ओशो के दृष्टिकोण में गांधी...

गांधी को प्रायः एक तपस्वी, सादगीप्रिय और सत्य-अहिंसा के पुजारी के रूप में देखा जाता है.. किंतु, जब हम ओशो की दृष्टि से गांधी को समझने का प्रयास करते हैं, तो यह छवि बिल्कुल भिन्न रूप ले लेती है। ओशो ने गांधी को “दकियानूसी, परम्परावादी और रूढ़िवादी” सिद्ध किया, जिनकी सोच भारत के भविष्य को आधुनिकता से वंचित रखने वाली थी...

ओशो बार-बार कहते हैं—
“गांधी का आदर्श गरीब भारत है। लेकिन गरीबी कोई आदर्श नहीं हो सकती। गरीबी रोग है, जिसे मिटाना चाहिए, महिमामंडित नहीं करना चाहिए। और गांधी गरीबी को सुंदर बनाने में लगे हैं। यह पाखंड है।”

गांधी का थर्ड क्लास में सफर करना, बकरी का दूध पीना, खादी पहनना—ये सब ओशो के अनुसार प्रदर्शन के प्रतीक थे, जिनसे जनता प्रभावित हो तो सकती थी, परंतु वास्तविक समाधान कभी नहीं निकल सकता था... गरीबी का इलाज यह नहीं कि उसे जीवन-शैली बना लिया जाए, बल्कि यह है कि विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता से उसे मिटाया जाए..

ओशो ने साफ कहा—
“गांधी मशीनों से डरते हैं। वे चाहते हैं कि भारत चरखा कातते हुए आत्मनिर्भर बने। लेकिन चरखा दुनिया को पेट नहीं भर सकता। चरखा हमें सिर्फ दास बनाएगा, प्रगति से दूर ले जाएगा।”

अगर गांधी की सोच को आधार मानकर भारत को आगे बढ़ाया जाता, तो ओशो के अनुसार हम चीन, अमेरिका या रूस जैसी औद्योगिक शक्तियों से कभी मुकाबला ही नहीं कर पाते। पड़ोसी पाकिस्तान या चीन जैसे देश, जो सैन्य और औद्योगिक दृष्टि से मजबूत हो रहे थे, उनके सामने भारत निर्बल और असहाय रह जाता। ओशो कहते हैं—
“गांधी का रास्ता अगर चलता, तो आज भारत नाम का देश ही न होता। क्योंकि अस्तित्व बचाने के लिए सिर्फ आत्मनिर्भर गाँव काफी नहीं, आधुनिक विज्ञान और उद्योग जरूरी हैं।”

गांधी के ब्रह्मचर्य प्रयोगों पर भी ओशो ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा—
“गांधी का ब्रह्मचर्य प्राकृतिक नहीं है, यह दमन है। दमन से कभी संतोष नहीं मिलता, सिर्फ विकृति पैदा होती है। गांधी भीतर सहज नहीं हैं, बाहर केवल आदर्श का प्रदर्शन है।”

इस प्रकार ओशो ने गांधी को एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखा जो स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल हुए, किंतु जिनकी सोच स्वतंत्र भारत को भविष्य की प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने वाली थी.. गांधी का मार्ग त्याग और तपस्या का मार्ग था, लेकिन ओशो के अनुसार वह जीवन की प्रगति और सृजनशीलता का नहीं, बल्कि पिछड़ेपन और स्थिरता का मार्ग था...

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प्रभाकर कुमार 'माचवे'

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