कोरोना और भारत
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020
भारत में कोरोना और एक ओर अर्थव्यवस्था...
प्रभाकर कुमार ''माचवे'
कोरोना पूरे विश्व में आज कल इसी के चर्चे हैं। सूक्ष्मदर्शी वायरस ने आज पूरी दुनिया को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। सुपर पावर अमेरिका इस सूक्ष्मदर्शी के समक्ष खुद को विवस पा रहा है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है , स्थिति और भी भयावह होने की कगार पर है। करोना सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाते जा रही और बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है। भारत ने लॉक डाउन करके स्थिति को नियंत्रित रखने का अब तक तो प्रयास किया है, किंतु इससे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की स्थिति बदतर होने की पूरी संभावना है केंद्र व राज्य सरकार के साथ साथ कई सहायता समूह ने भी इस विषम परिस्थिति में अपनी भूमिका निभाया है किंतु अब भी मुश्किलें खत्म नहीं हुई है। भारत में 21 दिन का लॉक डाउन का निर्देश दिया गया था, जिसके बाद भी इसकी तिथि बढ़ाने की मांग की जा रही है ।
हर रोज कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों की जीवन में दोहरी चुनौती का सामना उन्हें करना पड़ रहा है। वर्तमान में स्थिति को नियंत्रित करने का एक मात्र विकल्प लॉक डाउन ही है। लॉक डाउन के जरिए कोरोना की चैन को तोड़ने में कामयाबी मिल सकती है। सरकार सामाजिक संगठन और व्यक्तिगत सहभागिता के जरिए इस मुश्किल से हम जल्द निकलेंगे।
: लेकिन इस कोरोना ने हमें या अल्टीमेटम दे दिया है कि अर्थव्यवस्था संवृद्धि की अंधी दौड़ में हम अपनी मौलिकता को खोकर बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। वैश्वीकरण विचारों, वस्तुओं व सेवाओं की सुगम परिवहन के साथ-साथ वैश्विक महामारी का भी कारण बन सकती है।
कोरोना महामारी'' ने पूरे विश्व को अपनी अर्थव्यवस्था को प्रकृति अनुकूल बनाए बनाने के साफ दिशा-निर्देश दे दिए हैं। वैश्विक महामारी के इस दौर में भारत का विश्व नेतृत्व की भूमिका में प्रखरता से सम्मुख आना, भारत के ''विश्व गुरु'' बनने के मार्ग को परास्त कर रहा है। विश्व गुरु का विश्व को एकमात्र ज्ञान होगा ''मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
कोरोना ने मानव की नश्वरता और भौतिकता की लघुता का एहसास कराया है। जान बचाने के लिए घरों में कैद लोगों को अपनी नश्वरता का एहसास एक वायरस ने करवाया है। ये वक्त जीवन में मूल्यों को परखने का वक्त है। भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अन्य तरह की लोलुपता आखिर क्यों? कमजोर तबकों को सताना, प्रकृति के साथ बदसलूकी आखिर क्यों ? धन कमाने की अंधी दौड़ में अपने बच्चों व परिवार की नजर अंदाजगी आखिर क्यों ? मुझे यकीन है कि इस कोरोना महामारी की समस्या को हराकर जो विश्व पुनः खड़ा होगा, यकीनन वह आर्थिक रुप से कमजोर होगा, किन्तु आत्मिक व मनोवैज्ञानिक रुप से हर मानव संबल होगा। धन की लोलुपता की अंधी चाह समाप्त होगी और मानवता ही विश्व का एकमात्र धर्म बनेगा।
।। प्रभाकर कुमार माचवे।।
भारत में कोरोना और एक ओर अर्थव्यवस्था...
प्रभाकर कुमार ''माचवे'
कोरोना पूरे विश्व में आज कल इसी के चर्चे हैं। सूक्ष्मदर्शी वायरस ने आज पूरी दुनिया को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। सुपर पावर अमेरिका इस सूक्ष्मदर्शी के समक्ष खुद को विवस पा रहा है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है , स्थिति और भी भयावह होने की कगार पर है। करोना सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाते जा रही और बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है। भारत ने लॉक डाउन करके स्थिति को नियंत्रित रखने का अब तक तो प्रयास किया है, किंतु इससे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की स्थिति बदतर होने की पूरी संभावना है केंद्र व राज्य सरकार के साथ साथ कई सहायता समूह ने भी इस विषम परिस्थिति में अपनी भूमिका निभाया है किंतु अब भी मुश्किलें खत्म नहीं हुई है। भारत में 21 दिन का लॉक डाउन का निर्देश दिया गया था, जिसके बाद भी इसकी तिथि बढ़ाने की मांग की जा रही है ।
हर रोज कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों की जीवन में दोहरी चुनौती का सामना उन्हें करना पड़ रहा है। वर्तमान में स्थिति को नियंत्रित करने का एक मात्र विकल्प लॉक डाउन ही है। लॉक डाउन के जरिए कोरोना की चैन को तोड़ने में कामयाबी मिल सकती है। सरकार सामाजिक संगठन और व्यक्तिगत सहभागिता के जरिए इस मुश्किल से हम जल्द निकलेंगे।
: लेकिन इस कोरोना ने हमें या अल्टीमेटम दे दिया है कि अर्थव्यवस्था संवृद्धि की अंधी दौड़ में हम अपनी मौलिकता को खोकर बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। वैश्वीकरण विचारों, वस्तुओं व सेवाओं की सुगम परिवहन के साथ-साथ वैश्विक महामारी का भी कारण बन सकती है।
कोरोना महामारी'' ने पूरे विश्व को अपनी अर्थव्यवस्था को प्रकृति अनुकूल बनाए बनाने के साफ दिशा-निर्देश दे दिए हैं। वैश्विक महामारी के इस दौर में भारत का विश्व नेतृत्व की भूमिका में प्रखरता से सम्मुख आना, भारत के ''विश्व गुरु'' बनने के मार्ग को परास्त कर रहा है। विश्व गुरु का विश्व को एकमात्र ज्ञान होगा ''मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
कोरोना ने मानव की नश्वरता और भौतिकता की लघुता का एहसास कराया है। जान बचाने के लिए घरों में कैद लोगों को अपनी नश्वरता का एहसास एक वायरस ने करवाया है। ये वक्त जीवन में मूल्यों को परखने का वक्त है। भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अन्य तरह की लोलुपता आखिर क्यों? कमजोर तबकों को सताना, प्रकृति के साथ बदसलूकी आखिर क्यों ? धन कमाने की अंधी दौड़ में अपने बच्चों व परिवार की नजर अंदाजगी आखिर क्यों ? मुझे यकीन है कि इस कोरोना महामारी की समस्या को हराकर जो विश्व पुनः खड़ा होगा, यकीनन वह आर्थिक रुप से कमजोर होगा, किन्तु आत्मिक व मनोवैज्ञानिक रुप से हर मानव संबल होगा। धन की लोलुपता की अंधी चाह समाप्त होगी और मानवता ही विश्व का एकमात्र धर्म बनेगा।
।। प्रभाकर कुमार माचवे।।
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