बागेश्वर बाबा के हिम्मत को सलाम...
भारत आज जिस सबसे बड़ी बीमारी से जूझ रहा है, उसका नाम है जातिगत द्वेष...यह बीमारी धीरे-धीरे समाज की नसों में जहर की तरह फैल गई है। यह वह जहर है जो हमारे बीच नफरत, हीनभावना और अविश्वास पैदा करता है। आतंकवाद या नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक यह बीमारी है, क्योंकि यह हमारे घर, मोहल्ले और दिलों में बैठी है। दुख की बात यह है कि देश के बड़े-बड़े नेता, बुद्धिजीवी या कलाकार इस विषय पर बोलने से बचते हैं। मगर, अब एक 29 साल का लड़का आगे आया है, जो इस आग को बुझाने के लिए खुद मैदान में उतरा है...
यह युवा न तो किसी राजनीतिक पार्टी का चेहरा है, न किसी पूंजीपति का मोहरा। यह वही भारत का बेटा है जो गाँव के स्कूल में पढ़ा, संघर्षों से गुजरा और अब देश को जोड़ने निकला है। उसका उद्देश्य साफ है — समाज को फिर से एक धागे में पिरोना, जात-पात के नाम पर टूटते रिश्तों को जोड़ना और युवाओं को यह याद दिलाना कि भारत की असली ताकत उसकी एकता और संस्कृति में है...
यह यात्रा गांधीजी की 1934 की हरिजन पदयात्रा की याद दिलाती है। तब 65 साल के महात्मा गांधी समाज में समानता का संदेश लेकर निकले थे। आज वही काम 29 साल का एक नौजवान कर रहा है — वह भी बिना किसी राजनीतिक पद या स्वार्थ के। यह दर्शाता है कि परिवर्तन की ताकत उम्र या पद में नहीं, सोच और नीयत में होती है।
इस पदयात्रा की खास बात यह है कि इसमें कई मुस्लिम समुदायों ने भी समर्थन दिया है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा संदेश है कि भारत की आत्मा किसी एक धर्म, जाति या भाषा में नहीं बसती — वह सबकी है। जब भारत के लोग मिलकर किसी अच्छे उद्देश्य के लिए खड़े होते हैं, तो किसी ताकत में उन्हें तोड़ने की हिम्मत नहीं होती।
आज के युवाओं में मानसिक अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में अध्यात्म और भक्ति ही उन्हें संभाल सकती है। जब व्यक्ति अपने भीतर शांति, संतुलन और उद्देश्य ढूंढना सीख लेता है, तभी वह समाज और देश के लिए उपयोगी बनता है। यही कारण है कि यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक चेतना की यात्रा है।
2047 तक “विकसित भारत” का सपना तभी साकार होगा जब देश अपनी विरासत और विकास, दोनों को साथ लेकर चलेगा। अगर समाज जाति और स्वार्थ के जाल में उलझा रहा, तो कोई भी योजना, कोई भी तकनीक हमें उस लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकती।
बागेश्वर बाबा का यह कदम इस बात की याद दिलाता है कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति से होती है, बस नीयत सच्ची होनी चाहिए।
यह यात्रा भारत को जोड़ने की यात्रा है — गाँव से शहर, मन से मन तक।
विकास भी चाहिए, और विरासत भी।
दोनों मिलकर ही बनेगा एक भारत, श्रेष्ठ भारत...
प्रभाकर कुमार माचवे
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