" आधुनिक युग की नारी "

आधुनिक युग की नारी 

"नारी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है" और तकनीक के प्रयोग ने उन्हें जीवन के नए आयामों में खुद को कार्य करने का मौका दिया है...उस हर क्षेत्र में नारी ने साबित कर दिया है कि चाहे वह खेल का मैदान हो या फिर राजनीति का दंगल...
 घर संभालना हो या फिर करना हो देश का प्रबंधन..
 कलम से बदलनी हो अपनी किस्मत या फिर कूची से करना हो कोई नव सृजन...
समुद्र की गहराई हो या फिर एवरेस्ट की ऊंचाई... जीवन के हर आयामों में जहां भी नारी को अवसर मिला उसने अपना विजय का परचम लहरा दिया । 

 लेकिन, कई मामलों में व्यक्तिगत तौर पर मैं महसूस करता हूं कि सदियों से अवसर वंचना ( जो तात्कालिक परिस्थितियों में कई मामलों में स्वाभाविक भी था) की प्रतिक्रिया के रूप में आधुनिक युग की नारी ने अपने नारीत्व के मौलिक गुण सहजता को खो कर अपने मूल से दूर हो रही... जो ना सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक समस्या बन सकता। समाज से नारीत्व शक्ति का विलोपन कहीं अधिक क्रूर व कर्कश समाज बना सकता !

 तो फिर समाधान क्या है ? 

समाधान है संतुलन...

 संतुलन का एक नया आयाम प्रस्तुत करना चाहूंगा, वो है हर नर में नारीत्व की ज्योति जले समाज के नाते आधुनिक युग की नारी में जिस  पौरुषता का विकास हो रहा उसी अनुपात में प्रत्येक नर में नारी के गुणों का विकास हो...

नर व नारी कोई दो प्रजाति नहीं बल्कि मानव प्रजाति के ही दो आयाम है ।
 संतुलन के लिए मैं तैयार हूं, क्या आप हैं ?

प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...

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