लड़कियों का बेवजह लड़का जैसा बनने की चाह तबाही है...बस,तबाही !


स्त्रियों का पुरुषों जैसा बनने की अंधी चाह बस एक तबाही है और कुछ नहीं !

पश्चिम की हवा अब धीरे-धीरे भारतीय शहरों के रास्ते गांवों तक भी फैलता जा रहा है...भारत जिसकी आत्मा गांवों में बसती है, अब वो आत्मा भी पाश्चात्य के प्रभाव में दूषित होते जा रही... 

स्त्री समाज ने पुरुषों के दमन के प्रतिरोध में जो प्रतीकात्मक व्यवहार प्रस्तुत किया है,उससे न सिर्फ स्त्री समाज का नुकसान है,बल्कि इसके साथ-साथ स्त्री-पुरुष के भिन्न गुणों से जीवन का सर्वांगीण विकास हो रहा था उसमें अवरुद्धता आएगी और सौंदर्य ही समाप्त हो जाएगा...

बराबरी की अंधी दौड़ में,अपनी गरिमा जो एक स्त्री का गौरव हुआ करता था...आज स्त्री उसे ही खो रही है...इस दौड़ में पुरुष बनने की होड़ में उसकी सफलता भी उसे दूसरे दर्जे का ही पुरुष बनाएगी और इस चक्कर में वो स्त्री के दिव्य गुणों को खो देगी...पूरे संसार के लिए बस एक वासना की वस्तु बनकर रह जायेगी... और वो वासना भी बस त्वचा का आकर्षण भर रह जायेगा,छिछला....जैसे ही पुरुष का अनुराग उसके भीतर की कुरूपता को देखेगा उस वासना से उसे घृणा होने लगेगी और वो नए के पीछे दौड़ेगा....इस अनचाही दौड़ में दोनों असंतुष्ट होंगे,जिसका कुपरिणाम मानसिक अवसाद,नैतिक मूल्यों का पतन और न जाने क्या क्या....

आज स्त्रियां पुरुषों के कपड़े इसलिए नहीं पहन रही कि उन्हें वो आरामदायक लग रहा,बल्कि इसलिए पहन रही कि उन्हें पुरुषों जैसा दिखना है....उनकी बातचीत,चलने ,उठने,बैठने के अंदाज़ में कहीं न कहीं पुरुष जैसे होने की तीव्र आकांक्षा साफ दिख रही...वो ये बात शायद समझ ही नहीं पा रही कि ये व्यवहार में परिवर्तन उन्हें कहीं न कहीं एक दोयम दर्जे का पुरुष बना रहा... और भविष्य में दो पुरुषों का विवाह सम्बन्ध कभी नहीं टिक सकता...

एक सुनियोजित तरीके से लड़कियों के मन-मष्तिष्क में इस बात को स्थापित किया जा रहा कि घर का काम करना,किचन में खाना बनाना,परिवार में बच्चों को सम्भालना ये सभी उनकी क्षमताओं का दोहन है...किचन को तो कईयों ने भटियारखाना तक कहा है,जहां एक लड़की का हुनर जलकर राख हो जाता...

इसके कुपरिणाम ये हुए हैं कि जिस कार्य को पहले लड़कियां अपना दायित्व मानकर पूरी निष्ठा से किया करती थी,अब वो ये सब करना नहीं चाहती... यदि कुछ हुनरमंद लड़कियां किसी विशिष्ट क्षेत्र में अपना हुनर दिखाए तो मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूँ...किन्तु,यदि हर लड़की घरेलू कार्य करने से परहेज़ करने लगे तो ज़रा आप ही सोचिए क्या गृहस्थ जीवन चल पाएगा...आज अधिकांश घरों में गृह कलह का एक बड़ा कारण यही मानसिकता है...


पुरुष जैसे बनने की चाह में हर घर में गृह युद्ध जैसी स्थिति हो जाएगी, विवाह विच्छेद सामान्य घटना हो जाएगी और रोचक बात ये होगी कि पुनर्विवाह में भी कुछ दिनों बाद पुनः यही स्थिति उत्पन्न हो जाएगी...परिणामतः पश्चिम की तरह यहां भी जीवन भर में 4-5 विवाह सामान्य बात हो जाएगी....
नारी का पुरुष बनने की जद्दोजहद समाजिक अस्थिरता का एक बड़ा कारण है...

किन्तु, इसका मतलब यह भी नहीं कि औरतों को सिर्फ घरेलू कार्य तक ही सीमित रखा जाए और पुरुषों को बाहरी कार्यों तक... और इसका मतलब यह भी नहीं कि गुणों का संतुलन 50-50 फीसदी में हो...ये 50-50  प्रतिशत का संतुलन तबाही है...क्योंकि, बाहरी परिस्थितियों को कितना भी सन्तुलित कर दिया जाए,जैविक अंतर होना लाजमी है...और यही जद्दोजहद में आज लगभग 20% भारतीय नारी हार्मोनल असंतुलन की वजह से कई गम्भीर बीमारियों से परेशान है...
समाज की सन्तुलित प्रगति के लिए बेहद जरूरी है,स्त्री गुणों का विकास हो...वरना,पुरुष गुणों की चरमता का एक मात्र परिणाम होगा युद्ध....और वर्तमान स्थिति में युद्ध का मतलब होगा जीवन का विध्वंस....

स्त्री की गरिमा जो पुरुषों के अत्याचार से भी नहीं मिटा था,वो इनकी खुद की नासमझी से जरूर मिट जाएगा....

तो समाधान क्या है ?

नारी और पुरुष दोनों की अपनी -अपनी क्षमताएं है...दोनों प्रकृति के दो सुंदर फूल हैं... दोनों का अपना महत्व है...पुरुषों को अब समझना होगा,दमन की वजह से ही उन्हें ये प्रतिकार का सामना करना पड़ रहा है...और स्त्रियों को समझना होगा पुरुष जैसा बनने में उनका ही नुकसान है...और सबसे अहम,उन्हें प्रकृति के नारी स्वरूप को स्वीकार करना चाहिए...इसे अस्वीकार करना कहीं न कहीं उनका खुद के अस्तित्व का ही अनादर करना है...

अतः, समाज को जैविक भिन्नता को स्वीकार करते हुए लड़कियों के भीतर बचपन से ही कीर्ति,श्री,वाक,स्मृति,मेधा,धृति और क्षमा के गुण को विकसित किये जायें... साथ-साथ साहस और पौरुष जैसे गुणों का भी विकास हो...
वहीं दूसरी ओर एक लड़के को बचपन से नारी सम्मान और स्त्री महत्व के प्रति श्रद्धा का भाव सिखाया जाए...

"सन्तुलन ही समाधान है".....

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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