कल्पना का दर्पण और हकीकत की दरारें
कल्पना का दर्पण और हक़ीक़त की दरारें
कभी-कभी लगता है, मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कल्पना है, और सबसे गहरी पीड़ा भी वही।
कल्पना एक दर्पण है — चमकता हुआ, निर्मल, जादुई।
इसमें हम वो देखते हैं जो हमें पसंद है —
जैसे किसी ने हमें पूरे मन से चाहा,
जैसे हमारा जीवन बिल्कुल वैसा है जैसा हमने चाहा था।
इस दर्पण में दिखती हैं पूर्णता की छवियाँ,
वो प्रेम जो कभी छूटा ही नहीं,
वो सफलता जो थकी नहीं,
वो मुस्कान जो नकली नहीं।
मगर हक़ीक़त…
वो दर्पण की पीठ है - दरारों भरी, खुरदुरी...
हक़ीक़त में जो प्रेम है, वो अधूरा है।
जो संबंध हैं, वो उलझे हैं।
जो लक्ष्य है, वो थकाते हैं।
हम कल्पना में उड़ते हैं,
हक़ीक़त हमें खींच कर ज़मीन पर लाती है।
फिर भी, यह विरोध नहीं, यह संबंध है।
कल्पना हमें जीने की हिम्मत देती है,
और हक़ीक़त हमें संभलने की समझ।
मेरे जैसे एक भावुक इंसान को,
कई बार ये भ्रम होता है कि जो मैं सोच रहा, जो मैं महसूस कर रहा — वही संसार है।
मगर जैसे ही मैं उस स्वप्न से बाहर आता हूँ,
हक़ीक़त कहती है —"इतना भी आसान नहीं।"
कभी प्रेम में, कभी रिश्तों में, कभी अपने ही सपनों में
हम ऐसे उलझते हैं जैसे धागे उलझ जाते और जितना सुलझाने की कोशिश करो और अधिक उलझते...
और फिर एक दिन...
जब वो दर्पण टूटता है,
तो आँखें उस दरारों वाली हक़ीक़त को देखना सीख जाती हैं।
मगर मैं अब भी मानता हूँ —
कल्पना से भागा नहीं जा सकता।
उसे बस समझना है,
कि वह यथार्थ का विकल्प नहीं,
बल्कि उसका सहचर है।
कल्पना वो कविता है
जो हक़ीक़त के सूखे पन्नों पर भी
स्याही बनकर उतरती है।
तो हाँ...
अगर तुम मुझसे पूछो कि मैं क्या चुनूंगा —
कल्पना का दर्पण या हक़ीक़त की दरारें ?
तो मैं कहूँगा —
"मैं दोनों को साथ रखूंगा, क्योंकि इन्हीं के बीच मेरा जीवन पल-पल कविता बनता है और मैं पूरी जिंदादिली के साथ जी पाता हूँ.."
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