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बागेश्वर बाबा के हिम्मत को सलाम...

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आज के समय में जब समाज तरह-तरह के झगड़ों, राजनीति और जातिगत खींचतान में उलझा हुआ है, ऐसे में अगर कोई युवा 150 किलोमीटर की पदयात्रा सिर्फ इसलिए करता है कि समाज एकजुट हो जाए — तो उसे सलाम बनता है। बागेश्वर धाम सरकार की यह “सनातन हिन्दू एकता पदयात्रा” सिर्फ दिल्ली से मथुरा तक की यात्रा नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने की यात्रा है... भारत आज जिस सबसे बड़ी बीमारी से जूझ रहा है, उसका नाम है जातिगत द्वेष... यह बीमारी धीरे-धीरे समाज की नसों में जहर की तरह फैल गई है। यह वह जहर है जो हमारे बीच नफरत, हीनभावना और अविश्वास पैदा करता है। आतंकवाद या नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक यह बीमारी है, क्योंकि यह हमारे घर, मोहल्ले और दिलों में बैठी है। दुख की बात यह है कि देश के बड़े-बड़े नेता, बुद्धिजीवी या कलाकार इस विषय पर बोलने से बचते हैं। मगर, अब एक 29 साल का लड़का आगे आया है, जो इस आग को बुझाने के लिए खुद मैदान में उतरा है... यह युवा न तो किसी राजनीतिक पार्टी का चेहरा है, न किसी पूंजीपति का मोहरा। यह वही भारत का बेटा है जो गाँव के स्कूल में पढ़ा, संघर्षों से गुजरा और अब देश को जोड़ने निक...

KBC की यह घटना बहुत कुछ कहती है...

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टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति (KBC) में घटित एक छोटी-सी घटना ने पूरे समाज को सोचने पर विवश कर दिया... मंच पर किसी बच्चे की एक हरकत ने न केवल दर्शकों को चौंकाया बल्कि सोशल मीडिया पर यह बहस छेड़ दी कि — क्या आज की परवरिश में कहीं कुछ गड़बड़ है ? क्या बच्चे अब संस्कारों की जगह केवल आत्म-प्रदर्शन में विश्वास करने लगे हैं ? दरअसल, हर बच्चा अपने परिवेश का प्रतिबिंब होता है। उसकी बातें, हाव-भाव, और व्यवहार कहीं न कहीं उस संस्कृति, घर और समाज की छाया लिए होते हैं जिसमें वह पलता-बढ़ता है... यही कारण है कि यह घटना केवल एक बालक की हरकत नहीं, बल्कि हमारे समय की परवरिश, शिक्षा और सामाजिक परिवेश पर प्रश्नचिह्न बनकर उभरी है...   परवरिश के बदलते स्वरूप   - आज के माता-पिता बच्चों को खुला माहौल देना चाहते हैं — आत्मविश्वासी, स्पष्टवक्ता और निडर बनाना उनकी प्राथमिकता है। यह निश्चय ही आवश्यक भी है, लेकिन कहीं न कहीं इस प्रक्रिया में मर्यादा और विनम्रता की रेखा धुंधली होती जा रही है...आत्मविश्वास और अभिमान के बीच का फर्क मिटता जा रहा है। यह घटना हमें यह सोचने को बाध्य करती है कि बच्चे...

अपने या सपने

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रात के एकांत में जब मनुष्य खुद से संवाद करते हुए अपने निर्णयों को टटोलता है, तो अक्सर उसके सामने दो ही राहें होती हैं-  अपने या सपने...  कोई  अपनों की मुस्कुराहट के लिए अपने सुनहरे सपनों को तिलांजलि दे देता है, तो कोई अपने सपनों की ऊँचाई के लिए अपनों  से ही दूर चला जाता है.... मगर सच कहें तो  दुःखी दोनों ही हैं.. . पहला व्यक्ति जब रात को बिस्तर पर करवटें बदलता है तो उसके भीतर एक हूक उठती है— “काश, मैंने वो सपना पूरा किया होता !”  और दूसरा जब अपनी सफलता की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा होता है, तो उसे भी कहीं न कहीं अपनेपन की कमी सालती है— “काश, ये सब बाँटने के लिए अपने साथ होते !” दरअसल, जीवन किसी गणितीय समीकरण की तरह सरल नहीं है... यहाँ ‘सही’ और ‘ग़लत’ का तराजू अक्सर परिस्थितियों और स्वभाव से झुकता है.. कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और रिश्तों का दबाव हमें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जिससे अपने सपनों को रोकना पड़ता है.… और कभी हमारे भीतर का स्वभाव—आज़ादी की प्यास, उड़ान की ललक—हमें अपनों से दूर खींच ले जाती है... जरा सोचिए, जो पुत्र गाँव में रहकर ...

क्या भारत में हो सकते तख्तापलट ?

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क्या भारत में हो सकता तख़्तापलट? भारत आज़ादी के बाद से जिस लोकतांत्रिक राह पर बढ़ा है, वहाँ तख़्तापलट की संभावना पर चर्चा अपने आप में रोचक भी है और गंभीर भी...अभी जिस तरह से दक्षिण एशियाई देशों में जिस तीव्रता के साथ   रातों-रात सत्ता बदलते देखा है,उससे इस बिंदु पर विचार करना लाज़मी हो गया है...कई देशों में बंदूक़ की नली पर लोकतंत्र को गिरफ़्तार कर लिया गया, लेकिन भारत के मामले में सवाल उठता है—क्या यहाँ ऐसा संभव है ? इसका उत्तर है— इतनी आसानी से नहीं.. . इसके पीछे कई ठोस कारण हैं, जो हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव को दर्शाते हैं... सबसे पहली बात, भारत का संविधान सिर्फ़ एक कानूनी किताब नहीं है, बल्कि यह समाज की विविधता और लोकतंत्र की गहराई को समेटे हुए है... इसका सबसे बड़ा गुण है लचीलापन...  जब भी देश में सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ा, तो संविधान ने संशोधन और व्याख्या के रास्ते खोल दिए..यही वजह है कि किसी भी वर्ग या समुदाय को ऐसा महसूस नहीं होता कि उनकी आवाज़ पूरी तरह दबा दी गई है.. दूसरी बात आती है भारत के संघीय ढाँचे की... यहाँ सत्ता सिर्फ़ केंद्र...

नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

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नेपाल में उठती अशांति और भारत की चिंता नेपाल की सड़कों पर जो हलचल मची है, उसकी गूँज केवल काठमांडू की गलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के कानों तक भी पहुँच रही है। पिछले तीन वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में हिंसक और अराजक तख़्तापलट हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सचमुच जनता की स्वतःस्फूर्त आवाज़ है या इसके पीछे कोई गहरी साज़िश बुन रही है? अक्सर लोग मान लेते हैं कि यह सब छात्रों या GenZ युवाओं के आकस्मिक आंदोलन हैं, लेकिन यह सोच सरासर भ्रम है.. दरअसल, दुनिया की बड़ी ताक़तें किसी भी देश में अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए अदृश्य चालें चलती रहती हैं। जब तक सत्ता उनके अनुकूल रहती है, सब ठीक रहता है। लेकिन जैसे ही कोई मज़बूत नेतृत्व उनके हितों पर रोक लगाता है, तभी ये महाशक्तियाँ सक्रिय होकर उस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती हैं। उनकी चाल का तरीका भी तय होता है। सबसे पहले विपक्ष को मज़बूत किया जाता है, चुनावी फंडिंग कराई जाती है और अपने मीडिया नेटवर्क व इंटरनेट कंपनियों के माध्यम से वातावरण बनाया जाता है। जब यह उपाय नाकाम होते हैं, तब तख़्तापलट की योजना ...

शिक्षक कौन ?

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शिक्षक कौन? शिक्षक—सिर्फ एक पेशे का नाम नहीं, बल्कि जीवन की अनवरत धारा है... वह वही है, जो सड़क की तरह खुद यथास्थान रहकर अनगिनत कदमों को मंज़िल तक पहुँचा देता है... उसका जीवन अपने लिए कम और दूसरों के लिए ज़्यादा होता है... जैसे मोमबत्ती खुद जलकर पिघलती है, पर आसपास के अंधेरों को रौशन कर देती है—वैसे ही शिक्षक अपने संघर्षों, तकलीफों और अभावों को परे रखकर विद्यार्थियों की आँखों में सपनों की रौशनी भर देता है... शिक्षक की मुस्कान अक्सर उसके जीवन की गहरी पीड़ाओं को ढक लेती है... बाहर से वह शांत समंदर दिखता है, भीतर कितनी ही तूफानी लहरें छिपी होती हैं। फिर भी, “मनुष्य अपने दुःख से भाग सकता है, पर शिक्षक अपने कर्तव्य से नहीं” यही उसका कर्म है और कर्म ही धर्म... वह केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहता। कक्षा में बैठा वह जीवन का दार्शनिक भी है, जो विद्यार्थियों को सिखाता है कि “सपनों से बड़ी कोई दौलत नहीं और मेहनत से बढ़कर कोई पूजा नहीं।” कभी मित्र बनकर विद्यार्थियों की उलझनों को हल्का करता है, तो कभी बड़े भाई की तरह डाँटकर राह दिखाता है... जैसे पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता, वै...

जीवन के दो बड़े निर्णय

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जीवन के ये दो बड़े निर्णय – आपकी जिंदगी को स्वर्ग भी बना सकते और नरक भी... जीवन वही है जो हम चुनते हैं... रास्ते हमारे सामने होते हैं, पर उस पर चलने का निर्णय हमारा होता है... यही वजह है कि आज हम जैसे भी हैं, वो हमारे ही चुनावों का नतीजा है... इन चुनावों में दो ऐसे निर्णय हैं जो इंसान की पूरी जीवनयात्रा की दिशा तय कर देते हैं—पहला निर्णय नौकरी और दूसरा निर्णय शादी... ये दोनों मिलकर तय करते हैं कि हमारी जिंदगी एक सुखद स्वर्ग बनेगी या क्लेशमय नरक... नौकरी महज़ रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि हमारे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और जीवन की दिशा की पहली सीढ़ी है...नौकरी चुनते समय हम अक्सर सिर्फ़ तनख़्वाह देखते हैं, लेकिन अनुभव सिखाता है कि माहौल और सीखने के अवसर कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं... एक अच्छी नौकरी इंसान के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलती है, पर गलत नौकरी ऐसा बोझ बन जाती है कि हर सुबह अलार्म की आवाज़ भी एक सज़ा लगे... गलत नौकरी का मतलब यह नहीं कि जीवन वहीं थम गया, लेकिन हाँ, यह जरूर है कि एक गलत शुरुआत इंसान को हताश और अविश्वासी बना सकता है..और यदि शुरुआत सही हो जाए तो ...

ओशो के दृष्टिकोण में गांधी...

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गांधी को प्रायः एक तपस्वी, सादगीप्रिय और सत्य-अहिंसा के पुजारी के रूप में देखा जाता है.. किंतु, जब हम ओशो की दृष्टि से गांधी को समझने का प्रयास करते हैं, तो यह छवि बिल्कुल भिन्न रूप ले लेती है। ओशो ने गांधी को “दकियानूसी, परम्परावादी और रूढ़िवादी” सिद्ध किया, जिनकी सोच भारत के भविष्य को आधुनिकता से वंचित रखने वाली थी... ओशो बार-बार कहते हैं— “गांधी का आदर्श गरीब भारत है। लेकिन गरीबी कोई आदर्श नहीं हो सकती। गरीबी रोग है, जिसे मिटाना चाहिए, महिमामंडित नहीं करना चाहिए। और गांधी गरीबी को सुंदर बनाने में लगे हैं। यह पाखंड है।” गांधी का थर्ड क्लास में सफर करना, बकरी का दूध पीना, खादी पहनना—ये सब ओशो के अनुसार प्रदर्शन के प्रतीक थे, जिनसे जनता प्रभावित हो तो सकती थी, परंतु वास्तविक समाधान कभी नहीं निकल सकता था... गरीबी का इलाज यह नहीं कि उसे जीवन-शैली बना लिया जाए, बल्कि यह है कि विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता से उसे मिटाया जाए.. ओशो ने साफ कहा— “गांधी मशीनों से डरते हैं। वे चाहते हैं कि भारत चरखा कातते हुए आत्मनिर्भर बने। लेकिन चरखा दुनिया को पेट नहीं भर सकता। चरख...

बुजुर्ग - बरगद के समान

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. बुजुर्ग – घने बरगद के समान बुजुर्ग सचमुच घने बरगद के समान होते हैं... उनकी छाँव में न केवल सुकून मिलता है, बल्कि सुरक्षा का गहरा अहसास भी होता है..बरगद की गहरी जड़ों की तरह ही उनके अनुभव जीवन को स्थिरता और मजबूती देते हैं... उनके द्वारा जिया गया लंबा जीवन हमें यह सिखाता है कि उतार-चढ़ाव के बीच भी कैसे संतुलन बनाए रखा जाए... अनुभव का महत्व जीवन में शब्दों से कहीं अधिक है... किताबों और डिग्रियों से जो ज्ञान मिलता है, वह अधूरा होता है यदि उसे बुजुर्गों की जीवनानुभूतियों से न जोड़ा जाए... उनका संघर्ष, उनका धैर्य, उनकी दूरदर्शिता – ये सब हमें वह सिखाते हैं जो केवल समय और परिस्थितियाँ ही सिखा सकती हैं.. किंतु , दुख की बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी जिस तेजी से पाश्चात्य संस्कृति को अपनाती जा रही है, उसके चलते चारित्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है...परिवार व्यवस्था की नींव कमजोर होती जा रही है और उसी के साथ तनाव, नैराश्य और संबंधों का खोखलापन बढ़ रहा है... आज बच्चों के जीवन से दादी-नानी की कहानियाँ लगभग विलुप्त हो चुकी हैं... कभी रात्रि को चारपाई पर लेटकर सुनाई जाने वाली वे कह...

गीता के अनुसार - जिंदा कौन ?

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गीता के अनुसार – जिंदा कौन ? हम अक्सर “जिंदा” होने की परिभाषा को शरीर की हरकतों, सांसों और इंद्रियों की सक्रियता से जोड़ देते हैं... जीवविज्ञान की दृष्टि से यही लक्षण जीवन के प्रमाण हैं – हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, भोजन-निद्रा और चेतना की गतिविधियाँ... परंतु गीता इन सबसे परे जाकर “जीवित होने” की एक बिल्कुल अलग और गहरी परिभाषा रखती है.. भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत...   “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥” (2.18)  यह शरीर नाशवान है, परंतु इसके भीतर रहने वाली आत्मा अविनाशी है. अब प्रश्न यह उठता है कि फिर कौन वास्तव में जिंदा है ? गीता का उत्तर स्पष्ट है—जो अपने भीतर की आत्मा को पहचान ले, वही सचमुच जिंदा है...केवल शरीर का जीवित रहना जीवन नहीं है, क्योंकि शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिल ही जाएगा... सच्चा जीवन आत्मा की पहचान में है, धर्म और सत्य की साधना में है... यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपने अहम, झूठ और छल के साथ जी रहा है, तो भले ही वह सांस ले रहा हो, चल-फ...

कृष्ण कौन हैं ?

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कृष्ण—यह नाम मात्र एक व्यक्ति, एक चेहरा, एक देह या किसी काल-स्थान विशेष की परिधि में सीमित कर देने योग्य नहीं है... वेदांत के आलोक में देखें तो कृष्ण का अर्थ है – पूर्णता, सम्पूर्णता...कृष्ण न किसी युग की कैद में हैं, न किसी भूगोल की सीमा में.. वे न केवल एक ऐतिहासिक चरित्र हैं, न केवल माखन चुराने वाले बालक, न केवल बांसुरी बजाने वाले गोपबंधु और न केवल महाभारत के सारथी...असल में कृष्ण बोध का रूप हैं, परमात्मा का पूर्णतम स्वरूप हैं... वेदांत कहता है—"जो अकारण है, वही परम है" कृष्ण उसी अकारण का मूर्त स्वरूप हैं.. वे प्रकृति की धारा से तटस्थ, स्वयं में पूर्ण और स्वयं में स्थित... राम में मर्यादा का आदर्श है, बुद्ध में करुणा का, पर कृष्ण में पूर्णता है—जहाँ मर्यादा का भी अतिक्रमण है... कृष्ण न तो प्रशंसा के मोह से बंधते हैं, न निंदा के भय से...उनका होना किसी "उचित-अनुचित" की चौखट पर निर्भर नहीं है। वे जैसे हैं—वैसे ही पूर्ण... वेदांत के सूत्र में यह बात बार-बार आती है कि परमात्मा को किसी विशेष रूप, किसी विशेष परिस्थिति से बाँधा नहीं जा सकता... कृष्...

आख़िर क्या मतलब है आज़ादी का ?

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आख़िर क्या है आज़ादी का मतलब? हर साल पंद्रह अगस्त की सुबह सूरज कुछ अलग चमक लेकर आता है... आसमान पर तिरंगे की लहराती परछाईं, स्कूल-कॉलेजों में बच्चों की कतार, गूँजता राष्ट्रगान, और फिर अंत में मुँह में घुलती गरमागरम जलेबी... बस, हममें से बहुतों के लिए यहीं खत्म हो जाता है "आज़ादी दिवस" का मायना—एक वार्षिक उत्सव, जो अगले दिन अख़बार के कोनों में तस्वीर बनकर रह जाता है.. लेकिन, क्या आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना भर है? हम भूल जाते हैं कि यह आज़ादी हमें किसी मेले में बाँटी जाने वाली मिठाई की तरह "खैरात" में नहीं मिली...इसके पीछे अनगिनत शहीदों की कुर्बानी है—जेल की कोठरियों में गूँजते इंकलाब के नारे, फाँसी के तख़्त पर मुस्कुराता चेहरा, गोली के सामने सीना तानकर खड़ा किसान, और वो माँ जो अपने बेटे की शहादत पर गर्व के आँसू बहाती है। यह दिन सिर्फ खुशी का नहीं, बल्कि उस गहरे एहसास का दिन है कि हमारी साँसों में जो आज़ादी का स्वाद है, वह रक्त से सींची गई है... कई लोग इसे केवल "विदेशी शासन से मुक्ति" के रूप में समझते हैं, लेकिन अगर हम ईमानदारी से देखें, तो आज़ादी...

50% का टैरिफ... भारत के लिए आपदा में अवसर...

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अभी  अमेरिका ने भारत पर 50% का टैरिफ (सीमा शुल्क) लगा दिया। देखने में यह एक आर्थिक आक्रमण जैसा लगता है, लेकिन जो राष्ट्र दृष्टि, धैर्य और दिशा से चलता है, उसके लिए हर चोट एक चिंगारी बनती है, आत्मनिर्भरता की अग्नि को और तेज करने के लिए.... यह वही भारत है, जिसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया – "हम रूस से तेल का आयात करते रहेंगे। हमारी नीति हमारी है, और ये 140 करोड़ लोगों के हित मे है" और यह घोषणा केवल रूस से संबंध निभाने की बात नहीं है, यह उस ‘नई भारत’ की हुंकार है जो न तो दबाव में झुकता है, न दंड से डरता है.... अमेरिका का टैरिफ वार – उसके के लिए खतरा इतिहास गवाह है कि जब-जब अमेरिका ने टैरिफ का हथियार उठाया है, उसने दूसरों से ज्यादा खुद को नुकसान पहुंचाया है। ट्रम्प के कार्यकाल में भी अमेरिका ने यही किया, और वैश्विक व्यापार में उसकी साख डगमगाने लगी। अमेरिका की यह नीति – “हर देश मेरे दरवाज़े पर झुके” – अब अस्वीकार्य हो चुकी है। यह 21वीं सदी है , और भारत जैसे राष्ट्र अब केवल सुनने नहीं, उत्तर देने लगे हैं । आज जब भारत ने दो टूक कहा कि हम रूस से सस्ते तेल लेंगे...

आख़िर क्या अंतर होता ? लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में...

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 कक्षा में जब मैंने बच्चों से 'दोस्ती' पर संवाद किया, तो शब्दों के परे एक अनकही गहराई में डूब गया। एक मासूम-सा प्रश्न उभरा — "सर, लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में फर्क क्या होता है?" प्रश्न छोटा था, परंतु उस प्रश्न की तह में संबंधों की पूरी एक दुनिया थी। लड़कों की दोस्ती अक्सर बाहर से ऊँची आवाज़ों वाली, ठहाकों से गूंजती, एक-दूसरे की पीठ पर धौल जमाते हुए एक 'जुनून' की तरह होती है...उसमें एक अघोषित समझदारी होती है — बिना कहे भी सब कुछ जान लेने वाली। जैसे फिल्म ‘शोले’ में जय और वीरू की यारी। उनके बीच संवाद कम, मगर विश्वास अटूट...  लड़कों की दोस्ती में ‘साथ निभाने’ की कसमें होती हैं — चाहे पिटाई हो, स्कूल से भागना हो या किसी क्रश को चुपचाप ताकना हो। और जब बिछड़ते हैं, तो शायद आँसू नहीं बहाते, मगर अकेले में सिगरेट की राख में दोस्त की तस्वीर जला बैठते हैं...मगर, दिल के कोनो में कसक बनी रहती है और मन अतीत की सुनहरी यादों में कभी-कभी चाहे अनचाहे गोता लगाते रहता है... और यदि ये दोस्ती किसी वजह से दुश्मनी में बदल जाये तो इससे बड़ा कोई जानी दुश्मन नह...

हर निरर्थक व्यर्थ नहीं होता...

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कभी-कभी जीवन में हम ऐसे कर्मों में उलझ जाते हैं, जिनका कोई स्पष्ट परिणाम नहीं दिखता। समय और ऊर्जा बहाते हैं, फिर भी हाथ में कुछ ठोस नहीं आता। लोग कहते हैं – “यह तो बेकार था, निरर्थक था, व्यर्थ में ही अपनी ऊर्जा व समय गवाएं...."  पर क्या सच में हर निरर्थक प्रतीत होने वाली चीज व्यर्थ होती है ? क्या सच में वो महत्वहीन होती है ? क्या जीवन निर्माण प्रक्रिया में उनका कोई योगदान नहीं होता ? मैंने महसूस किया है कि कुछ अनुभव जीवन को आकार देने के लिए आते हैं, न कि परिणाम देने के लिए... सिर्फ परिणाम से ही सार्थकता का मूल्यांकन करना एकदम संकीर्ण सोच है... जैसे कोई नदी चट्टानों से टकराकर बहती है – न उसका कोई उद्देश्य है, न मंज़िल की प्राप्ति में सहायक... फिर भी वह रास्ता बनाते जाती है... और एक लंबे समय के बाद वही टूटी चट्टानों से मृदा बनती है, जो उस वक़्त व्यर्थ सा जान पड़ रहा था बाद में वही इस जीवन के बुनियादी तत्व के रूप में निर्मित होती है... हमारी विफलताएँ, हमारे रुकाव, हमारे अधूरे प्रयास – ये सब मिलकर एक आंतरिक गूंज बनाते हैं, जो हमें भीतर से परिष्कृत करती है। कभी एक कविता अधूरी...

सफलता मतलब क्या ?

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सफलता… ये शब्द जितना चमकदार दिखता है, उतना ही उलझा हुआ भी है। मेरे लिए सफलता कोई मंज़िल नहीं, एक यात्रा है। वो यात्रा जो मुझे हर दिन थोड़ा और सजग बनाती है, थोड़ा और ईमानदार, और थोड़ी और आत्मा के क़रीब। दुनिया कहती है – बड़ी गाड़ी, ऊँचा ओहदा, तगड़ा बैंक बैलेंस = सफलता। लेकिन मेरी परिभाषा में सफलता है – सुबह सुकून से जागना और रात को संतोष के साथ सो जाना और  इस दौरान पूरी ऊर्जा से भयमुक्त होकर सही काम करना... सफलता है – जब मैं किसी बच्चे की आँखों में उम्मीद जगा सकूँ, जब मैं किसी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर सकूँ, जब मेरी आवाज़ किसी के भीतर आत्मविश्वास भर सके...जब मैं किसी के खिलखिलाते चेहरे की वजह बन सकूं... सफलता मेरे लिए यह भी है कि मैं जी सकूं... बिना झूठ बोले, बिना मुखौटे पहने, बिना किसी दिखावे के।  मैं खुद से कह सकूँ – "तू जैसा है, वैसा ही ठीक है।"  हाँ, कुछ बुराईयां है मुझमें, कुछ क्या...कुछ ज्यादा ही, जो समय, परिस्थिति व स्थान के साथ सुधरते जाएंगे...मगर, अपने मूल को भूलकर कोई भी अपने जीवन में वसंत का फूल नहीं खिला सकता...और मेरा मानना है कि जीवन में कोई परफ...

कल्पना का दर्पण और हकीकत की दरारें

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कल्पना का दर्पण और हक़ीक़त की दरारें कभी-कभी लगता है, मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कल्पना है, और सबसे गहरी पीड़ा भी वही। कल्पना एक दर्पण है — चमकता हुआ, निर्मल, जादुई। इसमें हम वो देखते हैं जो हमें पसंद है — जैसे किसी ने हमें पूरे मन से चाहा, जैसे हमारा जीवन बिल्कुल वैसा है जैसा हमने चाहा था। इस दर्पण में दिखती हैं पूर्णता की छवियाँ, वो प्रेम जो कभी छूटा ही नहीं, वो सफलता जो थकी नहीं, वो मुस्कान जो नकली नहीं। मगर हक़ीक़त… वो दर्पण की पीठ है - दरारों भरी, खुरदुरी... हक़ीक़त में जो प्रेम है, वो अधूरा है। जो संबंध हैं, वो उलझे हैं। जो लक्ष्य है, वो थकाते हैं। हम कल्पना में उड़ते हैं, हक़ीक़त हमें खींच कर ज़मीन पर लाती है। फिर भी, यह विरोध नहीं, यह संबंध है। कल्पना हमें जीने की हिम्मत देती है, और हक़ीक़त हमें संभलने की समझ। मेरे जैसे एक भावुक इंसान को, कई बार ये भ्रम होता है कि जो मैं सोच रहा, जो मैं महसूस कर रहा — वही संसार है। मगर जैसे ही मैं उस स्वप्न से बाहर आता हूँ, हक़ीक़त कहती है —"इतना भी आसान नहीं।" कभी प्रेम में, कभी रिश्तों में, कभी अपने ही सपनों में  हम ऐसे उलझते है...

वो लड़की है...कोई सौदा नहीं !

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आज मेरी मुलाकात लगभग 50 की उम्र के करीब व्यक्ति से हुई,मुझसे बात की शुरुआत उन्होंने अजनबी की तरह ही की, बात ही बात में वे मुझे भांप रहे थे, मेरे विचारों को अपने अनुभव के तराजू में तौल रहे थे... फिर एकाएक सामाजिक, राजनीतिक मु‌द्दों को छोड़ते हुए वे मुझसे निजी सवाल करने लगे, मसलन... क्या करते हो?, घर में कौन-कौन ? फिर उन्होंने मुझसे मेरे पिताजी का नाम पूछा, शायद नाम सुनकर उन्हें विशेष संतुष्टि नहीं मिली... फिर उन्होने मेरे दादा जी का नाम पूछा, शायद उन्हें यहाँ भी संतुष्टि नहीं मिली... क्योंकि इन दोनों नाम के सरनेम में कुमार लगा था.. समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मैंने उनके नाम पूछने के मंशे को भांप लिया... असल में वो नाम नहीं, सरनेम जानना चाहते थे जिससे वो मेरी जाति का अनुमान लगा सके। उनकी संतुष्टि के लिए मैंने खुद ही अपनी जाति की जानकारी उन्हें दी, जाति नाम जानते ही उनकी आँखों में एक खुशी की झलक दिख पड़ी और फिर मेरे घर का पता पूछकर वो मेरे परिवार के साथ वर्षों पुराने संबंध को जोड़ने का प्रयास करने लगे। बात ही बात में उन्होंने मुझसे पूछा, शादी...

घूंघट में खान सर की दुल्हनियाँ...

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पूरे भारत के हिंदी पट्टी के सबसे चर्चित शिक्षक खान सर ने भारत-पाक युद्ध के समय गुपचुप तरीके से शादी कर ली, जिसका कारण उन्होंनें पारिवारिक दबाव को बताया... और सबसे खुशी की बात यह है कि इस शादी का खुलासा उन्होंने अपने क्लास में अपने बच्चों को बताकर किया और क्लासरूम खुलकर कहा कि कि उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उनके स्टूडेंट्स हैं...  मगर, २ जून को अपने पारिवारिक सदस्यों व पूरे भारत के सभी स्टार्स शिक्षकों व राजनेताओं के साथ उन्होंने अपनी शादी का रिसेप्शन पार्टी रखा... और हैरतअंगेज  बात यह है कि इस रिसेप्शन पार्टी में खान सर की दुल्हनियाँ A.S khan घूंघट में थी...एक लाइव वीडियो में तो मैंने यहाँ तक देखा कि सभी अतिथि खान सर को ही बधाई स्वरूप तोहफे देकर, उन्हीं के साथ फोटो खिंचवाकर स्टेज से उतर रहे थे...  दुल्हनियों का न कोई स्वागत, न उनसे कोई बात... फोटो की तो बात ही छोड़िए, सभी ने उसी घूंघट वाली के साथ फोटो खिंचवाई जिनकी तस्वीर देखने  के लिए गूगल पर  सर्च किया जा रहा है। खान सर... के साथ यह पहला मुद्दा नहीं है ,ऐसी रहस्यमयता  पैदा करना इनकी फितरत रह...