कृष्ण कौन हैं ?
कृष्ण—यह नाम मात्र एक व्यक्ति, एक चेहरा, एक देह या किसी काल-स्थान विशेष की परिधि में सीमित कर देने योग्य नहीं है... वेदांत के आलोक में देखें तो कृष्ण का अर्थ है – पूर्णता, सम्पूर्णता...कृष्ण न किसी युग की कैद में हैं, न किसी भूगोल की सीमा में.. वे न केवल एक ऐतिहासिक चरित्र हैं, न केवल माखन चुराने वाले बालक, न केवल बांसुरी बजाने वाले गोपबंधु और न केवल महाभारत के सारथी...असल में कृष्ण बोध का रूप हैं, परमात्मा का पूर्णतम स्वरूप हैं...
वेदांत कहता है—"जो अकारण है, वही परम है" कृष्ण उसी अकारण का मूर्त स्वरूप हैं.. वे प्रकृति की धारा से तटस्थ, स्वयं में पूर्ण और स्वयं में स्थित... राम में मर्यादा का आदर्श है, बुद्ध में करुणा का, पर कृष्ण में पूर्णता है—जहाँ मर्यादा का भी अतिक्रमण है... कृष्ण न तो प्रशंसा के मोह से बंधते हैं, न निंदा के भय से...उनका होना किसी "उचित-अनुचित" की चौखट पर निर्भर नहीं है। वे जैसे हैं—वैसे ही पूर्ण...
वेदांत के सूत्र में यह बात बार-बार आती है कि परमात्मा को किसी विशेष रूप, किसी विशेष परिस्थिति से बाँधा नहीं जा सकता... कृष्ण इसका जीवंत प्रमाण हैं... वे बाल्यकाल की अठखेलियों में भी उतने ही दिव्य हैं जितने गीता के ज्ञानयोगी उपदेशक में...वे युद्धभूमि के सारथी भी हैं, और ग्वालिनों के मित्र भी... हर रूप में वे एक ही बात कहते हैं—“अहम् पूर्णोऽस्मि”—मैं पूर्ण हूँ...
आज अधिकांश लोग कृष्ण को नाच-गान, बांसुरी, मिश्री-माखन और रासलीला तक सीमित कर देते हैं... निश्चय ही वह सब भी उनके जीवन का हिस्सा है, परंतु मूल स्वरूप नहीं...असल में वे सब जीवन की लीलाएँ हैं—जीवन की सहजता, जीवन की रसमयता के प्रतीक... लेकिन कृष्ण को केवल उसी तक सीमित कर देना उनकी मूल चेतना से मुँह मोड़ लेना है...
कृष्ण का उत्कृष्ट दर्शन गीता में प्रकट होता है... वही गीता जिसमें वे अर्जुन से कहते हैं—“तुम अपने धर्म का पालन करो, कर्म करो, फल की चिंता मत करो..” यह केवल अर्जुन को नहीं, समूची मानवता को दिया गया जीवन-दर्शन है... गीता में कृष्ण न किसी भावुक मित्र की तरह हैं, न किसी उपदेशक की तरह; वे स्वयं जीवन की जटिलताओं को साधकर जीवन का शीर्ष सत्य उद्घाटित करते हैं...
बचपन की नादानियाँ, युवावस्था की अठखेलियाँ, प्रेम की रासलीला—ये सब उनकी यात्रा के हिस्से हैं, लेकिन इन सबका शिखर गीता का ज्ञान है। वहीं कृष्ण के मूल स्वरूप का दर्शन है—संसार की मोह-माया से परे शुद्ध चैतन्य का...
हम सभी इस जगत में "अहम् भाव" में जीते हैं—“मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही भोगी हूँ...” कृष्ण इस भ्रम को तोड़ते हैं... वे कहते हैं—“मैं ही सबका आधार हूँ, सब कुछ मुझमें है और मैं सबमें हूँ...” जब व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार करता है, तब उसके भीतर का मोह और अभिमान स्वतः नष्ट हो जाता...
कृष्ण हमारे पथप्रदर्शक इसलिए हैं क्योंकि वे स्वयं जीवन को बाँधते नहीं, बल्कि जीवन को मुक्त करते हैं... वे हमें यह सिखाते हैं कि जीवन केवल गंभीर साधना नहीं, बल्कि खेल भी है...यही कारण है कि कृष्ण एक ओर गंभीर दार्शनिक हैं, दूसरी ओर सहज ग्वाल-बाल...वे हमें सिखाते हैं—जीवन को बोझ मत बनाओ, इसे उत्सव बनाओ, पर उस उत्सव को परम सत्य की ओर उन्मुख रखो...
गीता के चौथे अध्याय के सातवें श्लोक में कृष्ण कहते हैं—
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..."
अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं अवतरित होता हूँ।
यह वचन केवल किसी बाहरी चमत्कार की प्रतीक्षा के लिए नहीं है...इसका अर्थ है—जब आप भीतर से तैयार होते हैं, जब आप समर्पण करते हैं, तब कृष्ण आपके भीतर से प्रकट होते हैं... वे बाहर से किसी दिव्य रूप में नहीं आएंगे, बल्कि आपकी आत्मा में जागेंगे—और वह भी जिम्मेदारी के साथ...कृष्ण का प्राकट्य केवल आनन्द के लिए नहीं होता, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होता है...
वे वेदांत की उस ऊँचाई का अनुभव हैं, जहाँ कोई भेद नहीं रह जाता—न सही-गलत का, न उचित-अनुचित का... वे वही आदि हैं, वही अंत...वे ही रास हैं, वे ही युद्ध हैं.... वे ही बाल्य की मुस्कान हैं, वे ही जीवन का परम ज्ञान...इसलिए आवश्यक है कि हम कृष्ण के जीवन के चकाचौंध भरे सौंदर्य में इतना न खो जाएँ कि उनकी मौलिकता ही भूल जाएँ।...कृष्ण केवल माखन-मिश्री नहीं, केवल बांसुरी की तान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना के शीर्ष हैं...उनका आह्वान बाहर से नहीं, भीतर से होता है...
जन्माष्टमी को केवल भौतिक उत्सव न बनाएं, बल्कि ज्ञान और जिम्मेदारी का आमंत्रण मानें...असल में, आपका समर्पण ही कृष्ण का अवतरण है...
प्रभाकर कुमार 'माचवे'
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