बुजुर्ग - बरगद के समान

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बुजुर्ग – घने बरगद के समान

बुजुर्ग सचमुच घने बरगद के समान होते हैं... उनकी छाँव में न केवल सुकून मिलता है, बल्कि सुरक्षा का गहरा अहसास भी होता है..बरगद की गहरी जड़ों की तरह ही उनके अनुभव जीवन को स्थिरता और मजबूती देते हैं... उनके द्वारा जिया गया लंबा जीवन हमें यह सिखाता है कि उतार-चढ़ाव के बीच भी कैसे संतुलन बनाए रखा जाए...

अनुभव का महत्व जीवन में शब्दों से कहीं अधिक है... किताबों और डिग्रियों से जो ज्ञान मिलता है, वह अधूरा होता है यदि उसे बुजुर्गों की जीवनानुभूतियों से न जोड़ा जाए... उनका संघर्ष, उनका धैर्य, उनकी दूरदर्शिता – ये सब हमें वह सिखाते हैं जो केवल समय और परिस्थितियाँ ही सिखा सकती हैं.. किंतु , दुख की बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी जिस तेजी से पाश्चात्य संस्कृति को अपनाती जा रही है, उसके चलते चारित्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है...परिवार व्यवस्था की नींव कमजोर होती जा रही है और उसी के साथ तनाव, नैराश्य और संबंधों का खोखलापन बढ़ रहा है...

आज बच्चों के जीवन से दादी-नानी की कहानियाँ लगभग विलुप्त हो चुकी हैं... कभी रात्रि को चारपाई पर लेटकर सुनाई जाने वाली वे कहानियाँ बच्चों के भीतर कल्पना, नैतिकता और संवेदनशीलता के बीज बोती थीं...लेकिन, तकनीकी चमक-दमक ने उस परंपरा को निगल लिया है...बुजुर्ग अकेलेपन से जूझ रहे हैं, तकनीकी पिछड़ेपन के कारण उन्हें कई बार उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है... यह हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी भूल है कि हम उन्हें बोझ मानने लगे हैं, जबकि सच तो यह है कि वही हमारे अस्तित्व की नींव हैं...

उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, उनकी भावनाएँ, उनके प्रति प्रेमपूर्वक संवाद की हमारी कमी – ये सब इस पीढ़ी के भीतर संवेदनहीनता का द्योतक हैं... भागती-दौड़ती ज़िंदगी में हमने अपने उन "जीवंत ग्रंथों" को पढ़ना लगभग छोड़ दिया है, जो हमारे बीच खड़े होकर हमें सही दिशा दिखा सकते हैं...

मैं अपने जीवन की बात करूँ तो नाना-नानी और दादाजी के साथ हुई बातचीतों ने मुझे जीवन को समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण दिया...उनकी कहानियों में संघर्ष की सच्चाई थी, उनके अनुभवों में जीवन जीने का व्यावहारिक ज्ञान था... जब-जब मैं किसी दुविधा में पड़ा, उनकी कही बातें मुझे सहारा देती रहीं...दादाजी का धैर्य, नानी की सहज हंसी और नाना का स्पष्ट दृष्टिकोण – ये सब मेरे व्यक्तित्व की मिट्टी में खाद-पानी की तरह रच-बस गए..

आज जब मैं सोचता हूँ तो सचमुच महसूस करता हूँ कि बुजुर्ग बरगद के वृक्ष की तरह हैं – उनकी जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही मजबूत उनकी छाँव है..
उन्हीं की जड़ों से हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य और हमारा भविष्य सिंचित होता है...

इस विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि बुजुर्ग हमारे लिए बोझ नहीं, बल्कि आशीर्वाद हैं... वे हमारे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर हैं...आइए, हम सब मिलकर उनके प्रति आभार व्यक्त करें, उनके अनुभवों को आत्मसात करें और उनकी छाँव को संजोकर रखें, क्योंकि वही बरगद की वह छाँव है जिसके बिना जीवन की धूप हमें झुलसा देगी...

प्रभाकर कुमार 'माचवे'

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