आख़िर क्या अंतर होता ? लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में...
कक्षा में जब मैंने बच्चों से 'दोस्ती' पर संवाद किया, तो शब्दों के परे एक अनकही गहराई में डूब गया। एक मासूम-सा प्रश्न उभरा — "सर, लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में फर्क क्या होता है?"
प्रश्न छोटा था, परंतु उस प्रश्न की तह में संबंधों की पूरी एक दुनिया थी।
लड़कों की दोस्ती अक्सर बाहर से ऊँची आवाज़ों वाली, ठहाकों से गूंजती, एक-दूसरे की पीठ पर धौल जमाते हुए एक 'जुनून' की तरह होती है...उसमें एक अघोषित समझदारी होती है — बिना कहे भी सब कुछ जान लेने वाली। जैसे फिल्म ‘शोले’ में जय और वीरू की यारी। उनके बीच संवाद कम, मगर विश्वास अटूट...
लड़कों की दोस्ती में ‘साथ निभाने’ की कसमें होती हैं — चाहे पिटाई हो, स्कूल से भागना हो या किसी क्रश को चुपचाप ताकना हो। और जब बिछड़ते हैं, तो शायद आँसू नहीं बहाते, मगर अकेले में सिगरेट की राख में दोस्त की तस्वीर जला बैठते हैं...मगर, दिल के कोनो में कसक बनी रहती है और मन अतीत की सुनहरी यादों में कभी-कभी चाहे अनचाहे गोता लगाते रहता है...
और यदि ये दोस्ती किसी वजह से दुश्मनी में बदल जाये तो इससे बड़ा कोई जानी दुश्मन नहीं हो सकता...एक-दूसरे को सामने वाले की ताकत और कमजोरी का पूरा भान होता है...
वहीं, लड़कियों की दोस्ती... वह एक कोमल नदिया की तरह है, जिसमें हर भाव बहता है... वे एक-दूसरे के मन का हर कोना जानती हैं — आज मन उदास क्यों है, बालों में फूल क्यों नहीं है, या आज लंच में मां ने क्या बनाया। जैसे फिल्म ‘क्वीन’ की रानी और विजयलक्ष्मी की दोस्ती — जिसमें भाषा का फर्क नहीं पड़ता, दिल की भाषा बोलती है... लड़कियाँ एक-दूसरे को अपने सपनों में जगह देती हैं, आइने की तरह एक-दूसरे को सजाती-संवारती हैं, और टूटने पर चुपचाप कंधा बन जाती है....
और कभी इनके बीच मन-मुटाव हुआ तो ये पहला प्रहार चरित्र पर करती हैं, भावनाओं व संवेदनाओं की नकारात्मकता को औरों के सामने प्रस्तुत करती हैं... जिन छोटी बातों को लड़के नज़रंदाज़ कर देते, उन बारीकियों से व्यक्तित्व की नकारात्मकता को जग जाहिर करना इनकी विद्रूपता को दर्शाता है...
एक ओर जहाँ लड़कों की यारी ‘जो बोले सो निहाल’ की हुंकार जैसी होती है, वहीं लड़कियों की दोस्ती 'मधुबन की ठंडी छांव' की तरह सुकून देती है।
लड़कों की दोस्ती में अक्सर एक 'मिशन' होता है — क्रिकेट जीतना, बाइक चलाना, फिल्मी हीरो बनना — एक बाहर की दुनिया को साथ जीतने का जुनून। जबकि लड़कियों की दोस्ती में 'अंतरंगता' होती है — एक-दूसरे की आत्मा को सुनना, और कभी-कभी अपने सपनों को समेटते हुए दूसरी की खुशी में खुद को खो देना।
पर यह भी सच है कि दोनों ही दोस्तियाँ अपने-अपने ढंग से गहरी और ईमानदार होती हैं। फर्क सिर्फ़ अभिव्यक्ति का है — एक में शोर है, एक में मौन....
‘छिछोरे’ जैसी फिल्में बताती हैं कि लड़कों की दोस्ती उम्र नहीं देखती, नतीजे नहीं देखती — वे असफलताओं को भी हँसी में बदल देते हैं।
वहीं 'वीरे की वेडिंग' जैसी फिल्मों में जीवन में विविध रूपों में लड़कियों की दोस्ती की निर्भीकता और सामंजस्य को दिखाया गया है...
मगर समय के साथ दोनों ही दोस्तियाँ बदलती भी हैं। लड़कों की यारी विवाह के बाद कुछ पीछे छूट जाती है, व्यस्तताओं के समंदर में खो जाती है। और लड़कियों की संगिनी — वह विवाह के बाद भी नए रिश्तों में नए रूप में जी उठती है — कभी भाभी के रूप में, कभी सहेली से सास बनने की यात्रा में...
इस सबके बीच एक बात साझा है — दोस्ती दोनों के लिए साँस लेने जैसा जरूरी है...
लड़कों की दोस्ती उन्हें बहादुर बनाती है, लड़कियों की दोस्ती उन्हें गहरा...
लड़कों की यारी उन्हें मज़बूत बनाती है, लड़कियों की संगिनी उन्हें सजीव....
कुछ दोस्त शोर में साथ होते हैं, कुछ दोस्त मौन में भी...
असल में, हम आज कुछ भी खुद को मानते वो अपने मित्र समूहों का समुच्चय ही होता है...और यही वो रिश्ता है, जिसका हम पूर्णता अपने निजी विवेक से चुनाव कर सकते हैं... हमारे अन्य रिश्ते संयोग से मिलते, मगर दोस्ती हम पूरी तरह परीक्षण व प्रयोग से करते...
"कुछ दोस्त नाम नहीं लेते, बस काम आते हैं,
हर गिरते कदम पर हाथ बनकर थाम जाते हैं.."
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से....
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