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जीवन के दो बड़े निर्णय

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जीवन के ये दो बड़े निर्णय – आपकी जिंदगी को स्वर्ग भी बना सकते और नरक भी... जीवन वही है जो हम चुनते हैं... रास्ते हमारे सामने होते हैं, पर उस पर चलने का निर्णय हमारा होता है... यही वजह है कि आज हम जैसे भी हैं, वो हमारे ही चुनावों का नतीजा है... इन चुनावों में दो ऐसे निर्णय हैं जो इंसान की पूरी जीवनयात्रा की दिशा तय कर देते हैं—पहला निर्णय नौकरी और दूसरा निर्णय शादी... ये दोनों मिलकर तय करते हैं कि हमारी जिंदगी एक सुखद स्वर्ग बनेगी या क्लेशमय नरक... नौकरी महज़ रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि हमारे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और जीवन की दिशा की पहली सीढ़ी है...नौकरी चुनते समय हम अक्सर सिर्फ़ तनख़्वाह देखते हैं, लेकिन अनुभव सिखाता है कि माहौल और सीखने के अवसर कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं... एक अच्छी नौकरी इंसान के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलती है, पर गलत नौकरी ऐसा बोझ बन जाती है कि हर सुबह अलार्म की आवाज़ भी एक सज़ा लगे... गलत नौकरी का मतलब यह नहीं कि जीवन वहीं थम गया, लेकिन हाँ, यह जरूर है कि एक गलत शुरुआत इंसान को हताश और अविश्वासी बना सकता है..और यदि शुरुआत सही हो जाए तो ...

ओशो के दृष्टिकोण में गांधी...

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गांधी को प्रायः एक तपस्वी, सादगीप्रिय और सत्य-अहिंसा के पुजारी के रूप में देखा जाता है.. किंतु, जब हम ओशो की दृष्टि से गांधी को समझने का प्रयास करते हैं, तो यह छवि बिल्कुल भिन्न रूप ले लेती है। ओशो ने गांधी को “दकियानूसी, परम्परावादी और रूढ़िवादी” सिद्ध किया, जिनकी सोच भारत के भविष्य को आधुनिकता से वंचित रखने वाली थी... ओशो बार-बार कहते हैं— “गांधी का आदर्श गरीब भारत है। लेकिन गरीबी कोई आदर्श नहीं हो सकती। गरीबी रोग है, जिसे मिटाना चाहिए, महिमामंडित नहीं करना चाहिए। और गांधी गरीबी को सुंदर बनाने में लगे हैं। यह पाखंड है।” गांधी का थर्ड क्लास में सफर करना, बकरी का दूध पीना, खादी पहनना—ये सब ओशो के अनुसार प्रदर्शन के प्रतीक थे, जिनसे जनता प्रभावित हो तो सकती थी, परंतु वास्तविक समाधान कभी नहीं निकल सकता था... गरीबी का इलाज यह नहीं कि उसे जीवन-शैली बना लिया जाए, बल्कि यह है कि विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता से उसे मिटाया जाए.. ओशो ने साफ कहा— “गांधी मशीनों से डरते हैं। वे चाहते हैं कि भारत चरखा कातते हुए आत्मनिर्भर बने। लेकिन चरखा दुनिया को पेट नहीं भर सकता। चरख...

बुजुर्ग - बरगद के समान

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. बुजुर्ग – घने बरगद के समान बुजुर्ग सचमुच घने बरगद के समान होते हैं... उनकी छाँव में न केवल सुकून मिलता है, बल्कि सुरक्षा का गहरा अहसास भी होता है..बरगद की गहरी जड़ों की तरह ही उनके अनुभव जीवन को स्थिरता और मजबूती देते हैं... उनके द्वारा जिया गया लंबा जीवन हमें यह सिखाता है कि उतार-चढ़ाव के बीच भी कैसे संतुलन बनाए रखा जाए... अनुभव का महत्व जीवन में शब्दों से कहीं अधिक है... किताबों और डिग्रियों से जो ज्ञान मिलता है, वह अधूरा होता है यदि उसे बुजुर्गों की जीवनानुभूतियों से न जोड़ा जाए... उनका संघर्ष, उनका धैर्य, उनकी दूरदर्शिता – ये सब हमें वह सिखाते हैं जो केवल समय और परिस्थितियाँ ही सिखा सकती हैं.. किंतु , दुख की बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी जिस तेजी से पाश्चात्य संस्कृति को अपनाती जा रही है, उसके चलते चारित्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है...परिवार व्यवस्था की नींव कमजोर होती जा रही है और उसी के साथ तनाव, नैराश्य और संबंधों का खोखलापन बढ़ रहा है... आज बच्चों के जीवन से दादी-नानी की कहानियाँ लगभग विलुप्त हो चुकी हैं... कभी रात्रि को चारपाई पर लेटकर सुनाई जाने वाली वे कह...

गीता के अनुसार - जिंदा कौन ?

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गीता के अनुसार – जिंदा कौन ? हम अक्सर “जिंदा” होने की परिभाषा को शरीर की हरकतों, सांसों और इंद्रियों की सक्रियता से जोड़ देते हैं... जीवविज्ञान की दृष्टि से यही लक्षण जीवन के प्रमाण हैं – हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, भोजन-निद्रा और चेतना की गतिविधियाँ... परंतु गीता इन सबसे परे जाकर “जीवित होने” की एक बिल्कुल अलग और गहरी परिभाषा रखती है.. भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत...   “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥” (2.18)  यह शरीर नाशवान है, परंतु इसके भीतर रहने वाली आत्मा अविनाशी है. अब प्रश्न यह उठता है कि फिर कौन वास्तव में जिंदा है ? गीता का उत्तर स्पष्ट है—जो अपने भीतर की आत्मा को पहचान ले, वही सचमुच जिंदा है...केवल शरीर का जीवित रहना जीवन नहीं है, क्योंकि शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिल ही जाएगा... सच्चा जीवन आत्मा की पहचान में है, धर्म और सत्य की साधना में है... यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपने अहम, झूठ और छल के साथ जी रहा है, तो भले ही वह सांस ले रहा हो, चल-फ...

कृष्ण कौन हैं ?

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कृष्ण—यह नाम मात्र एक व्यक्ति, एक चेहरा, एक देह या किसी काल-स्थान विशेष की परिधि में सीमित कर देने योग्य नहीं है... वेदांत के आलोक में देखें तो कृष्ण का अर्थ है – पूर्णता, सम्पूर्णता...कृष्ण न किसी युग की कैद में हैं, न किसी भूगोल की सीमा में.. वे न केवल एक ऐतिहासिक चरित्र हैं, न केवल माखन चुराने वाले बालक, न केवल बांसुरी बजाने वाले गोपबंधु और न केवल महाभारत के सारथी...असल में कृष्ण बोध का रूप हैं, परमात्मा का पूर्णतम स्वरूप हैं... वेदांत कहता है—"जो अकारण है, वही परम है" कृष्ण उसी अकारण का मूर्त स्वरूप हैं.. वे प्रकृति की धारा से तटस्थ, स्वयं में पूर्ण और स्वयं में स्थित... राम में मर्यादा का आदर्श है, बुद्ध में करुणा का, पर कृष्ण में पूर्णता है—जहाँ मर्यादा का भी अतिक्रमण है... कृष्ण न तो प्रशंसा के मोह से बंधते हैं, न निंदा के भय से...उनका होना किसी "उचित-अनुचित" की चौखट पर निर्भर नहीं है। वे जैसे हैं—वैसे ही पूर्ण... वेदांत के सूत्र में यह बात बार-बार आती है कि परमात्मा को किसी विशेष रूप, किसी विशेष परिस्थिति से बाँधा नहीं जा सकता... कृष्...

आख़िर क्या मतलब है आज़ादी का ?

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आख़िर क्या है आज़ादी का मतलब? हर साल पंद्रह अगस्त की सुबह सूरज कुछ अलग चमक लेकर आता है... आसमान पर तिरंगे की लहराती परछाईं, स्कूल-कॉलेजों में बच्चों की कतार, गूँजता राष्ट्रगान, और फिर अंत में मुँह में घुलती गरमागरम जलेबी... बस, हममें से बहुतों के लिए यहीं खत्म हो जाता है "आज़ादी दिवस" का मायना—एक वार्षिक उत्सव, जो अगले दिन अख़बार के कोनों में तस्वीर बनकर रह जाता है.. लेकिन, क्या आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना भर है? हम भूल जाते हैं कि यह आज़ादी हमें किसी मेले में बाँटी जाने वाली मिठाई की तरह "खैरात" में नहीं मिली...इसके पीछे अनगिनत शहीदों की कुर्बानी है—जेल की कोठरियों में गूँजते इंकलाब के नारे, फाँसी के तख़्त पर मुस्कुराता चेहरा, गोली के सामने सीना तानकर खड़ा किसान, और वो माँ जो अपने बेटे की शहादत पर गर्व के आँसू बहाती है। यह दिन सिर्फ खुशी का नहीं, बल्कि उस गहरे एहसास का दिन है कि हमारी साँसों में जो आज़ादी का स्वाद है, वह रक्त से सींची गई है... कई लोग इसे केवल "विदेशी शासन से मुक्ति" के रूप में समझते हैं, लेकिन अगर हम ईमानदारी से देखें, तो आज़ादी...

50% का टैरिफ... भारत के लिए आपदा में अवसर...

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अभी  अमेरिका ने भारत पर 50% का टैरिफ (सीमा शुल्क) लगा दिया। देखने में यह एक आर्थिक आक्रमण जैसा लगता है, लेकिन जो राष्ट्र दृष्टि, धैर्य और दिशा से चलता है, उसके लिए हर चोट एक चिंगारी बनती है, आत्मनिर्भरता की अग्नि को और तेज करने के लिए.... यह वही भारत है, जिसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया – "हम रूस से तेल का आयात करते रहेंगे। हमारी नीति हमारी है, और ये 140 करोड़ लोगों के हित मे है" और यह घोषणा केवल रूस से संबंध निभाने की बात नहीं है, यह उस ‘नई भारत’ की हुंकार है जो न तो दबाव में झुकता है, न दंड से डरता है.... अमेरिका का टैरिफ वार – उसके के लिए खतरा इतिहास गवाह है कि जब-जब अमेरिका ने टैरिफ का हथियार उठाया है, उसने दूसरों से ज्यादा खुद को नुकसान पहुंचाया है। ट्रम्प के कार्यकाल में भी अमेरिका ने यही किया, और वैश्विक व्यापार में उसकी साख डगमगाने लगी। अमेरिका की यह नीति – “हर देश मेरे दरवाज़े पर झुके” – अब अस्वीकार्य हो चुकी है। यह 21वीं सदी है , और भारत जैसे राष्ट्र अब केवल सुनने नहीं, उत्तर देने लगे हैं । आज जब भारत ने दो टूक कहा कि हम रूस से सस्ते तेल लेंगे...

आख़िर क्या अंतर होता ? लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में...

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 कक्षा में जब मैंने बच्चों से 'दोस्ती' पर संवाद किया, तो शब्दों के परे एक अनकही गहराई में डूब गया। एक मासूम-सा प्रश्न उभरा — "सर, लड़कों की दोस्ती और लड़कियों की दोस्ती में फर्क क्या होता है?" प्रश्न छोटा था, परंतु उस प्रश्न की तह में संबंधों की पूरी एक दुनिया थी। लड़कों की दोस्ती अक्सर बाहर से ऊँची आवाज़ों वाली, ठहाकों से गूंजती, एक-दूसरे की पीठ पर धौल जमाते हुए एक 'जुनून' की तरह होती है...उसमें एक अघोषित समझदारी होती है — बिना कहे भी सब कुछ जान लेने वाली। जैसे फिल्म ‘शोले’ में जय और वीरू की यारी। उनके बीच संवाद कम, मगर विश्वास अटूट...  लड़कों की दोस्ती में ‘साथ निभाने’ की कसमें होती हैं — चाहे पिटाई हो, स्कूल से भागना हो या किसी क्रश को चुपचाप ताकना हो। और जब बिछड़ते हैं, तो शायद आँसू नहीं बहाते, मगर अकेले में सिगरेट की राख में दोस्त की तस्वीर जला बैठते हैं...मगर, दिल के कोनो में कसक बनी रहती है और मन अतीत की सुनहरी यादों में कभी-कभी चाहे अनचाहे गोता लगाते रहता है... और यदि ये दोस्ती किसी वजह से दुश्मनी में बदल जाये तो इससे बड़ा कोई जानी दुश्मन नह...