क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ ?

क्या मैं जिम्मेदार हूँ ?

बड़ा चालबाज है हमारा मन,अपने पक्ष में तर्क गढ़कर खुद को निर्दोष साबित करने में इसे महारत हासिल हो गई है ।

अगर काम मनमाफिक पूरा हो जाए तो बड़े गर्व के साथ यह उद्घोषणा करता है कि मैंने किया है और सारा श्रेय लेने में कोई संकोच नहीं करता है ।

वहीं यदि नतीजा उल्टा निकल जाए तो बड़े तथ्यों के साथ हमारा मन इज साबित कर देता है ,कि मैं तो बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हूं...
 और कोई नहीं मिलता जिस पर गलती की जिम्मेदारी डाली जाए तो ऊपर तो एक बुद्धू बैठा ही है जिसे हम बड़ी दृढ़ता से उसकी मर्जी का नाम दे देते हैं...

 एक बात तो स्पष्टता से मनाना होगा कि आज मैं जैसा भी हूं इसके लिए मैं ही पूरी तरह से जिम्मेदार हूं । यह स्वीकार करते ही 'कल कैसा होना चाहिए' यह सपने देखने का मुझे अधिकार है ।

हम सभी अपने जीवन की योजना बनाने का काम खुद करने लगे हैं,जो हमारे दुख का एक बड़ा कारण है। जीवन की योजना बनाने का काम हमें ईश्वर या प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए, हमें बस उसके द्वारा निर्मित योजना को पूरा करने के लिए कर्म को ही अपना धर्म मानना चाहिए ।
 यकीन मानिए... अपने मूल व्यक्तित्व को पहचान कर अपनी पसंद का जो भी काम हो उसे  पूरे मन से  निभाइए तब आप खुद को भगवान के समीप पाएंगे..

 खुद को अपने जीवन के प्रति जिम्मेदार मानना कोई बोझ नहीं है ..हां, कर्तव्य मानकर यदि आप कुछ करते हैं तो आपको थकान महसूस होगी, बोझिल अनुभव होगा...

 साफ़ बात... यह जीवन मेरा है, इसलिए इससे जुड़ी अपनी जिम्मेदारी को स्वीकारना मेरा धर्म है ...जब जिम्मेदार मैं हूं तो इस बात को मुझे तय करने का हक है कि "मैं कैसा जीवन चाहता हूं ? " जो चाहते हैं वह पा सकते हैं, मगर इसके लिए पहले स्वीकारना होगा कि आज जो कुछ भी है उसके लिए पूर्णता मैं ही जिम्मेदार हूं...

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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