस्त होने का ढोंग कर रहे हमारे अभिभावकों के लिए समय की बचत के लिए ही है...
मगर,जनाब...आप ये भूल रहे इससे हमारे लोकल मार्केट पर कितना बुरा असर पड़ता,कितने लोगों की रोजगार छीन जाती....न तो बाज़ार के छोटे दुकानदारों के कपड़े-जूते बिकते,न दर्ज़ी को कोई काम मिलता,न किताब की दुकानों से बिकते किताबें और कॉपियां...क्योंकि स्कूलों में बिकने वाली ये सारी चीज़ें बड़े उत्पादकों के द्वारा पूरी कराई जाती और उस पर मिलती स्कूल प्रबंधन को एक मोटा कमीशन...
बड़ी-बड़ी ऊंची और शानदार लूटघर को कहा जाता है...स्कूल...
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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