UPSC में हिंदी माध्यम के बच्चों का इतना कम सेलेक्शन क्यों?..
आख़िर हिंदी माध्यम के बच्चों का upsc में सेलेक्शन इतना कम क्यों?..हाल ही में,upsc का फाइनल रिजल्ट आया है,शुरुआती लगभग 300 में किसी भी हिंदी माध्यम का न होना अत्यंत दुःखद है...दिल्ली,प्रयागराज,पटना में लाखों बच्चें upsc को ही अपना भविष्य मानकर घर-वार छोड़कर अनवरत साधना कर रहे हैं..8*7 के कमरे में किताबों,समाचारपत्रों और मासिक पत्रिकाओं को ही अपना मित्र बनाकर,देश दुनिया की खबरों पर सोच विचार रहे हैंक्यों???बस एक सपने के साकार होने की आस में...खिचड़ी खाकर,भूँजा फाँककर,सत्तु पीकर देश के अतीत को वर्तमान से जोड़कर भविष्य का निर्धारण कर रहा युवा,भूमध्य सागर की जलवायु को छोटे से कमरे में महसूस कर रहा युवा,देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को खुद की बचत के साथ सम्भालने का प्रयास करने वाला ग्रामीण पृष्टभूमि का युवा जिसके आंखों में राष्ट्र निर्माण का सपना है,जो लक्ष्मीकांत की राज्यव्यस्था को पढ़कर बिहार की जाति और धर्म की राजनीति के चक्रव्यूह को तोड़ने की जुगत बिठा रहा है...उसका सिलेक्शन 2% भी नही हो पा रहा,क्योंकि वो सिर्फ हिंदी माध्यम का है,गांव का है...क्या उसके साथ upsc धोखा कर रही है?ये इम्तिहान बस सिर्फ एक छलावा है!..या कुछ और ही कारण हैं जिसे हम अनदेखा कर रहे हैं...कोशिश करूंगा इस आलेख में हिंदी माध्यम के कम सिलेक्शन के पीछे की वजह को ढूंढने की,यदि वजह का सही आकलन मिल गया तो समाधान मुश्किल नहीं...तो अब आते आख़िर क्या राज़ है इस कम सिलेक्शन का?1.UPSC का पक्षपात- कई लोग इसे ही सबसे बड़ी वजह मानते हैं,मगर मैं इससे रत्ती भर भी सहमत नहीं...कोई भी परीक्षा आपके ज्ञान का आकलन करती उसका परीक्षण करती है,और वर्तमान में जिस वैचारिक पृष्ठभूमि की सरकार केंद्र में है उसके तत्वाधान में ये कहना कि हिंदी माध्यम के विद्यार्थी के साथ पक्षपात हो रहा है,बिल्कुल निराधार है...ऐसी बातों पर विश्वास कर आप परीक्षा को ही पक्षपातीय मानेंगे जो एक प्रतिभागी होने के नाते भी सही नहीं है...ये तो तय है upsc कोई भेदभाव नहीं करतीहां, ये मानकर चलिए कि वर्तमान सन्दर्भ मे हिंदी माध्यम होने पर आपके साथ कुछ नरमी ही बरतती है...2.प्रश्न पूछने की भाषा बिल्कुल गूगल अनुवादित होती है-ये बात सत्य है और जिसके लिए UPSC जिम्मेवार नहीं है,पिछले वर्षों में कई नए तकनीकी शब्द का विकास हुआ है जिसका हिंदी अनुवाद करना और उसका प्रचार करने की जिम्मेवारी गृह मंत्रालय के अंतर्गत वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग की है,जो पिछले 40 वर्षों से मरणासन्न स्थिति में है...
अतः हिंदी अनुवाद के लिए upsc का गूगल ट्रांसलेटर पर निर्भर होना एक मात्र विकल्प है..
3.स्टडी मटेरियल की कमी-कुछ हद तक ये बात भी सही मानी जा सकती है विशेषकर समसामयिकी से सम्बन्धी...क्योंको इतने वर्षों मे भी एक प्रतिष्ठित अख़बार तक हिंदी माध्यम के विद्यार्थी के पास नहीं है जो द हिन्दू की कमी को पूरा करें... मगर सिर्फ ये कहकर हम पीछा नहीं छुड़ा सकते...स्टडी मटेरियल की सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि इंटरनेट के घर घर पहुंचने के बाद upsc की तैयारी सामान्यीकरण हो गयी है,यानी हर वो शख्स वही पढ़ रहा जो दूसरे पढ़ रहे,सारी किताबें,सारे नोट्स यहां तक कि मासिक पत्रिका से लेकर समसामयिक विश्लेषण भी अब सर्वसामान्य हो गया है,जिस कारण ये इम्तिहान नई सोच के प्रदर्शन का न होकर एक ही सोच के बढ़िया प्रस्तुतिकरण का बन गया है,जिसमें अंग्रेजी माध्यम के बच्चे की सुंदर और तेज लिखावट उन्हें रेस में आगे कर देती है...स्टडी मटेरियल का दूसरा सच यह है कि हिंदी माध्यम के विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम के उपनिवेश बन गए है अर्थात हिंदी में मौजूद अधिकांश सामग्री अंग्रेजी की गूगल अनुवाद है,जिससे खुद को जोड़ पाना टेढ़ी खीर साबित हो रही...4.नए पाठ्यक्रम के अनुसार हिंदी माध्यम के विद्यार्थी खुद को नहीं ढाल पा रहे--ये बात 100% सत्य है,हिंदी माध्यम के विद्यार्थी खुद को नए बदलाव के साथ नहीं बदल पा रहे,2005 के करीब हिंदी बेल्ट से लगभग 25% सिलेक्शन होता था,बिहार और पूर्वांचल के लड़कों का upsc में अलग ही धाक होता था,आज भी है किंतु अब माध्यम बदल गया है...अब वैसे लोग upsc में आ रहे जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे,किंतु 12वीं के बाद उन्होंने एक बड़ी छलांग मारी,खुद का किसी बड़े इंस्टीटूट में दाखिला करवाकर जैसे IIT, NEET, CLAT में,और वहां इनकी ग्रूमिंग हो गयी,अंग्रेजी थोड़ी सुधर गयी,imagination लेवल बढ़ गया,expression बढ़िया हो गया और मेहनती तो ये बचपन से ही थे...
और यहां पिछड़ गए हिंदी माध्यम के बच्चें जो गांव में रह गए,घिसे पीटे कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और खुद को नए आधुनिक भारत से नहीं जोड़ पाए...अब आप बताइए upsc जिन्हें 30-40वर्षो के लिए भविष्य के भारत के निर्माणकर्ता का चयन करना है वो किन्हें चुनेगी जो आज में जी रहे,आज को समझ रहे, जिनके अंदर फैसले लेने की समझ है,जो नए तकनीक को समझते हैं...या उन्हें जो आज में रह तो रहे मगर जी रहे 1990 के दशक में.नए पाठ्यक्रम में ऐसा क्या बदला है?..नया पाठ्यक्रम का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि,उनके प्रश्न पूछने का तरीका बदल गया है,पहले factual सवाल होते थे अब conceptual होने लगे हैं...आज के सवालों के ज़बाब किसी किताब में नही मिलेंगे,किसी नोट्स में नहीं मिलेंगे...सवाल के जबाब पूरी तरह से आपके सोचने समझने और कल्पनाशीलता पर निर्भर करते हैं और इतना के बाद आपके लेखन क्षमता पर और वो भी ज्यादा से ज्यादा 12 मिनट एक सवाल के लिए..हिंदी माध्यम के अधिकांश बच्चे किसी कोचिंग इंस्टीटूट में पढ़ते हैं,जहां कि मूलभूत 2 परेशानी है।पहली 90% कोचिंग अंग्रेजी माध्यम का हिंदी अनुवाद बच्चों को पढ़ाते हैं,जिनसे बच्चे खुद को नहीं जोड़ पाते..दूसरी 90% हिंदी माध्यम के कोचिंग के शिक्षक 90 के दशक के होते,अपने विषय के विद्वान पारंगत मगर उनमें बहुत कम ही अपने विषय को समसामयिक दृष्टिकोण से जोड़ पाते हैं..5.अंग्रेजी माध्यम के बच्चे हिंदी माध्यम से बहुत अच्छे होते हैं-इसमे कोई शक नहीं,एक अच्छा अंग्रेजी माध्यम का बच्चा एक अच्छे हिंदी माध्यम के अभी के बच्चे से सोचने,समझने,लिखने, बोलने में बहुत अच्छा होता है...जिसके पीछे कई कारण हो सकते,उसकी शुरुआती शिक्षा, उसका शहरी माहौल,आधुनिक तकनीक के साथ उसकी दोस्ती,विषय के किताबों के साथ साथ अन्य किताबों को पढ़ने की रुचि...तो मान लें, UPSC में सेलेक्शन कोई चुनाव नहीं है जो गधों को भर लो और संसद में बहस हो जाएगी....असल में देश की दिशा और दशा तय करने का भार इनके ही कंधों पर होता है,तो आख़िर आप खुद में ऐसा क्या देखते हैं जो UPSC आपका चयन करें?..विचार कीजियेगा मेरे इस सवाल पर...एक बात तो तय है,हिंदी माध्यम होने के कारण UPSC में हमें कोई विशेष आरक्षण मिलने नहीं जा रहा है और न ही UPSC अपने सिलेक्शन का parameter कम करने जा रही है....अब आख़िर इस समस्या से कैसे निपटें?. जरूरी सवाल, जिसका जबाब अगले आलेख में देने की कोशिश करूंगा,तब तक आप भी सोचे
आख़िर क्या हो सकता है समाधान?...
प्रभाकर कुमार माचवे की कलम से...
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