इब्नबतूति...

इब्नबतूति....

जब  यह किताब हाथ लगी,तो सोचा पूरी पढ़कर इसके बारे में लिखूंगा..मेरा सोचा हकीकत के रूप में आपके सामने है...एक बड़ी बुरी आदत सी हो गयी है मुझे,एक सिटींग में किताब खत्म करने की,आदतन थोड़ा फास्ट रीडर हूँ मैं,मगर जान बूझकर इस किताब को ज्यादा वक्त दिया...
इस किताब में न सिर्फ भाषा का एक प्रवाह है,बल्कि कुछ अलग ही है...एक अलग ही स्वाद वाली कुल्लड़ की चाय...

आज से पहले किताबें भी मैंने खूब तो नहीं मगर अच्छी खासी संख्या में पढ़ी है,मगर किसी उपन्यास के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय पहली मर्तबा लिख रहा हूँ...और इस पहले प्रयास में मैं किताब के लेखक की मेहनत के साथ न्याय करना चाहता हूँ...पता नहीं कितना कर पाऊंगा...एक छोटी की कोशिश तो जरूर वो भी सच्ची वाली...

इब्नबतूति...बिल्कुल शब्दकोश में जोड़ा गया एक नया शब्द...,शब्द नए तो अर्थ भी नए और खास बात यह कि  ऐसे शब्दों के अर्थ अपने हिसाब से अपने-अपने होते....
 
मेरी समझ ने  जो अर्थ निकाला:---

"वो जो सामने होकर भी सामने न हो...वो जो बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कहा हो...वो जिसके बारे में आप सब कुछ जानते हुए भी कुछ न जानते हो"...वही है इब्नबतूति...

इब्नबतूति के लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने इस किताब से साबित कर दिया कि उन्हें इस किताब को पढ़ने के बाद मेरे द्वारा "आधुनिक साहित्य के नई हिंदी को पुनर्जीवितकर्ता" कहना,कोई अतिश्योक्ति नहीं है...जिस तरह स्वदेशी आंदोलन में उपन्यासकारों ने उस वक़्त हिंदी को राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर जन-जन के भीतर कलम की ताकत का एहसास कराया था,ठीक वही काम आज के तारीख़ में दुबेजी कर रहे हैं...दर्शन,समाज,राजनीति और जीवन की मौलिकता को आधुनिकता के कलेवर के साथ प्रस्तुत करने का जो हुनर दुबे जी में है,वो अत्यंत प्रशंसनीय है...

दुबे जी की मैंने और भी किताबें पढ़ी हैं.अच्छी हैं,मगर मुझे इतना न जोड़ सकी कि मैं बेखौफ तारीफ़ कर पाऊं...ग्रामीण पृष्ठभूमि होने के कारण उनकी कहानी की आधुनिक जीवनशैली में प्रस्तुति में जितनी आसानी से कई के साथ साथ शारीरिक सम्बन्ध को सामान्य घटना की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा है,वो मुझे पता नहीं थोड़ा अजीब लगता ..मगर इस किताब ने एक शालीन लहज़ा में भी आधुनिक जीवनशैली को परोसा जा सकता है,इसका उदाहरण पेश किया है...

.इस किताब के आख़िरी पन्ने में जब दुबेजी ने कहा कि वो अब वो नहीं जो पहली किताब लिखते वक्त थे...मेरी नज़र में सौ फीसदी सच है..

कोई यदि कहे कि नई वाली हिंदी अपनी मूल को खोते जा रही है,नए साहित्यिक शब्दों का निर्माण नहीं कर पा रही है,नई वाली हिंदी,हिंदी का विकास क्या करेगी ये तो उसे गर्त में धकेल रही,उन्हें एक बार इब्नबतूति पढ़नी चाहिए....और ये बात मैं किसी पहली किताब पर अपनी व्यक्तिगत राय लिखते हुए कह रहा हूँ ...तो कहीं न कहीं किताब में वो बात तो है...जो मुझे ये कहने का साहस दे रही है...

यह कहानी हर युवा को एक बार सोचने को मौका देती है कि आज जो वो जी रहा है शायद वो भी कोई जी चुका है...आज वो जो प्रेम कर रहा है वो पहले भी बड़ी रूहानियत से किया जा चुका है....जो नोंक झोंक आज आपकी प्रेयसी से हो रही,जो मान मनौव्वत आज हो रहा...पहले भी नायाब तरीके से हो चुका है...

कहानी पढ़ने के बाद मां के चेहरे में 20 साल की जवान  लड़की को ढूंढना,अपनी मां की भी कहानी को जानना,भले ही हम कभी न पूछे उससे सीधे मगर सवाल तो किये ही जाते हैं मन मे ही सही... 

ये बताता है,हमारी मां भी कभी 20 साल की लड़की रही होगी,उसके भी उन्मुक्त सपने होंगे...उसकी भी एक जिंदगी थी...जवानी थी...मदमस्त रवानी थी...उसने भी कभी प्रेम किया होगा,किसी की हाथों की अंगुली से अपनी  छोटी अंगुली मिलाकर कभी न टूटने वाला एक रिश्ता बनाया होगा...

दुबे जी अपने oneliner के लिए हिंदीभाषी के बीच विश्व प्रसिद्ध होने जा रहे हैं...ये एक पंक्ति से दिल को छूके,गुदगुदाके,दो सेकंड के लिए न जाने किस वजह से  वही ठहराकर,कभी कभी झकझोर के भी निकल जाने वाली पंक्ति लिखते हैं...

इस कहानी को पढ़ते वक्त न जाने कितनी बार इनके शब्द चयन को देखकर मुझे इनसे ईर्ष्या होती है..काश!..मैं भी दुनिया की उलझी बातों इतने सीधे ढंग से  आसानी से कह पाता...
मगर,दिल में एक विश्वास का भाव आता है,...प्रभाकर... अभी तू 21 का ही है....और खुदा तेरे लफ्ज़ में भी ये तासीर जरूर देंगे एक न एक दिन...बस कोशिश करता रह...

जिस तरह कुछ फिल्में होती है न जिन्हें जितनी बार देखो..हर बार नई हो जाती है...
इब्नबतूति भी एक ऐसा ही उपन्यास है...

मैं इस कहानी के किरदार या इसके किस्से बताना नहीं चाहता... बस इस कहानी में हर किसी के लिए कुछ न कुछ तो है...जिसे जो सिरा मिल गया उसकी जिंदगी उसी ओर बढ़ सकती......

प्रभाकर कुमार माचवे की कलम से...
अलीगंज,जमुई,बिहार
#इब्नबतूति #ibnebtuti #divyaprakashdubey

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