बचपन कर रहा नशा...

बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना...
बड़े शिद्दत से हथेली को अंगूठे से रगड़कर...
न जाने कहाँ है,और कितना बेखबर...
मुँह से एक अजीब सी 'कस'को खींचकर...
अंधेरे में गुज़ार रहा अपना रौशन सहर....
बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना...
                    ....बेफिक्र है दोनों.....
आने वाली कयामत को लेकर..एक अजीब सी आफत को लेकर...
ये तूफान के आने के पहले का सन्नाटा है...
सिगरेट के धुंए को फेफड़े से गुजारकर ,यह बतलाना चाह रहा....
बेकौल हवाओं को भी कैद कर लेंगे हम....
मौत को भी जीत लेंगे हम...
बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना...
किस दौर में जी रहें ये...
मौत को बुलावे का दावत दे रहे ये...
अजीब पहेली है,जिससे लगता है सबसे ज्यादा डर...
उसके और करीब जाकर जश्न मनाता है....
खुद को खोकर न जाने क्या पाता है ..
बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना...
गिलासों को टकराकर,क्या बतलाना चाहती है ये जवानी...
"सोमरस" के पान से मदहोश होकर,क्या दिखलाना चाहती है जवानी...
गजब तो तब हुआ......
      जब कहता है खुद को 'त्रिलोकी'का भक्त....
अरे मुरख....
      इस मदहोशी के चक्कर में काला हो रहा तेरा रक्त..
चरस,अफीम,गांजा को 'भोले'का प्रसाद है बतलाता...
कोई इन्हें बतलाए...
  ये 'भोला'....'शंभू' है....
स्वयं से बना....स्वयं से पूरा....
बचपन कर रहा नशा...जवानी तो मदहोशी में है फना...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

KBC की यह घटना बहुत कुछ कहती है...

नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

घूंघट में खान सर की दुल्हनियाँ...