ये कैसा राष्ट्रप्रेम?...बॉलीवुड की नज़र सिर्फ आपकी जेब पर!
ये कैसा राष्ट्र प्रेम?..
क्या फिल्मी जगत का हर सितारा सिर्फ पर्दे पर ही देशभक्ति को प्रदर्शित कर हमारी अंतः भावनाओ को भड़काकर हमारी जेब ढीली करने की फिराक में तो नहीं रहते?
राष्ट्रभक्ति इनके लिए क्या सिर्फ व्यापार बनकर रह गयी है?
क्या इनकी सोच में राष्ट्र की भावना का कोई महत्व नहीं है?
बड़े से बड़े स्टार भी न जाने क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं?
मेरे ये आरोप बिल्कुल बेबुनियाद नहीं है,किसी खास कौम से सम्बन्ध रखने वाले कलाकार यदि अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर रहे तो कुछ हद तक बात समझ मे आती है,मगर फिर भी क्या बॉलीवुड भी अब धर्म की आड़ में अपने अपने राष्ट्रीय आदर्श को ढूंढेगा?
दुःख से ज्यादा दिल कचोट गया इस बात पर कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन,राष्ट्रभक्ति का चेहरा अक्षय कुमार,हिंदुत्व का झंडा थामे अजय देवगन भी खामोश...
देश मे इतना बड़ा राष्ट्रीय आयोजन हो रहा, प्रधानमंत्री आयोजन में शिरकत ले रहे,शंष्टांग दंडवत प्रणाम कर रहे ,500 वर्षो की प्रतीक्षा का प्रतिफल मिल रहा है,
राष्ट्रीय एकता के प्रतीक श्री राममंदिर का शिलान्यास हो रहा है,राम जो जन-जन के हैं,घट-घट में है,राम जो सबमें हैं,जो सबके हैं...
राम जो कभी किसी धर्म विशेष की चौखट में बंध कर न रहे,राष्ट्र के मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,पूरा राष्ट्र सराबोर है भावना से,भक्ति से,आस्था से...
देश के माननीय राष्ट्रपति बधाई संदेश दे रहे,पूरा विश्व परिवार राममय हो गया है
निःसन्देह यदि कोरोना न होता तो 1 करोड़ से अधिक लोग आज अयोध्या में होते,एक अलग ही जलसा होता...राम मंदिर भारत के हज़ारों मंदिरों में ऐसा कोई सिर्फ एक मंदिर नहीं है...जिससे सिर्फ एक संख्या बढ़ जाएगी..
ये मंदिर प्रतीक है,न्याय की जीत का,संकल्प से सिध्दि की प्राप्ति का,जनमानस के प्रभु पर विश्वास का,आस्था की धरोहर का,लोकतंत्र में सत्य को साबित कर न्याय प्राप्ति का,एक लंबे संघर्ष के बाद मिली जीत का,संयम का,धैर्य का और सबसे बड़ी बात स्वीकार्य का....
मगर,न जाने क्यों,आज बॉलीवुड ख़ामोश है...
और उनके सोशल मीडिया पर एक खरोच लगने पर अपनी तस्वीर साझा होती थी,आज मदहोश क्यों है?..
लगता है खुद को सेक्युलर बनाने की अफ़ीम इनलोगो ने भी खा ली है?...
जवाब तो देना होगा, और माकूल जवाब नहीं मिलता तो मान लीजिए कि इनकी नज़र न राष्ट्र पर,न आपकी भावना की कद्र पर...
बस नज़र है इनकी आपकी जेब पर...बस सिर्फ जेब पर...
यदि मेरे इस आलेख को पढ़कर कुछ चुभा हो दिल पर तो मानूँगा मेरा प्रयास सफल रहा..
प्रभाकर कुमार माचवे की कलम से
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