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एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट -5

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हर बीतते समय के साथ, रोहित का प्रेम बढ़ता ही जा रहा था...एक दिन रोहित अपने स्कूल के कैम्पस पार्क में यूं ही बैठा कुछ लिख रहा था,तभी उसके पास काव्या आकर बैठती है...रोहित अपने लिखने में खोया था,उसे पता नहीं चला कि कोई उसके बगल में यूं बैठी...रोहित उस वक़्त अपनी माँ को चिट्ठी लिख रहा था,ये उसकी बचपन की आदत थी...अपने मन की बातें वो चिट्ठी में माँ को लिखकर अपने एक छोटे से लकड़ी के बक्से में डाल देता था...  जब वो चिट्ठी लिख चुका तो उसका ध्यान काव्या पर जाता है,वो थोड़ा सा सकपका जाता...  काव्या बड़ी सहजता से कहती कि रोहित,तुम आज के जमाने में भी चिट्ठी लिखते हो ! रोहित कहता है,हाँ... मुझे चिट्ठी लिखना बड़ा पसन्द है,अपने दिल की बात को सच्चाई के साथ हम ख़त में ही लिख सकते हैं... काव्या मन ही मन खुश होती है,उसे भी बचपन से चिट्ठी लिखना बड़ा पसन्द है,मगर ये बात वो रोहित को उस वक़्त नहीं बताती... काव्या रोहित की सादगी,उसकी मासूमियत और भोलेपन से बहुत प्रभावित थी,मगर वो ये नहीं जानती थी कि रोहित उससे इस कदर बेतहाशा प्यार करता है... दोनों में आपस में बातचीत शुरू हो गयी,काव्या से बात करके रो...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-4

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 रोहित के दिलोदिमाग पर पूरी तरह काव्या का कब्जा हो गया था,उसके भीतर संवेदनशीलता थोड़ी बढ़ गयी थी...अब वो गार्डेन में फूलों को बड़ी देर तक निहारने लगा था...सुबह सवेरे उठकर टहलने लगा था...उसकी आँखों मे एक अज़ीब सी चमक आ गयी थी...बातों में शालीनता... सच में, प्रेम होता ही ऐसा...आदमी को पूरी तरह जीवंत कर देता..  अब वो बेवजह मुस्कुराने लगा था...अकेले में अपने आप से बतियाने लगा था... उगता हुआ सूरज और डूबते हुए सूरज को देखना उसे और भी अच्छा लगने लगा था...और रोज रात को घण्टों अपनी माँ से बाते किया करता था...अपने दिन भर की सारी कहानी उनसे बेझिझक सुनाता...  माँ जो भले उससे बहुत दूर थी...उन तारों के बीच...मगर,बचपन से वो ही रोहित की सबसे अच्छी सहेली थी...जिनसे वो अपनी हर बात कर लेता था...  रोहित के दोस्तों और उसकी मासी को रोहित का यह बदला बदला अंदाज़ साफ दिख रहा था,मगर उन्हें लग रहा था इसकी वजह नया कॉलेज है...लेकिन,रोहित समझ पा रहा था इसकी वजह कॉलेज नहीं बल्कि कॉलेज में पढ़ने वाली वो लड़की काव्या है....  कॉलेज के कुछ दिन यूँ ही बीत गए,धीरे-धीरे रोहित का प्रेम रूहानी हो...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट -3

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 सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसका ध्यान सीधे घड़ी पर गयी,घड़ी में 7:30 हो गए थे...8:30 वाली उसे बस पकड़नी थी,वो झटपट उठा और तैयार होकर निकलने को हुआ...लेकिन,वो आज बार-बार खुद को आईने में देख रहा था...एक दबी-दबी सी मुस्कान..उसके चेहरे पर बार-बार आ रही थी... कुछ ऐसा ही होता है,जब हम किसी खास से मिलने जा रहे होते हैं...असल में,कॉलेज जाने की पहली बस पकड़ने की यह जल्दबाज़ी की वजह कॉलेज जाना नहीं काव्या को देखना था... बस स्टैंड पर 8:20 में ही पहुंचकर रोहित बार-बार कभी घड़ी देखता तो कभी अपने आस-पास... समय इतना धीमा क्यों चल रहा...घड़ी की सेकंड की सुई इतनी धीरे-धीरे क्यों घूम रही...बस,आज इतनी देर से क्यों आ रही...ये तमाम सवाल पता नहीं क्यों,आज उसके दिमाग में कौंध रहे थे... इस 8-10 मिनट उसे सदियों सी लग रही थी,तभी बस आ गयी...रोहित झट से उस पर चढ़ गया...और एक खिड़की वाली सीट पर बैठ गया...और हर दूसरे मिनट पर खिड़की से बाहर उचक-उचककर देखता ! आज जीवन में पहली बार उसे ऐसा लग रहा था कि बस कितनी धीमी चलती है... तभी,वो बस स्टैंड आ गया...जिसका उसे पिछली रात से ही इंतेज़ार था...मगर, ये क्या ? जिसका इं...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-2

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रोहित ने उससे ज्यादा सवाल करना मुनासिब नहीं समझा...मगर,पहली ही मुलाकात में रोहित पर उस लड़की का जादू चढ़ गया था...और आज वो कुछ ज्यादा ही खुश दिख रहा था... तभी उस लड़की की सहेली आयी और उनदोनों ने एक-दूसरे को गुलाब देकर गले लगाया रोहित ने जब देखा गुलाब अपनी सहेली को दिया जा रहा...पता नहीं,उसे एक शुकुन का एहसास हुआ और दिल में सम्भावना की एक जोर सी घण्टी बजी... ज़िन्दगी में पहली बार रोहित को ऐसा एहसास हो रहा था,वो हड़बड़ाना नहीं चाह रहा था...इतने वर्षों तक कोई भी लड़की उसे इतनी अच्छी नहीं लगी थी,मगर इस लड़की में जरूर कुछ खास था...ऐसा लग रहा था कि इसके साथ कुछ न कुछ जनमों का नाता है...मगर,अफ़सोस वो अब तक उसका नाम तक नहीं जान पाया था... तभी, बस ठीक हो गया...और सभी उस बस पर चढ़ गए...बस पर काफी भीड़ होने की वजह से रोहित को जगह नहीं मिल पाई,उसकी सीट पर एक बूढ़े व्यक्ति बैठ गए थे, जिन्हें उठाना रोहित को ठीक नहीं लगा... रोहित खड़े होकर बार-बार उस लड़की को चोरी की निगाहों से देखता आ रहा था,उसकी खिलखिलाती हँसी और हँसी के साथ गालों पर बनने वाले डिंपल पर तो रोहित का दिल एक नहीं कई बार आने लगा था... मन ...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-1

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अनजानी राहों पर एक अज़नबी से मुलाकात हो गयी...फिर क्या था ? थोड़ी बात हुई,बातों ही बातों में दिल को करार आ गया...एक-दूजे को एक-दूजे पर प्यार आ गया... रोहित का आज कॉलेज का पहला दिन था,जिस बस से वो कॉलेज जा रहा था वो एकाएक खराब हो गयी। और, कम्बक्त बेमौसम बरसात ने भी उसके मूड को थोड़ा ज्यादा ही खराब कर दिया...एक तो कॉलेज जाने की जल्दी और दूसरा ये रुकावट... खींझकर वो बस से नीचे उतरा और वहीं बस स्टैंड पर खड़ी एक प्यारी सी लड़की को देखकर ठिठक सा गया,जिसके हाथों में एक गुलाब का फूल था और उसके आंखों में किसी के लिए बेकरारी भरी इंतज़ार...बार-बार उसका इधर-उधर देखना इस बात की गवाही दे रहा था कि किसी न किसी का वो इंतेज़ार कर रही...तभी उसकी भी निगाह स्मार्ट सा दिखने वाले रोहित पर ठहर गयी...रोहित था ही इतना चार्मिंग,स्कूल लाइफ में कई लड़कियों का क्रश...एकदम मासूम सा... क्यूट, चॉकलेटी बॉय... लड़की अपनी क्रीम कलर की साड़ी जिस पर फूल के छाप थे,एक दम फूल की जैसी खिली दिख रही थी...बालों में लगे गजरे से आ रही भीनी खुशबू से रोहित उसकी ओर खींचा चला गया और बारिश से भींगने से बचने के लिए वहीं उसके बगल में...

क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ ?

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क्या मैं जिम्मेदार हूँ ? बड़ा चालबाज है हमारा मन,अपने पक्ष में तर्क गढ़कर खुद को निर्दोष साबित करने में इसे महारत हासिल हो गई है । अगर काम मनमाफिक पूरा हो जाए तो बड़े गर्व के साथ यह उद्घोषणा करता है कि मैंने किया है और सारा श्रेय लेने में कोई संकोच नहीं करता है । वहीं यदि नतीजा उल्टा निकल जाए तो बड़े तथ्यों के साथ हमारा मन इज साबित कर देता है ,कि मैं तो बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हूं...  और कोई नहीं मिलता जिस पर गलती की जिम्मेदारी डाली जाए तो ऊपर तो एक बुद्धू बैठा ही है जिसे हम बड़ी दृढ़ता से उसकी मर्जी का नाम दे देते हैं...  एक बात तो स्पष्टता से मनाना होगा कि आज मैं जैसा भी हूं इसके लिए मैं ही पूरी तरह से जिम्मेदार हूं । यह स्वीकार करते ही 'कल कैसा होना चाहिए' यह सपने देखने का मुझे अधिकार है । हम सभी अपने जीवन की योजना बनाने का काम खुद करने लगे हैं,जो हमारे दुख का एक बड़ा कारण है। जीवन की योजना बनाने का काम हमें ईश्वर या प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए, हमें बस उसके द्वारा निर्मित योजना को पूरा करने के लिए कर्म को ही अपना धर्म मानना चाहिए ।  यकीन मानिए... अपने मूल ...

जिस बात से डरते थे,वही बात हो गयी...

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जिस बात से डरते थे,वही बात हो गई !  जीवन का गणित बड़ा विलक्षण है यह बड़े ही रोचक तरीके से काम करता है। आप जिन घटनाओं से बचना चाहेंगे और बचने की चाह में बार-बार उसी के बारे में सोचने लगेंगे यकीन मानिए वह होकर रहेगा। इसे एक उदाहरण से समझते हैं...  आप साइकिल चलाते हुए बड़े ही खुशमिजाजी से जा रहे हैं तभी रास्ते के गड्ढे पर आपकी निगाह पड़ी और आपने सोचा कहीं मैं इस गड्ढे में ना चला जाऊं !  आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 12 फीट चौड़ी सड़क में महज एक फीट चौड़ा गड्ढा आपके अवचेतन को इतना आकर्षित कर लेगा कि आप गड्ढे में गिरेंगे...  मन जो बात को नहीं चाहता वही होकर रहता है .. जीवन में यदि कुछ प्रतिकूल हो रहा है और इसके लिए यदि आपने ग्रहों और नक्षत्रों  को ठीक करने का प्रयास शुरू कर दिए तो यकीन मानिए संभवत ग्रह व नक्षत्र अपनी चाल से सही चल रहे हो मगर वह आपके जहन में इतने हावी हो जाएंगे कि आपको अपनी हर प्रतिकूलता की वजह वही लगने लगेंगे और आप चिंता में इतना डूब जाएंगे की ग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर आपके मन के चक्कर लगाने लगेंगे...  "समस्याएं खुद-ब-खुद नहीं आती,अनजान...

शब्द ही गढ़ते आपकी नियति...

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जीवन की रूपरेखा हमारे द्वारा चाहे-अनचाहे किये गए शब्दों के द्वारा ही गढ़ी जा रही है...हम बिल्कुल अनजान होकर अपने जिंदगी की पटकथा लिख रहे हैं...हमारा अवचेतन मन अपने आस-पास,अपने भीतर के शब्द संसार का ही एक चित्रण करता है...और हमारी नियति कहीं न कहीं हमारे अवचेतन मन में बने इसी सजीव चित्र का निरूपण होती है... सुनने में थोड़ा अज़ीब लगेगा,मगर यही सत्य है.... हम अपने नियति को खुद बनाते हैं, चाहे वो अपने पक्ष में हो या विपक्ष में.... तो सवाल उठता है कि जब हम अपने नियति के नियंता है,निर्माणकर्ता हैं...तो फिर परिणाम हमारी इच्छानुकूल क्यों नहीं हो पा रही ? जवाब बिल्कुल सरल और स्पष्ट है,क्योंकि हम जागरूक ही नहीं है...हम अनायास के इतने आदी हो चुके हैं कि हमने अपनी खुशियों की चाभी किसी और के हाथों में सौंप दी है... हमारा रिमोट किसी और के हाथ में है और हम बस परिस्थितियों की कठपुतली बनकर रह गए हैं... एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें... एक वाक्य है, "काफी अकेला हूँ"...और दूसरा वाक्य है, "अकेला काफी हूँ"... बस, एक शब्द की क्रमबद्धता में परिवर्तन पूरे वाक्य को रोमांचित तरीक...

संकल्प शक्ति

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नवरात्रि के उत्सव के समापन में विजयदशमी का पर्व अच्छाई का बुराई पर जीत का प्रतीक है। श्री राम के द्वारा रावण का संहार एक प्रतीक है सत्व की तमस पर जीत की...  राम के इस विजय का मूल कारण क्या है ?  राम की संकल्प शक्ति... संकल्प ऐसा इसमें कोई विकल्प न हो...  हम सभी 'पोस्ट कोरोना काल' में जी रहे, कोरोना ने न सिर्फ हमें शारीरिक रूप से कमजोर किया है बल्कि बड़े व्यापक स्तर पर हम सामाजिक, आर्थिक व मानसिक रूप से भी कमजोर हुए हैं। कोरोना ने हमारे अपनों को छीना ही साथ ही हमारे सपनों को भी छीन लिया। जीवन में सबसे बड़ी त्रासदी है सपनों का मर जाना...  भय व चिंता को हमने परिस्थितिजन्य  एक स्वाभाविक प्रवृत्ति मान लिया है, जिसके प्रतिकार में हमारा क्रोध हमे सहज जान पड़ रहा है। हम यह मान बैठे हैं कि हम क्रोध करते थोड़ी ,हमसे क्रोध करवाया जाता है .. क्रोध एक ऐसा जहर है जिसे हम खुद पी कर दूसरे के मरने की कामना करते हैं...  रसायन ऐसे काम नहीं करता,हमें स्वीकारना होगा कि क्रोध की वजह से हम अपना संतुलन खो देते हैं और संतुलन होते ही हमारे संकल्प शक्ति कमजोर पड़ जाती है ...

युवा शक्ति ही रचेगा भारत का भविष्य

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भारत जो पूरे विश्व पटल पर खुद को विश्व मित्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा,उसकी शक्ति व क्षमता का एक ज्योति पुंज उसकी युवा शक्ति है। भारत अभी जनसंख्या वितरण के स्वर्णिम काल से गुज़र रहा जब देश की 65% आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है..यह संयोग भारत की विकास प्रक्रिया में अहम योगदान दे रही.. लेकिन सवाल उठता है, यदि इस युवा शक्ति को सही मार्गदर्शन और प्रेरणा न मिला तो यह तबाही का रूप भी ले सकती है..अतः,युवाओं को एक कल्याणकारी शक्ति के रूप में निर्मित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने दो पूरक तरीके से प्रयास करने का सुझाव दिया है। जिसमे से पहला तरीका है युवाओं को एक जागरूक मानवीय शक्ति के रूप में निखारना और दूसरा उन्हें सक्रिय तत्व के रूप में विकसित करना..        यह दोनों कार्य का संपादन शिक्षण संस्थानों के माध्यम से ही हो सकता है..शिक्षा ही इस क्रांति की मूल होगी..2047 तक विकसित भारत का सपना युवाओं की कार्य क्षमता से ही सम्भव है..युवाओं को जागरूक व सक्रिय करने के लिए कई संस्थान विकास अध्ययन से जुड़े विद्वानों,नीति निर्माताओं और प्रशासकों के मध्य विचार विमर्श करवाकर कई...

'आधुनिक भारत के विश्वकर्मा '

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आप बीजेपी को पसन्द या नापसन्द कर सकते,आप में से कई मोदी को भी नापसन्द कर सकते...किन्तु,नरेंद्र मोदी के द्वारा जो नए भारत की आधारशिला रखी जा रही,उसकी भव्यता,उसके सौंदर्य को आप दरकिनार नहीं कर सकते ! जी, नया भारत...क्या ख़ास है इस नए भारत में ? ◆अपनी पहचान को लेकर गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं...आज किसी भी देश में भारतीय मूल के निवासी को खुद के भारतीय होने पर गर्व हो रहा है...इसकी स्पष्ट बानगी आप ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक में देख सकते..  ◆ हमें अपना अतीत गौरवशाली लगने लगा है। देश की राजनीतिक आज़ादी के लिए जिस दृढ़ संकल्प के साथ राष्ट्रवाद की भावना को बल देने के लिए अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करने के लिए कई सारे रचनात्मक प्रयोग किये गए थे,वो 2014 के बाद फिर से न सिर्फ सांस्कृतिक बल्कि सामाजिक,राजनीतिक,बौद्धिक रूप से सम्पन्न हमारे अतीत के प्रति हमें गर्व का अवसर दे रही...इस कड़ी में चाहे मंदिरों का कॉरिडोर हो या फिर संस्कृति मंत्रालय के रूप में एक नई सोच...या फिर हमारी नई शिक्षा नीति... ◆ हम अपनी मान्यताओं और विश्वासों को लेकर मुखर हो रहे हैं..चाहे वो सनातन की चैतन्यता ह...

"जिसे जितना प्यार व सम्मान दो, वही काटेगी...चाहे मच्छर हो या इंसान"...

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मुझे डेंगू हो गया...अभी-अभी कुछ दिनों पहले मैंने मच्छर दिवस पर मच्छरों को मानवता और अस्तित्व का सबसे बड़ा रक्षक बतलाकर उनकी खूब सारी प्रशंसा की थी...मगर, लगता है मेरी इस नेकी का उन्होंने अपने तरीके से मुझे रिटर्न् गिफ्ट दिया है डेंगू के रूप में... एक बात तो अब मुझे समझ आ गई है कि  ''जिसे जितना प्यार व सम्मान दो, वही काटेगी...चाहे मच्छर हो या इंसान"... अब इस कलियुग का सीधा सा नियम है, तवज्जों और अहमयित उसी को दो, जो उसके काबिल...इंसान को जरूरत से ज्यादा तवज्जों और कुत्ते को घी हज़म नहीं होती ! सतयुगी आदर्श का कलियुग में कोई मोल नहीं ! पहले सीधा सा सिद्धांत था कि यदि आप किन्ही का भला कर रहे तो आपको लाभ मिलेगा, आपको यश मिलेगा, सामने वाला आपका सम्मान करेगा...किन्तु, इस कलियुग में तो भलाई का जमाना ही न रहा...यदि आप किसी का भला कर रहे तो तैयार रहिये हानि, अपयश और अपमान का कड़वा घूंट को पीने के लिए... वो सतयुग था, जब बच्चों के लिए माँ-पिता के चरण में ही जन्नत हुआ करते थे...ये कलयुग है...यहां बियर बार और क्लब पार्टी में ही जन्नत के दर्शन होते हैं... वो दौर कुछ अलग था, जब ...

आज आप जी रहे, इसकी वजह मच्छर हैं !

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ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत पल, रात की नींद में खलल डालने वाले एक छोटे,निहायत ही मासूम से जीव 'मच्छर' का आज दिवस है...आपको लग रहा होगा,इसे आप इतना निहायत ही मासूम क्यों कह रहे हैं... यह मासूम नहीं, शैतान है...जो जीना दूभर कर दिया है... मच्छरों की भी अपनी दर्द भरी राम कहानी है, मगर इंसान अपने हथियारों के ज़खीरे को भरने में इतना मशगूल हो गया है कि उसे उसकी दर्द भरी कहानी सुनने की न तो फुर्सत है और न ही चाहत...मगर, मुझे आप थोड़े संवेदनशील लग रहे तो मैं सोच रहा कि उसकी ज़िन्दगी की कहानी आपको सुनाऊं... एक छोटे से जीवन काल में मच्छर को जीवन चक्र के चार स्तरों से गुजरना पड़ता है...मच्छर के जीवन चक्र में अण्डा, डिम्भक, प्यूपा और वयस्क चरण होते हैं...आपको शायद पता होगा मनुष्यों को काटने का काम मादा मच्छर ही करती है,नर तो बेचारे पुष्प पराग से ही अपना जीवन यापन कर लेते...जीवन में काटने का नेक काम मादा ही करती है, चाहे वो मच्छर प्रजाति की हो या इंसान की... मगर, रोचक बात ये है कि ये मादा मच्छर किसी शौक से इंसानों को काटने नहीं आती,इनके भीतर की ममता इन्हें मौत से भिड़कर अस्तित्व की लड़ाई...

दिल का मामला या साजिश !

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सिर पर साड़ी का पल्लू, गले मे मंगलसूत्र,मांग में सिंदूर,जुबान पर बिल्कुल ही सहज हिंदी,मुस्कुराता चेहरा,दिखने में किसी अदाकारा से कम नहीं,आंखों की भाव-भंगिमा में जबरदस्त आत्मविश्वास... कैमरे पर बेबाक राय और प्रतिक्रिया देने का साहस.... भाई.... दाल में कुछ काला नहीं...मुझे तो पूरी दाल ही काली लग रही... जी हां...दोस्तों...मैं बात कर रहा हूँ सीमा हैदर की...जो खुद को एक पाकिस्तानी बतला रही है, जो अपने 4 बच्चों के साथ पाकिस्तान से नेपाल आकर,फिर बॉर्डर को पार करके अपने भारतीय हिन्दू आशिक से ब्याह करके उसके घर मे बड़े ठाठ से ठकुराइन बनकर रह रही... ये क्या हो रहा देश मे भाई..कोई सीमा सुरक्षा है या नहीं ! और, मीडिया को क्या बोलूं...मतलब TRP के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से भी समझौता कर लोगे ! मतलब, चल क्या रहा है देश मे यार.... हर रिपोर्टर उसके घर जाकर उसका इंटरव्यू ले रहा...वो बड़ी बेबाकी से अपने  ऑनलाइन मोहब्बत की कहानी सुना रही, बड़ी चुटकी लेकर पाकिस्तान के हालात उससे जाने जा रहे...और तो और देश के कई पढ़े-लिखे लोग उसको देश की नागरिकता देने के लिए आलोन्दन कर रहे... एक पाकिस्तानी मूल की म...

लड़कियों का बेवजह लड़का जैसा बनने की चाह तबाही है...बस,तबाही !

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स्त्रियों का पुरुषों जैसा बनने की अंधी चाह बस एक तबाही है और कुछ नहीं ! पश्चिम की हवा अब धीरे-धीरे भारतीय शहरों के रास्ते गांवों तक भी फैलता जा रहा है...भारत जिसकी आत्मा गांवों में बसती है, अब वो आत्मा भी पाश्चात्य के प्रभाव में दूषित होते जा रही...  स्त्री समाज ने पुरुषों के दमन के प्रतिरोध में जो प्रतीकात्मक व्यवहार प्रस्तुत किया है,उससे न सिर्फ स्त्री समाज का नुकसान है,बल्कि इसके साथ-साथ स्त्री-पुरुष के भिन्न गुणों से जीवन का सर्वांगीण विकास हो रहा था उसमें अवरुद्धता आएगी और सौंदर्य ही समाप्त हो जाएगा... बराबरी की अंधी दौड़ में,अपनी गरिमा जो एक स्त्री का गौरव हुआ करता था...आज स्त्री उसे ही खो रही है...इस दौड़ में पुरुष बनने की होड़ में उसकी सफलता भी उसे दूसरे दर्जे का ही पुरुष बनाएगी और इस चक्कर में वो स्त्री के दिव्य गुणों को खो देगी...पूरे संसार के लिए बस एक वासना की वस्तु बनकर रह जायेगी... और वो वासना भी बस त्वचा का आकर्षण भर रह जायेगा,छिछला....जैसे ही पुरुष का अनुराग उसके भीतर की कुरूपता को देखेगा उस वासना से उसे घृणा होने लगेगी और वो नए के पीछे दौड़ेगा.....

एक ज्योति मौर्या ने पूरे पुरुष जाति के भीतर के पुरुष को जगा दिया !

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वाह रे...पुरुष की दमन प्रवृत्ति जो वर्षों से पुरुष प्रधान समाज के द्वारा पोषित होती आ रही थी,विगत कुछ वर्षों में मंहगाई की मार की वजह से अपनी पत्नियों को घर से बाहर काम विशेषकर शिक्षण व नर्सिंग/मेडिकल क्षेत्रों में जाने की विवशतापूर्ण ही सही अनुमति देने को तैयार हुआ था...उसे ज्योति मौर्या केस ने फिर से संजीवनी दे दी है...जिसे देखो वो इस बात की वकालत डंके की चोट पर कर रहा कि औरत का स्थान पैरों की जूती ही है,इसे सिर पर मत चढ़ाओ...घर ही चार चौखट ही इसकी मर्यादा है,घरेलू काम ही करना इसका मौलिक और नैतिक धर्म है... सन्देह के बीज की जो बात मैंने पिछले दो दिनों पहले की थी,अब वो पूरी विषाक्तता के साथ दमनकारी पुरुष को एक जीवंत उदाहरण दे दिया है.. वो बड़े जोर शोर से कह रहा कि सूर्यवंशम का हीरा ठाकुर बनने चला,मिल गया न धोखा... औरतें धोखेबाज़ होती ही है...वो मतलबी होती...ये बात जिस बेफिक्री से आप अपनी प्रेमिका और पत्नी को कह रहे, क्या उसी बेबाकी से आप ये बात अपनी मां के लिए कह सकते है ! कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे,कि आपकी मां का अनपढ़ होना या कम पढ़ी लिखी होना ही उसके उत्तम चरित्र के कारण ...

क्या upsc में हिंदी माध्यम के अच्छे दिन आ गए ?

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क्या अब हिंदी माध्यम से संघ लोकसेवा की तैयारी करने वालों के अच्छे दिन आ गए ? इस बार upsc के रिजल्ट का डंका तो कुछ इसी कदर बज रहा है कि हिंदी माध्यम के अच्छे दिन आ गए हैं,पिछले 25 वर्षों में हिंदी माध्यम का सबसे बेहतरीन रिजल्ट इसी बार आया है...देश की सबसे लोकप्रिय कोचिंग संस्थान 'दृष्टि'  इस सफलता को तो एक बड़ी उपलब्द्धि मान रही है... हिंदी माध्यम के 54 से अधिक विद्यार्थियों का upsc में सिलेक्शन इस बात को साबित भी कर रहा है...मगर, सवाल यह है कि इतनी अनुकूल सुविधाओं के बावजूद सिर्फ 54 ही ! जब केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली हिंदी समर्थक सरकार है... हिंदी माध्यम के कोचिंग का अरबों का बाज़ार है...तो फिर सिर्फ़ '54' ही कट ऑफ पार है... पिछले 2 वर्षों से सुधार की दिशा में कुछ कदम बढ़े हैं,लेकिन इतना पर्याप्त नहीं होगा...इससे हम अधिकतम 100 तक ही जा सकते,आने वाले 1-2 वर्षों में...वो भी बहुत ही कम रैंकों के साथ... कोचिंग संस्थान और हिंदी समर्थक सरकार की इतनी जद्दोजहद के बाद भी 54 ही... क्योंकि समस्या न तो कोचिंग संस्थान में है और न ही upsc की चयन प्रक्रिया में ... समस्या है आ...

हो चाँदनी जब रात देता हर कोई साथ..मगर अंधेरों में भी तुमने न छोड़ा विराट का हाथ...

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हो चाँदनी जब रात, देता हर कोई साथ...मगर तुम अंधेरों में भी थामे रखी विराट का हाथ... अनुष्का शर्मा...जबरदस्त अदाकारा...बिंदास लड़की...और सबसे महत्वपूर्ण भरोसेमंद, साहसी पत्नी... जब अनुष्का और विराट की शादी हुई थी तो कइयों की तरह मुझे भी लगा था कि विराट जैसे बहुचर्चित और महत्वाकांक्षी लड़के को एक बिल्कुल सरल सहज लड़की से ब्याह करना चाहिए था...ये फिल्मी अभिनेत्री विराट जैसों के कैरियर को डूबा देगी,ऐसी लड़कियां उसे उसके मूल व्यक्तित्व से दूर कर देगी...खेल को छोड़कर ग्लेमर की दुनिया की चकाचौंध में भटका देगी...विवाह के बाद के शुरुआती परिणाम भी मेरे अंदेशे को सच साबित कर रहे थे... लॉकडाउन में विरुष्का के जन्म के साथ ही मुझे लगने लगा था कि विराट का क्रिकेट कैरियर अब ढलते ढलते समाप्त हो जाएगा... विराट के बल्ले से एक साधारण बल्लेबाज़ की तरह रन तो बन ही रहे थे,किन्तु शतकवीर शतक के लिए तरसता रहा... मैं अक्सर सोचा करता हूँ, जिस दिन विराट जैसा बल्लेबाज़ शून्य या कम स्कोर पर आउट होता होगा,उस रात उस पर क्या बीतता होगा...कैसी झुंझलाहट होगी...जब खुद की काबिलियत पर सन्देह होने लगता होगा, तो उसके कां...

इसी रूप पर मोहित हो गयी होंगी जानकी !

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जिनका जीवन दुःखों से भरा हो, फिर भी चेहरे पर हो एक पुलकित मुस्कान वही है राम.... राम...यह किसी धर्म विशेष के भगवान का नाम नहीं,अपितु यह एक इंसान का भगवान बनना है... AI के द्वारा निर्मित इस चित्र में राम की सौम्यता,उनके ललाट की तेजस्विता और आंखों की दिव्यता साफ परिलक्षित हो रही है...काले -भूरे घुंघराले घने लंबे बाल, तीखी भौं,खड़ी नाकें, सुंदर ग्रीवा... चेहरे पर  अलौलिक दिव्य सौंदर्य... यक़ीनन, इसी दिव्य अलौकिकता पर मोहित हो गयी होंगी  जानकी...वाटिका में जब पहली बार निगाहें टकराई होंगी...तो ठिठक सी गयी होंगी जनकपुत्री..और पहली नज़र में ही हो गए होंगे 'सिया के राम'... राजभवन की भरी सभा में भी चुपके से अंगूठे के नगीने पर जिसके प्रतिबिम्ब के दीदार से मन हर्षित हो उठता हो, कुछ ऐसे ही हैं राम.... घट-घट में हैं राम...कण-कण में हैं राम  संयम से सिद्धि प्राप्ति के मार्ग हैं राम ....

" आधुनिक युग की नारी "

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आधुनिक युग की नारी  "नारी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है" और तकनीक के प्रयोग ने उन्हें जीवन के नए आयामों में खुद को कार्य करने का मौका दिया है...उस हर क्षेत्र में नारी ने साबित कर दिया है कि चाहे वह खेल का मैदान हो या फिर राजनीति का दंगल...  घर संभालना हो या फिर करना हो देश का प्रबंधन..  कलम से बदलनी हो अपनी किस्मत या फिर कूची से करना हो कोई नव सृजन... समुद्र की गहराई हो या फिर एवरेस्ट की ऊंचाई... जीवन के हर आयामों में जहां भी नारी को अवसर मिला उसने अपना विजय का परचम लहरा दिया ।   लेकिन, कई मामलों में व्यक्तिगत तौर पर मैं महसूस करता हूं कि सदियों से अवसर वंचना ( जो तात्कालिक परिस्थितियों में कई मामलों में स्वाभाविक भी था) की प्रतिक्रिया के रूप में आधुनिक युग की नारी ने अपने नारीत्व के मौलिक गुण सहजता को खो कर अपने मूल से दूर हो रही... जो ना सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक समस्या बन सकता। समाज से नारीत्व शक्ति का विलोपन कहीं अधिक क्रूर व कर्कश समाज बना सकता !  तो फिर समाधान क्या है ?  समाधान है संतुलन...  संतुलन का एक नया आयाम प्रस्तुत करना...

भविष्य में यह तकनीक कर देगा आपको बेरोजगार !

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भविष्य में बेरोजगारी की एक बड़ी समस्या की आहट ! इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई तकनीक से भविष्य में कई लोगों के रोजगार पर हमला होने की सम्भावना है...विद्यार्थियों के भीतर आलसपन की चरमता आएगी, गूगल से तो उत्तर को तनिक ढूंढना भी पड़ता था,यहां तो पूरी तरह से बना बनाया उत्तर मिलता...वो भी आवश्यकता अनुसार शब्द सीमा में... शिक्षक,लेखक,कवि जैसे रचनात्मक कार्य भविष्य में अपनी उपयोगिता खो सकते हैं...मनुष्य की कल्पनाशक्ति की शक्ति भी कितनी प्रभावी होगी, कहना मुश्किल है... तकनीक के इस दौर में, जिस तेज गति से कार्यों का मशीनीकरण हो रहा है वो निश्चित तौर पर रोजगार परक शिक्षा की मांग को पैदा कर रहा...और यथाशीघ्र जमीनी स्तर पर ऐसा न किया गया तो बढ़ती युवा जनसंख्या पूरे भारत के लिए अभिशाप बन जाएंगी... जिस युवा शक्ति के बल पर हम विश्व गुरु बनने का सपना संजो रहे हैं, कहीं यही युवा शक्ति अनियंत्रित होकर महाप्रलय का कारण न बन जाये... भारत जैसे देश में अंधाधुंध तरीके से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग निश्चित तौर पर खतरनाक है...देश की बड़ी आबादी आज भी गांवों में अपना जीवन व्यतीत कर रही और मशीनी रफ़्...

सुदूर देहात में जल रही शिक्षा की मशाल !

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अलीगंज प्रखंड के बालाडीह ग्राम में महिमा कांसेप्ट स्कूल के बच्चों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि " अब राजा का बेटा ही राजा नहीं बनेगा, बल्कि राजा वो बनेगा जो हक़दार है "... सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा में स्कूल के चार बच्चों ने जो सफ़लता का कीर्तिमान रचा है वो प्रमाण है कि प्रतिभा सिर्फ़ आलीशान विद्यालयों की ऊंची इमारतों में नहीं बल्कि सुदूर देहात में भी मौजूद है...बड़ी-बड़ी आलीशान इमारतों में अध्ययन करने वाले बच्चों के सामने अपनी प्रतिभा का सूर्य दमकाने में ये बच्चें कामयाब हुए हैं... सच में, शिक्षा ही वो शेरनी का दूध है,जो जितना पियेगा उतना जोर से दहाड़ेगा... ऐसे बच्चें न सिर्फ अपने गांव के लिए ही बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा हैं...इनके मार्गदर्शन में पूरी तन्मयता से लगे महिमा कांसेप्ट स्कूल के प्रिंसिपल,डायरेक्टर और सभी शिक्षकों को बहुत-बहुत बधाई.... यक़ीनन.... "सृष्टि और प्रलय एक शिक्षक की गोद में ही पलते हैं".... प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से....