अब जाग तू

         जब जागे ....तभी सवेरा...
अंधकार भरी रात को,कब का सूरज खा चुका....
और तू नींद के आगोश में है सो रहा...
क्यों तू अपनी किस्मत पर है रो रहा?
अरे जाग,सवेरा कर रहा तेरा इंतेज़ार...
हताश होकर न थम तू,बंदिशों में न खुद को जकड़ तू...
उठ चल,देख..."आज"तुझे पुकार रहा....
और तू न जाने किस दुनिया में खुद को भुला रहा...
  " जब जागे तभी सवेरा"
आलस्य की चादरों को फेंक कर,संकल्प के हल को थामकर...
घर से निकल तू..
देख,सवेरा कर रहा तेरा इंतज़ार...
जाग तो सही...
"आज" को तेरी जरूरत है...
और तू बीते कल में खुद को खो रहा...
नींद के आगोश में सो रहा...
क्यों तू अपनी किस्मत पर रो रहा?
मत हो यूं हताश...
आज को है तेरी तलाश..
खुद पर रख इतना विश्वास...
अरे जाग तू,कब तक रहेगा यूं सोया...
अतीत में यूं खुद को खोया...
"जब जागे ....तभी सवेरा"..


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