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शक्ति की भक्ति और ऐसी बेबकूफी...

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शक्ति की भक्ति और फिर ऐसी बेबकूफी... विचारणीय है,हम सभी बड़े उत्साह,आस्था और श्रद्धाभाव से नौ दिनों तक शक्ति उपासना करते हैं, कई लोग अन्न का त्याग कर फलाहार पर रहते,कुछ सात्विक आहार पर रहते...और अंतिम तिथि को मांसाहार का सेवन करते! तनिक विचार कीजियेगा मेरी बात पर...क्या यह मांसाहार  वैज्ञानिक संदर्भ में सार्थक है? मैं अपने आलेख में कोशिश करूंगा कि आपको तर्कसंगत बात बताऊं। नौ दिनों तक सात्विक आहार का सेवन करने से हमारे पाचन तंत्र को बहुत आराम मिलता है और वो खुद को अच्छे तरीके से संतुलित कर लेते हैं।पाचन तंत्र को आराम मिलने के कारण प्राणवायु का प्रवाह मस्तिष्क की ओर अधिक मात्रा में होता है जिससे उनकी क्षमता बढ़ती है और दिमाग को पोषण मिलता है,किंतु फिर एकाएक ऐसे भोजन को खाना जिसे पचने में अधिक वक़्त लगे,एक स्तनधारी होने के कारण शरीर को उसकी कोडिंग को ऊर्जा में बदलने में बहुत मेहनत करने पड़े जिस कारण मस्तिष्क की ओर जाने वाली प्राणवायु एकाएक कम हो जाती है,जिससे मानसिक परेशानी होने की संभावना बढ़ जाती है... क्या आपको नहीं लगता इंजन की सफाई करने के तुरन्त बाद उस पर एकाएक ओवरलोड नही...

नहीं रहे बिहार के शान...रामविलास पासवान...

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नहीं रहे...राजनीति के सबसे सटीक मौसम वैज्ञानिक..."रामविलास पासवान" यह सिर्फ एक नाम नहीं,भारतीय राजनीति का वो चुम्बक है,जिसने सत्ता को सदैव अपने आकर्षण से जोड़ कर रखा...राजनीति के ऐसे कुशल बाजीगर का ऐसे जाना हर शख्स के दिल को हल्का सा झकझोर देता है...बिहार के छात्र राजनीति से जन्मे एक युवा के मंत्रालय तक के सफ़र का नाम है..."रामविलास पासवान"... बिहार की राजनीति के एक बड़े मजबूत खम्बे का बिहार चुनाव से ठीक पहले इस तरह छोड़ कर जाना,लोजपा पार्टी विशेषकर Chirag Paswan के लिए गहरे सदमे से कम नहीं है...अब झोपड़ी की रौशनी की पूरी जिम्मेवारी चिराग पर ही आस लगाए बैठी है... रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले रामविलास पासवान बिहार के विधान सभा की राजनीति से ज्यादा  केंद्रीय राजनीति के धुर में खुद को  शामिल करने में कामयाब हुए...पार्टी की जिम्मेवारी अपने पुत्र चिराग को सौंपकर उन्होंने बिहार की राजनीति के भविष्य के नए सृजन के बीज जरूर बो दिए... बिहार विधानसभा में लोजपा का अकेले चुनाव लड़ना चिराग पासवान के भविष्य के राजनीति के रणनीति का एक बड़ा प्रयोग है...केंद्रीय धुरी से जुड़ते ह...

ऐसी वैसी औरत

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ऐसी-वैसी औरत... लेखिका-देहाती लेखक देहाती लेखक प्रकाशक-@hindyugm इस किताब के शीर्षक पढ़ते ही एक अजीब सा एहसास हुआ मुझे...लगा कि एक बार इस किताब को जरूर पढ़नी चाहिए.. कुछ तो अलग नजरिया जरूर होगा... "ऐसी-वैसी" यह दो शब्द ही अपने भीतर घृणा,बिलगाव और चरित्रहीनता के भाव रखते हैं..  एक पुरुष होने के नाते मैंने किताब को पढ़ते हुए,कई बार खुद का अवलोकन किया और पाया कि मैं भी तो कुछ ऐसा ही सोचता हूं जो अन्य सोचते हैं ...शायद परिवेश ने हमें यही सोचना है इसके लिए तैयार कर दिया...  इस किताब को पढ़ते हुए कई बार मैं बिल्कुल भीतर से दहल सा गया... 10 कहानियों का संग्रह यह पुस्तक हमें 10 ऐसी जिंदगी से रू-ब-रू कराती है,जो हमारे आस-पास के तथाकथित "ऐसी- वैसी औरतों" से मेल खाते हैं... जिन्हें हम सिर्फ उनके  जिंदगी के बाहरी आयामों को जानकर उनके चरित्र पर सवालिया निशान खड़े कर देते हैं ... 21वीं सदी में डिजिटल दुनिया में रहने वाले हम सभी की सोच आज भी इस मामले में "ऐसी वैसी" ही है ... क्या सिर्फ जीवन के एक पहलू को देखकर किसी के चरित्र का प्रमाण पत्र जारी करना उचित है? ...

द माउंटेनमैन "दशरथ मांझी"...

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"जब तक तोड़ेंगे नहीं... तब तक छोड़ेंगे नहीं..."  जीवन के हर स्थिति में यह मूल मंत्र देने वाले माउंटेन मैन दशरथ मांझी का आज पुण्यतिथि है ... इस इंसान ने साबित कर दिया कि "कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती है"और अपने पुरुषार्थ से इन्होंने वर्षों पुरानी कहावत को झूठा साबित कर दिया  कि 'अकेला चना कभी भांड नहीं फोड़  सकता है"..अकेले ही पहाड़ को छेनी-हथौड़े से तोड़कर रास्ता बनाने वाले गया के छोटे से गांव गहलोर के रहने वाले दशरथ मांझी का जुनून आज के युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है ... जो छोटी सी विफलता से घबराकर नया प्रयास करने में हिचकते हैं या फिर जीवन की छोटी सी असफलता को आत्महत्या का कारण बना लेते हैं ... प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अंत तक योद्धा की तरह डटे रहने की प्रेरणा हैं द माउंटेन मैन दशरथ मांझी... बाइस वर्षो तक अनवरत पहाड़ को चुनौती देना इतना सहज नहीं ...शुरुआत हुई होगी तो कितनों ने पागल घोषित कर दिया होगा इन्हें...  प्रेम की सच्ची इबारत इन्होंने पहाड़ तोड़कर लिख दी,  जो इतिहास के सुनहरे अक्षरों में अंकित हो गया है ... जीवन में आई अपनी परेशानी क...

इब्नबतूति...

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इब्नबतूति.... जब  यह किताब हाथ लगी,तो सोचा पूरी पढ़कर इसके बारे में लिखूंगा..मेरा सोचा हकीकत के रूप में आपके सामने है...एक बड़ी बुरी आदत सी हो गयी है मुझे,एक सिटींग में किताब खत्म करने की,आदतन थोड़ा फास्ट रीडर हूँ मैं,मगर जान बूझकर इस किताब को ज्यादा वक्त दिया... इस किताब में न सिर्फ भाषा का एक प्रवाह है,बल्कि कुछ अलग ही है...एक अलग ही स्वाद वाली कुल्लड़ की चाय... आज से पहले किताबें भी मैंने खूब तो नहीं मगर अच्छी खासी संख्या में पढ़ी है,मगर किसी उपन्यास के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय पहली मर्तबा लिख रहा हूँ...और इस पहले प्रयास में मैं किताब के लेखक की मेहनत के साथ न्याय करना चाहता हूँ...पता नहीं कितना कर पाऊंगा...एक छोटी की कोशिश तो जरूर वो भी सच्ची वाली... इब्नबतूति...बिल्कुल शब्दकोश में जोड़ा गया एक नया शब्द...,शब्द नए तो अर्थ भी नए और खास बात यह कि  ऐसे शब्दों के अर्थ अपने हिसाब से अपने-अपने होते....   मेरी समझ ने  जो अर्थ निकाला:--- "वो जो सामने होकर भी सामने न हो...वो जो बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कहा हो...वो जिसके बारे में आप सब कुछ जानते हुए भी कुछ न जानते ह...

अकेलापन:- समस्या और समाधान...

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अकेलापन...आज की तारीख़ में एक बहुत बड़ी समस्या बनते जा रही है।शहर की यह बीमारी अब धीरे-धीरे गांव में भी अपना पांव पसार रही है।जीवन में आधुनिकता का तेजी से प्रवेश खुद को खुद तक ही सीमित करता जा रहा है और इन सबसे खुद के भीतर एक हीनता का भाव जन्म ले लेता है। यह हीनता का भाव धीरे-धीरे आपको समूह से विलग कर भीतर निराशा भर देता है।            वर्तमान सन्दर्भ में,युवावस्था में आत्महत्या की बढ़ती घटना,मानसिक बीमारियों का सर्वसामान्य होना,स्वभाव में चिड़चिड़ापन,मानसिक तनाव,घरेलू हिंसा और बच्चों के प्रति निष्ठुर व्यवहार के पीछे इसी अकेलेपन के नैराश्य की भूमिका है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में अस्तित्व की मूलभूत आयाम से खुद को दूर करना इसकी बहुत बड़ी वजह है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,आपसी सुख-दुःख में शामिल होना इसकी नैसर्गिक प्रवृति है। अस्तित्व के मूल को  भूलकर कोई भी अपने जीवन में खुशियों के फूल नहीं खिला सकता। सुविधाएं जीवन में सुख दे सकती है मगर आनन्द नहीं... समस्या बहुत गम्भीर है,देश के युवा वर्ग का यूं हताश होना कहीं न कहीं जीवनशैली में कुछ मूलभूत बदलाव...

UPSC में हिंदी माध्यम के बच्चों का इतना कम सेलेक्शन क्यों?..

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आख़िर हिंदी माध्यम के बच्चों का upsc में सेलेक्शन इतना कम क्यों?.. हाल ही में,upsc का फाइनल रिजल्ट आया है,शुरुआती लगभग 300 में किसी भी हिंदी माध्यम का न होना अत्यंत दुःखद है...दिल्ली,प्रयागराज,पटना में लाखों बच्चें upsc को ही अपना भविष्य मानकर घर-वार छोड़कर अनवरत साधना कर रहे हैं..8*7 के कमरे में किताबों,समाचारपत्रों और मासिक पत्रिकाओं को ही अपना मित्र बनाकर,देश दुनिया की खबरों पर सोच विचार रहे हैं क्यों??? बस एक सपने के साकार होने की आस में... खिचड़ी खाकर,भूँजा फाँककर,सत्तु पीकर देश के अतीत को वर्तमान से जोड़कर भविष्य का निर्धारण कर रहा युवा,भूमध्य सागर की जलवायु को  छोटे से कमरे में महसूस कर रहा युवा,देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को खुद की बचत के साथ सम्भालने का प्रयास करने वाला ग्रामीण पृष्टभूमि का युवा जिसके आंखों में राष्ट्र निर्माण का सपना है,जो लक्ष्मीकांत की राज्यव्यस्था को पढ़कर बिहार की जाति और धर्म की राजनीति के चक्रव्यूह को तोड़ने की जुगत बिठा रहा है... उसका सिलेक्शन 2% भी नही हो पा रहा,क्योंकि वो सिर्फ हिंदी माध्यम का है,गांव का है... क्या उसके साथ upsc धोखा कर रही है? ये इम्ति...

ये कैसा राष्ट्रप्रेम?...बॉलीवुड की नज़र सिर्फ आपकी जेब पर!

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ये कैसा राष्ट्र प्रेम?.. क्या फिल्मी जगत का हर सितारा सिर्फ पर्दे पर ही देशभक्ति को प्रदर्शित कर हमारी अंतः भावनाओ को भड़काकर हमारी जेब ढीली करने की फिराक में तो नहीं रहते? राष्ट्रभक्ति इनके लिए क्या सिर्फ व्यापार बनकर रह गयी है? क्या इनकी सोच में राष्ट्र की भावना का कोई महत्व नहीं है? बड़े से बड़े स्टार भी न जाने क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं? मेरे ये आरोप बिल्कुल बेबुनियाद नहीं है,किसी खास कौम से सम्बन्ध रखने वाले कलाकार यदि अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर रहे तो कुछ हद तक बात समझ मे आती है,मगर फिर भी क्या बॉलीवुड भी अब धर्म की आड़ में अपने अपने राष्ट्रीय आदर्श को ढूंढेगा? दुःख से ज्यादा दिल कचोट गया इस बात पर कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन,राष्ट्रभक्ति का चेहरा अक्षय कुमार,हिंदुत्व का झंडा थामे अजय देवगन भी खामोश... देश मे इतना बड़ा राष्ट्रीय आयोजन हो रहा, प्रधानमंत्री आयोजन में शिरकत ले रहे,शंष्टांग दंडवत प्रणाम कर रहे ,500 वर्षो की प्रतीक्षा का प्रतिफल मिल रहा है, राष्ट्रीय एकता के प्रतीक श्री राममंदिर का शिलान्यास हो रहा है,राम जो जन-जन के हैं,घट-घट में है,राम जो सबमें हैं,जो सब...

नई शिक्षा नीति 2020

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नई शिक्षा नीति 2020 पहली और सीधी बात स्पष्ट कर दूं,यह कोई विधेयक नहीं है जिसे लागू कर दिया गया है...यह बस एक शिक्षा फ्रेम है,पूरी तरीके से बस एक ड्राफ्ट है,मसौदा है...मतलब यह कि इसके सभी प्रावधानों को सरकार लागू करेंगी ये सोचना शायद बेबुनियाद और ख्याली पलाव पकाने के समान होगा... मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर फिर से शिक्षा मंत्रालय बदलने की योजना,जिससे ये मांग मान ली गयी है कि मानव कोई संसाधन नहीं.. कस्तूरी रँगन कमिटी के 480 पेजो के सुझाव के साथ देश के लाखों गणमान्य लोगों के सुझाव को 60 पेज के एक ड्राफ्ट में बदला गया है,जिसे पब्लिक डोमेन में नहीं रखा गया है.. इसे कस्तूरी रँगन की कमिटी के द्वारा दिये सुझावो के आधार पर तैयार किया गया है और NDA सरकार मूलतः जो बीजेपी प्रभुत्व वाली सरकार है वो इसे लागू करने का सोच रही है ,तो कुछ डर तो स्वाभाविक हैं.. 1.क्या यह शिक्षा नीति RSS के मूलभूत विचार हिंदुत्व या भगवाकरण का प्रोत्साहन कर रही,क्या शिक्षा का मकसद देश को केंद्रीकृत करना बन जायेगा? -तथ्यों और तर्को के आधार पर ये बातें 100% सत्य नहीं है,इस नीति में हिंदुत्व को बढ़ावा देने वा...

ये ठप्पा नहीं है,सच की खोज में निकले के गाल पर तमाचा है...

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व्यवस्था ने अपना ठप्पा लगा ही दिया...और साबित कर दिया न्याय को अब भी संविधान के किसी न किसी प्रावधान के इस्तेमाल के ज़रिए ठेंगा दिखाया जा सकता है.... ये ठप्पा सिर्फ #IPSVinayTiwari के हाथों पर नहीं है बल्कि ये तो सच की खोज में निकले हर उस शक्श के गालों पर लगा तमाचा है जो जानना चाहता है कि उसका होनहार #SushantSinghRajput कैसे मर गया?. .क्या उसने आत्महत्या किया या किसी ने आत्महत्या के लिए उकसाया या फिर कुछ और ही कहानी है.. .राजनीति ने भी अपना रुख तय कर लिया है किसे इस मुद्दे को कब कितनी हवा देनी है,कब भावनाओ को वोट में बदलना है और कहां... ये सब सियासत के बिसात पर सियासतदान के इशारे पर नाचते मोहरे तो नहीं.. .क्या बॉलीवुड और सियासत का गठजोड़ इसी तरह ठप्पा लगाकर हमारे गालों पर तमाचा जड़ता रहेगा... जनता कब तक यूं ही बदहवास ये नंगा नाच सिर्फ तमाशबीन बनकर देखती रखेगी?... क्या सच को जानने का उसकी खोज में निकलने का भी हक़ नहीं है हमें?... सवाल गहरे हैं,ये सिर्फ अब एक कलाकार की मौत का सवाल नहीं रह गया,ये सच को सामने लाने का सवाल बन गया है?... सच बेपर्दा हो...सच जो केवल सच हो... ...

दिल बेचारा

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आंखों से छलके आँसू की बूंदे...कुछ अज़ीब सा झकझोरा फ़िल्म "दिल बेचारा"ने...इस फ़िल्म को देखने से पहले मैंने ये तय किया था कि ये मानकर देखूंगा सुशांत सिंह राजपूत अभी जिंदा हैं,मैंने अपने दिल दिमाग को साफ निर्देश दे दिए थे कि इन्हें वो अभी जिंदा ही माने और बिल्कुल बस "मैनी" के कैरेक्टर को ही कहानी...शुरुआत शानदार रही,पूरी तरह से दर्द भरी संवेदना "किजी वासु" के साथ जुड़ती चली गयी...फ़िल्म ने एक मोड़ तब लिया जब "मैनी" के नकली टांगों को दिखलाया गया,यह देखकर दिल "मैनी" की जिंदादिली देखकर बहुत खुश हुआ..और अब तक सुशांत सिंह राजपूत ने फ़िल्म में साबित कर दिया था कि लोग रियल लाइफ में मरने के बाद ऐसा क्यों कह रहे थे,"लाश की तफ़्तीश अच्छे से कर लेना..कलाकार उम्दा है,क्या पता किरदार में हो"...अब तक दर्द की संवेदना "किजी"के साथ ही थी...मगर फ़िल्म के अंतिम पड़ाव ने फिर से एक बार झकझोर दिया,असल में वो फ़िल्म में हँसता,मुस्कुराता, हँसाता चेहरा "मैनी" ही मौत के दर पर था...और यहां जाकर "मैनी" और "सुशांत"ए...

कोरोना और भारत

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020 भारत में कोरोना और एक ओर अर्थव्यवस्था... प्रभाकर कुमार ''माचवे' कोरोना पूरे विश्व में आज कल इसी के चर्चे हैं। सूक्ष्मदर्शी वायरस ने आज पूरी दुनिया को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। सुपर पावर अमेरिका इस सूक्ष्मदर्शी के समक्ष खुद को विवस पा रहा है।  पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है , स्थिति और भी भयावह  होने की कगार पर है।  करोना सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाते जा रही और बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है।  भारत ने  लॉक डाउन करके स्थिति को नियंत्रित रखने का अब तक तो प्रयास किया है, किंतु इससे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की स्थिति बदतर होने की पूरी संभावना है केंद्र व राज्य सरकार के साथ साथ कई सहायता समूह ने भी इस विषम परिस्थिति में अपनी भूमिका निभाया है किंतु अब भी मुश्किलें खत्म नहीं हुई है।  भारत में 21 दिन का लॉक डाउन का निर्देश दिया गया था, जिसके बाद भी इसकी तिथि बढ़ाने की मांग की जा रही है । हर रोज कमाकर खाने वाले दिहाड़ी  मजदूरों की जीवन में दोहरी चुनौती का सामना उन्हें करना पड़ रहा है।  वर्तमान में स...