आज आप जी रहे, इसकी वजह मच्छर हैं !
ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत पल, रात की नींद में खलल डालने वाले एक छोटे,निहायत ही मासूम से जीव 'मच्छर' का आज दिवस है...आपको लग रहा होगा,इसे आप इतना निहायत ही मासूम क्यों कह रहे हैं... यह मासूम नहीं, शैतान है...जो जीना दूभर कर दिया है...
मच्छरों की भी अपनी दर्द भरी राम कहानी है, मगर इंसान अपने हथियारों के ज़खीरे को भरने में इतना मशगूल हो गया है कि उसे उसकी दर्द भरी कहानी सुनने की न तो फुर्सत है और न ही चाहत...मगर, मुझे आप थोड़े संवेदनशील लग रहे तो मैं सोच रहा कि उसकी ज़िन्दगी की कहानी आपको सुनाऊं...
एक छोटे से जीवन काल में मच्छर को जीवन चक्र के चार स्तरों से गुजरना पड़ता है...मच्छर के जीवन चक्र में अण्डा, डिम्भक, प्यूपा और वयस्क चरण होते हैं...आपको शायद पता होगा मनुष्यों को काटने का काम मादा मच्छर ही करती है,नर तो बेचारे पुष्प पराग से ही अपना जीवन यापन कर लेते...जीवन में काटने का नेक काम मादा ही करती है, चाहे वो मच्छर प्रजाति की हो या इंसान की...
मगर, रोचक बात ये है कि ये मादा मच्छर किसी शौक से इंसानों को काटने नहीं आती,इनके भीतर की ममता इन्हें मौत से भिड़कर अस्तित्व की लड़ाई लड़ने भेजती है...क्योंकि, एक छोटे से जीवनकाल में इन्हें कई सारे अंडे भी देने होते,ताकि इनकी प्रजाति का अस्तित्व बचा रह सके, एक मादा मच्छर एक दिन में करीब 500 अंडे देती है...जिसमें कितने बचेंगे ये तो कुदरत ही जाने...मनुष्य के खून से उसे विशेष ऊर्जा मिलती है जो उसके बच्चों को जनन में सहायता पहुंचाती है...तो अगली बार जब कोई मच्छर आपके पास आकर बड़े सलीके से अपने डंक को आपके त्वचा में चुभाकर रक्त पीने का प्रयास करे तो आप संवेदनशील होकर ये सोचिएगा कि एक गर्भवती माँ अपने बच्चों के जन्म के लिए यह चुनौती स्वीकार कर रही है...और कितना ! एक मच्छर एक दिन में 0.0005 ml तक ही रक्त पी सकती है...मच्छर काटने से पहले एक विशेष प्रकार का रसायन त्वचा पर छोड़ती है,जिससे उसे डंक आसानी से त्वचा के भीतर प्रवेश कर जाए...काटने का यह सलीका मनुष्य प्रजाति की मादाओं ने भी सीख लिया है..आहिस्ते से डंक चुभोना...
ख़ैर, मच्छर कई जीवाणुओं की वाहक के रूप में भी आपके शरीर को बीमार कर देती हैं,मगर अफ़सोस उनका मकसद बीमार करना नहीं होता..बस, बच्चों के जन्म के लिए, अपने प्रजाति के अस्तित्व संरक्षण के लिए ...
इतना पढ़ते-पढ़ते निश्चित तौर पर दो-चार मच्छर आपके पास कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दिए होंगे, एक दो को आपने मुक्ति भी दे दिया होगा... ये मच्छर को मनुष्य का निमंत्रण हमारे द्वारा छोड़े कार्बन डाई ऑक्साइड की वजह से मिलते हैं..
मच्छर पर बात करते-करते मुझे 1996 की एक फ़िल्म यशवंत में अभिनय कर रहे नाना पाटेकर साहब का एक डायलॉग याद आ रहा ...
"एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है"...
बड़े ही आलोचनात्मक लहज़े में उन्होंने देश की बर्बादी के लिए जनता की उदासीनता को कारण माना...
वहीं, दूसरी ओर मच्छर को तो आशिक़ तक माना गया है, जय प्रदा और जितेंद्र पर फिल्माई गीत 'स्वर्ग में कहां से आया मच्छर' में...
मच्छर प्रकृति के संरक्षक के तौर पर भी अपनी भूमिका निभाने में कामयाब हुए हैं, कई इतिहासकारों व पर्यावरण विदों का मानना है कि अमेज़न और अफ्रीका के घने जंगल में यूरोपीय शक्ति मच्छरों की वजह से ही प्रवेश न कर सकी...उन्हें मच्छरों के काटने से भय होता था,वरना यूरोपीय औद्योगीकरण की अंधी प्रतिस्पर्धा में ये जंगल भी साफ हो जाते...और मनुष्य ऑक्सीजन के लिए अपने अस्तित्व के लिए आज मोहताज होता !
मच्छरों का सृष्टि के संरक्षण में अपनी इस भूमिका को लोग भूल गए हैं...आज हम जीवित हैं, उसकी बड़ी वजह मच्छरों का होना है...
मच्छर से बचकर रहें, उनके प्रति अहिंसात्मक प्रतिकार का रास्ता अपनाएं...अतः, बड़े ही अहिंसात्मक तरीके से मच्छरदानी के प्रयोग के जरिये हम इससे बचाव कर सकते... अबकी बार, जब कभी भी आपको मच्छर काटे, याद रखियेगा मेरी बातों को....
Prabhakar Kumar Machvey की कलम से...
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