एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट -3

 सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसका ध्यान सीधे घड़ी पर गयी,घड़ी में 7:30 हो गए थे...8:30 वाली उसे बस पकड़नी थी,वो झटपट उठा और तैयार होकर निकलने को हुआ...लेकिन,वो आज बार-बार खुद को आईने में देख रहा था...एक दबी-दबी सी मुस्कान..उसके चेहरे पर बार-बार आ रही थी...

कुछ ऐसा ही होता है,जब हम किसी खास से मिलने जा रहे होते हैं...असल में,कॉलेज जाने की पहली बस पकड़ने की यह जल्दबाज़ी की वजह कॉलेज जाना नहीं काव्या को देखना था...

बस स्टैंड पर 8:20 में ही पहुंचकर रोहित बार-बार कभी घड़ी देखता तो कभी अपने आस-पास... समय इतना धीमा क्यों चल रहा...घड़ी की सेकंड की सुई इतनी धीरे-धीरे क्यों घूम रही...बस,आज इतनी देर से क्यों आ रही...ये तमाम सवाल पता नहीं क्यों,आज उसके दिमाग में कौंध रहे थे...

इस 8-10 मिनट उसे सदियों सी लग रही थी,तभी बस आ गयी...रोहित झट से उस पर चढ़ गया...और एक खिड़की वाली सीट पर बैठ गया...और हर दूसरे मिनट पर खिड़की से बाहर उचक-उचककर देखता !

आज जीवन में पहली बार उसे ऐसा लग रहा था कि बस कितनी धीमी चलती है...

तभी,वो बस स्टैंड आ गया...जिसका उसे पिछली रात से ही इंतेज़ार था...मगर, ये क्या ? जिसका इंतेज़ार था वो तो आज वहां थी ही नहीं...रोहित की आंखें चारों तरफ देखने लगी,वो इतना बेकरार हो गया कि अपनी सीट से उठकर देखने लगा...मगर,उस बस स्टैंड पर वो थी ही नहीं...न वो थी,न ही उसकी वो सहेली...

रोहित मन ही मन सोचने लगा कहीं उस डिम्पल लेटलतीफी की वजह से तो आज फिर देर न हो गया होगा...या फिर कहीं काव्या की तबियत तो नहीं खराब हो गयी !

उफ़्फ़...ये बावला सा मन कितना आवारा हुआ जा रहा... कितने सवाल,मगर किसी सवाल का कोई जवाब नहीं...

बस से उतरते वक़्त रोहित बहुत मायूस सा था...एक उदासी... ख़ामोशी...

कॉलेज का असेंबली बेल बजने को ही था...रोहित इधर उधर बस मायूसी में टहल रहा था,उसी आंखें किसी के इंतेज़ार में बार-बार मेन गेट पर जा रही थी...

तभी, रोहित की निगाहों में एक बिजली सी कौंधी...मेन गेट से थोड़ी तेज चाल में दो लड़की साथ-साथ आ रही थी...रोहित ने अपने मन में ही कहा...काव्या आ गयी...उसकी एक झलक ने रोहित को फिर से तरोताज़ा कर दिया... सिर्फ एक झलक...

 रोहित के चेहरे पर उसकी खुशी साफ छलकने लगी थी...उसकी आँखों में एक चमक सा आ गया था...वो दौड़कर उसके करीब जाना चाहता था,मगर उसने खुद को सम्भाला...

आज ऑफिशियली क्लास का पहला लेक्चर होने वाला था,रोहित किसी ऐसे जगह की तलाश में था जहां से वो काव्या को जब चाहे देख सके...संयोग से उसे ऐसी जगह मिल भी गयी,जहां से काव्या को वो जब चाहे देख सकता था...

पहले लेक्चर में एक मैम आयी,जिन्होंने पहले अपना इंट्रोडक्शन दिया और फिर बच्चों का अटेंडेंस नाम लेकर लिया...मैम के मुंह से काव्या बर्णवाल का नाम लेते ही काव्या ने जिस मासूमियत के साथ प्रेजेंट मैम कहा, रोहित रोमांचित हो उठा....

पहला प्यार का खुमार कुछ ऐसा ही होता है... हर अदा पर दिल फिदा होता है...

शेष अगले पार्ट में...

प्रभाकर कुमार माचवे की कलम से...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

KBC की यह घटना बहुत कुछ कहती है...

नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

घूंघट में खान सर की दुल्हनियाँ...