एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-4


 रोहित के दिलोदिमाग पर पूरी तरह काव्या का कब्जा हो गया था,उसके भीतर संवेदनशीलता थोड़ी बढ़ गयी थी...अब वो गार्डेन में फूलों को बड़ी देर तक निहारने लगा था...सुबह सवेरे उठकर टहलने लगा था...उसकी आँखों मे एक अज़ीब सी चमक आ गयी थी...बातों में शालीनता... सच में, प्रेम होता ही ऐसा...आदमी को पूरी तरह जीवंत कर देता..

 अब वो बेवजह मुस्कुराने लगा था...अकेले में अपने आप से बतियाने लगा था... उगता हुआ सूरज और डूबते हुए सूरज को देखना उसे और भी अच्छा लगने लगा था...और रोज रात को घण्टों अपनी माँ से बाते किया करता था...अपने दिन भर की सारी कहानी उनसे बेझिझक सुनाता...

 माँ जो भले उससे बहुत दूर थी...उन तारों के बीच...मगर,बचपन से वो ही रोहित की सबसे अच्छी सहेली थी...जिनसे वो अपनी हर बात कर लेता था...

 रोहित के दोस्तों और उसकी मासी को रोहित का यह बदला बदला अंदाज़ साफ दिख रहा था,मगर उन्हें लग रहा था इसकी वजह नया कॉलेज है...लेकिन,रोहित समझ पा रहा था इसकी वजह कॉलेज नहीं बल्कि कॉलेज में पढ़ने वाली वो लड़की काव्या है....

 कॉलेज के कुछ दिन यूँ ही बीत गए,धीरे-धीरे रोहित का प्रेम रूहानी होते जा रहा था...कोई हड़बड़ाहट नहीं,कोई बेचैनी नहीं...बस,एक गहरा शुकुन...

 रोहित की शुकुन की वजह की कहानी भी थोड़ी निराली है...रोहित ने कॉलेज के दूसरे दिन से ही काव्या के बारे में पता करना शुरु कर दिया था...काव्या...हाँ, काव्या बर्णवाल उस शहर के सबसे अमीर अजय बर्णवाल, बर्णवाल ज्वेलर्स के मालिक की  बेटी थी...

जो इतने अमीर थे कि उनके लिए महंगी से महंगी गाड़ी खरीदने के लिए कुछ सोचना न पड़े...और उनकी  बेटी काव्या पब्लिक बस से स्कूल जाती...बिल्कुल,साधारण से दिखने वाली पोशाक पहनती,इतनी सादगी...

ये जानकर रोहित को बड़ा अज़ीब लगा...और काव्या ऐसी क्यों ? ये जानना और भी उसके लिए दिलचस्पी भरा सवाल था...

 काव्या की इस सादगी की एक बड़ी वजह थी उसकी माँ... जो एक NGO चलाती थी,जिसका उद्देश्य गरीब बच्चों की पढ़ने में मदद करना था...काव्या की बड़ी बहन नव्या अपने पिता की तरह ऐशोआराम की ज़िंदगी जी रही थी...और अपने MBA की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गयी थी... और वहीं दूसरी ओर काव्या अपनी माँ की तरह एक सादगीपूर्ण जीवन को बड़े शुकुन से जी रही थी..??

 काव्या बर्णवाल ज्वेलर्स के मालिक की बेटी है,ये जानकर रोहित पूरी तरह से टूट गया था...उसे काव्या बस एक ख़्वाब दिखने लगी थी,जिसे पूरा करने की हैसियत उसके पास नहीं थी...मगर,प्रेम कहाँ मानता है,अमीरी-गरीबी की इस दीवार को...रोहित दिन प्रति दिन काव्या से बेतहाशा प्रेम करने लगा...उसका प्रेम पूरी तरह से इबादत में बदल गया... मन ही मन किसी को चाहना और किसी को टूटकर प्यार करना खुदा की इबादत से कम नहीं... सच में, ये एक तरफा प्यार होता ही कुछ ऐसा...

न इजहार किया, न इकरार किया...बस, प्यार किया...प्यार किया...

शेष अगले पार्ट में..
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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