जिस बात से डरते थे,वही बात हो गयी...

जिस बात से डरते थे,वही बात हो गई !

 जीवन का गणित बड़ा विलक्षण है यह बड़े ही रोचक तरीके से काम करता है। आप जिन घटनाओं से बचना चाहेंगे और बचने की चाह में बार-बार उसी के बारे में सोचने लगेंगे यकीन मानिए वह होकर रहेगा।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं...

 आप साइकिल चलाते हुए बड़े ही खुशमिजाजी से जा रहे हैं तभी रास्ते के गड्ढे पर आपकी निगाह पड़ी और आपने सोचा कहीं मैं इस गड्ढे में ना चला जाऊं !

 आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 12 फीट चौड़ी सड़क में महज एक फीट चौड़ा गड्ढा आपके अवचेतन को इतना आकर्षित कर लेगा कि आप गड्ढे में गिरेंगे...

 मन जो बात को नहीं चाहता वही होकर रहता है ..

जीवन में यदि कुछ प्रतिकूल हो रहा है और इसके लिए यदि आपने ग्रहों और नक्षत्रों  को ठीक करने का प्रयास शुरू कर दिए तो यकीन मानिए संभवत ग्रह व नक्षत्र अपनी चाल से सही चल रहे हो मगर वह आपके जहन में इतने हावी हो जाएंगे कि आपको अपनी हर प्रतिकूलता की वजह वही लगने लगेंगे और आप चिंता में इतना डूब जाएंगे की ग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर आपके मन के चक्कर लगाने लगेंगे...

 "समस्याएं खुद-ब-खुद नहीं आती,अनजाने में हम उन्हें पैदा करते हैं,उन्हें निमंत्रण भेजते हैं"

 तो करें,तो क्या करें ?

 कोई भी मुसीबत आए तो निराश हुए बिना अपने आप से कुछ मौलिक सवाल करें ...

1.क्या इसका समाधान संभव है ?

2.यदि हां, तो मैं क्या कर सकता हूं ?

 और जो भी उपयुक्त आप कर सकते हैं उसे ध्यानपूर्वक करें, परिणाम की चिंता ना करें ,जो किया जाना चाहिए उसे योजनाबद्ध तरीके से करें । आपका करना ही आपके भीतर विश्वास पैदा करेगा और आपको समझ आ जाएगा कि आपका भय निरर्थक था...

 प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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