शक्ति की भक्ति और ऐसी बेबकूफी...

शक्ति की भक्ति और फिर ऐसी बेबकूफी...

विचारणीय है,हम सभी बड़े उत्साह,आस्था और श्रद्धाभाव से नौ दिनों तक शक्ति उपासना करते हैं,

कई लोग अन्न का त्याग कर फलाहार पर रहते,कुछ सात्विक आहार पर रहते...और अंतिम तिथि को मांसाहार का सेवन करते!

तनिक विचार कीजियेगा मेरी बात पर...क्या यह मांसाहार  वैज्ञानिक संदर्भ में सार्थक है?

मैं अपने आलेख में कोशिश करूंगा कि आपको तर्कसंगत बात बताऊं।

नौ दिनों तक सात्विक आहार का सेवन करने से हमारे पाचन तंत्र को बहुत आराम मिलता है और वो खुद को अच्छे तरीके से संतुलित कर लेते हैं।पाचन तंत्र को आराम मिलने के कारण प्राणवायु का प्रवाह मस्तिष्क की ओर अधिक मात्रा में होता है जिससे उनकी क्षमता बढ़ती है और दिमाग को पोषण मिलता है,किंतु फिर एकाएक ऐसे भोजन को खाना जिसे पचने में अधिक वक़्त लगे,एक स्तनधारी होने के कारण शरीर को उसकी कोडिंग को ऊर्जा में बदलने में बहुत मेहनत करने पड़े जिस कारण मस्तिष्क की ओर जाने वाली प्राणवायु एकाएक कम हो जाती है,जिससे मानसिक परेशानी होने की संभावना बढ़ जाती है...

क्या आपको नहीं लगता इंजन की सफाई करने के तुरन्त बाद उस पर एकाएक ओवरलोड नहीं देना चाहिए?..

कुछ लोग कहेंगे,  कोई शौक से नहीं खा रहे...देवी को बलि दी जाती है ये उसी का प्रसाद है

तो जनाब,एक बात बताइए...

सनातन संस्कृति कहती है,"हर जीव में आत्मा है और वो आत्मा परमात्मा का ही अंश"...
तो हर जीव शक्ति स्वरूपा देवी की ही संतान हैं, तो एक बात बताइए क्या कोई मां अपने बच्चों का गला कटवाकर प्रसन्न हो सकती है!

जब हमारी मां अपने बच्चे के पांव में हल्का सा खरोंच आने पर आत्मविह्वल हो जाती है तो क्या जगतमाता इतनी निष्ठुर,निर्दयी है जो अपने बच्चें को कटवाकर उसका प्रसाद खाने कहती है...

और यदि आप ऐसी निष्ठुर,निर्दयी को मां कहते हैं तो मुझे आपकी बुद्धिमता पर सन्देह हो रहा है...

स्वयं विचार कीजिये......

प्रभाकर कुमार "माचवे"

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