गीता के अनुसार - जिंदा कौन ?


गीता के अनुसार – जिंदा कौन ?

हम अक्सर “जिंदा” होने की परिभाषा को शरीर की हरकतों, सांसों और इंद्रियों की सक्रियता से जोड़ देते हैं... जीवविज्ञान की दृष्टि से यही लक्षण जीवन के प्रमाण हैं – हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, भोजन-निद्रा और चेतना की गतिविधियाँ... परंतु गीता इन सबसे परे जाकर “जीवित होने” की एक बिल्कुल अलग और गहरी परिभाषा रखती है..

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत...

 “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥” (2.18) 

यह शरीर नाशवान है, परंतु इसके भीतर रहने वाली आत्मा अविनाशी है. अब प्रश्न यह उठता है कि फिर कौन वास्तव में जिंदा है ?

गीता का उत्तर स्पष्ट है—जो अपने भीतर की आत्मा को पहचान ले, वही सचमुच जिंदा है...केवल शरीर का जीवित रहना जीवन नहीं है, क्योंकि शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिल ही जाएगा... सच्चा जीवन आत्मा की पहचान में है, धर्म और सत्य की साधना में है...

यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपने अहम, झूठ और छल के साथ जी रहा है, तो भले ही वह सांस ले रहा हो, चल-फिर रहा हो, बोल रहा हो—गीता के अनुसार वह जिंदा नहीं है...

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥” (2.20)। 

यह आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है... जो आत्मा की शाश्वतता को समझ लेता है, वही जीवन का असली रहस्य जान लेता है...

इस दृष्टि से देखा जाए तो जो सत्यनिष्ठ नहीं, वह जिंदा नहीं...
क्योंकि असत्य में जीना आत्मा से कट जाना है...
जो आत्ममुखी नहीं, वह जिंदा नहीं।
क्योंकि जो अपने भीतर झांकना ही नहीं चाहता, वह आत्मा की ज्योति को कभी पहचान ही नहीं पाएगा...
जो अहम को ही जीवन समझ बैठा, वह जिंदा नहीं...
क्योंकि अहम मोह, वासना और अहंकार का जाल है, और इसमें फँसकर व्यक्ति केवल देह को ढोता है, जीवन को नहीं जीता...

गीता यह भी कहती है कि आध्यात्मिक दृष्टि से जीवित वही है, जो अपने भीतर के आत्मतत्व को ईश्वर से जोड़ने की दिशा में बढ़ रहा है...
“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥” (2.16) 
 असत्य का अस्तित्व नहीं और सत्य कभी नष्ट नहीं होता, जो इस सत्य को देख लेता है, वही तत्वदर्शी कहलाता है...

अतः जिंदा होना सिर्फ सांस लेना नहीं, बल्कि सत्य में जीना है। जिंदा होना सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि आत्मा की खोज में चलना है...जिंदा होना सिर्फ शरीर को ढोना नहीं, बल्कि आत्मा को साधना है...

गीता हमें यह चेताती है कि अगर हम अपने दिन-रात केवल मोह, लोभ और दिखावे में खोकर बिता रहे हैं, तो वास्तव में हम मृतवत हैं...असली जीवन वही है जिसमें इंसान अपने भीतर के अहम को पहचानकर, उसे साधकर, आत्मा से एकाकार होने की दिशा में बढ़ता है... वही व्यक्ति सचमुच “जिंदा” है—बाकी सब केवल सांसों का हिसाब भर हैं...

गीता का संदेश यही है कि सांस लेना, खाना-पीना और दिन काट देना “जिंदा” होना नहीं है...जिंदा वही है जो सत्य के साथ खड़ा है, जो आत्मा को पहचानकर ईश्वर से जुड़ने का प्रयत्न कर रहा है... बाकी सब लोग, चाहे कितनी ही सांसें ले लें, वे केवल शरीर को ढो रहे हैं। असली जीवन आत्मा की पहचान और धर्ममय कर्म में है—यही गीता का अमर सत्य है...

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...





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