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जो होता है, जब होता है, जैसे होता है... वो होना ही होता है...

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कभी मन ठहरकर यह सोचता है कि यदि जीवन के कुछ बुनियादी सत्य समय रहते स्पष्ट हो जाएँ,कोई हमें समय रहते ही उस सत्य से अवगत करा दे, तो कितनी जटिलताएँ अपने आप हल हो जाएगी... शायद बहुत-सी उलझनें जन्म ही न लें, शायद निर्णयों में वह अनावश्यक भटकाव न हो जो अक्सर शरीर और मन दोनों को थकाकर छोड़ देता है। ऐसा लगता है, जैसे समय से पहले मिली समझ जीवन को सहज, संतुलित और थोड़ी कम पीड़ादायक बना सकती है। पर इसी विचार के साथ एक दूसरा भाव भी उठता है भीतर किसी कोने में,  चुपचाप... बिना शोर किए... क्या जीवन में सुलभता ही जीवन का उद्देश्य है? क्या बहुत जल्दी सब कुछ समझ लेना जीवन की उस कशिश को कम नहीं कर देता, जो उसे जीवंत,अनूठा और रहस्यमयी बनाती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि समय से पहले आई समझ जीवन को सुरक्षित तो कर देती है, पर उसे थोड़ा सपाट भी बना देती है...सुनियोजित.... पूर्वनिर्धारित..... जीवन शायद केवल सही ढंग से जीने की प्रक्रिया नहीं है, वह अनुभव करने की एक यात्रा भी है। और अनुभव अक्सर वहीं जन्म लेते हैं जहाँ समझ अधूरी होती है। जहाँ व्यक्ति सब कुछ जानता नहीं, पर सब कुछ जानने की बेचैनी उसे नए प्...

डिजिटल भीड़ - लोकतंत्र की नई चुनौती

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कभी-कभी लगता है कि आज की युवा पीढ़ी क्रांति को बस एक फूहड़ मजाक बनाकर रख दी है...कैमरे के सामने चीख-चीखकर बेतुके तर्कों से किसी एक पक्ष को दिखलाना ही उन्हें नायक घोषित  कर देता..आज शोर को साहस समझ लिया गया है और अपमान को जागरूकता... यही वह जगह है जहाँ से डिजिटल भीड़ जन्म लेती है। डिजिटल भीड़ वह है जो प्रश्न कम और प्रदर्शन अधिक करती है। जो पद को व्यक्ति से अलग करके देखने की समझ नहीं रखती। जो किसी अधिकारी या शिक्षक को कैमरे के सामने कठघरे में खड़ा कर स्वयं को जननायक घोषित कर देती है। यह भीड़ मानती है कि जितनी ऊँची आवाज़, उतनी बड़ी सच्चाई... पर इतिहास गवाह है, सच्चाई का स्वर प्रायः धीमा होता है, पर स्थायी होता है... हमारे स्वतंत्रता संग्राम की परंपरा में इसके अनेकों उदाहरण मिलते हैं।महात्मा गांधी ने साम्राज्य को चुनौती दी, उनके स्वर में गाली नहीं, आग्रह था। वे जानते थे कि व्यवस्था से लड़ते हुए भी मनुष्यता को नहीं खोना है। संघर्ष उनके लिए तप था, तमाशा नहीं... डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने व्यवस्था की कठोर आलोचना की, पर वे भीड़ के भरोसे नहीं चले... उन्होंने पुस्तकें पढ़ीं, तर्क गढ़...

बागेश्वर बाबा के हिम्मत को सलाम...

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आज के समय में जब समाज तरह-तरह के झगड़ों, राजनीति और जातिगत खींचतान में उलझा हुआ है, ऐसे में अगर कोई युवा 150 किलोमीटर की पदयात्रा सिर्फ इसलिए करता है कि समाज एकजुट हो जाए — तो उसे सलाम बनता है। बागेश्वर धाम सरकार की यह “सनातन हिन्दू एकता पदयात्रा” सिर्फ दिल्ली से मथुरा तक की यात्रा नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने की यात्रा है... भारत आज जिस सबसे बड़ी बीमारी से जूझ रहा है, उसका नाम है जातिगत द्वेष... यह बीमारी धीरे-धीरे समाज की नसों में जहर की तरह फैल गई है। यह वह जहर है जो हमारे बीच नफरत, हीनभावना और अविश्वास पैदा करता है। आतंकवाद या नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक यह बीमारी है, क्योंकि यह हमारे घर, मोहल्ले और दिलों में बैठी है। दुख की बात यह है कि देश के बड़े-बड़े नेता, बुद्धिजीवी या कलाकार इस विषय पर बोलने से बचते हैं। मगर, अब एक 29 साल का लड़का आगे आया है, जो इस आग को बुझाने के लिए खुद मैदान में उतरा है... यह युवा न तो किसी राजनीतिक पार्टी का चेहरा है, न किसी पूंजीपति का मोहरा। यह वही भारत का बेटा है जो गाँव के स्कूल में पढ़ा, संघर्षों से गुजरा और अब देश को जोड़ने निक...

KBC की यह घटना बहुत कुछ कहती है...

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टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति (KBC) में घटित एक छोटी-सी घटना ने पूरे समाज को सोचने पर विवश कर दिया... मंच पर किसी बच्चे की एक हरकत ने न केवल दर्शकों को चौंकाया बल्कि सोशल मीडिया पर यह बहस छेड़ दी कि — क्या आज की परवरिश में कहीं कुछ गड़बड़ है ? क्या बच्चे अब संस्कारों की जगह केवल आत्म-प्रदर्शन में विश्वास करने लगे हैं ? दरअसल, हर बच्चा अपने परिवेश का प्रतिबिंब होता है। उसकी बातें, हाव-भाव, और व्यवहार कहीं न कहीं उस संस्कृति, घर और समाज की छाया लिए होते हैं जिसमें वह पलता-बढ़ता है... यही कारण है कि यह घटना केवल एक बालक की हरकत नहीं, बल्कि हमारे समय की परवरिश, शिक्षा और सामाजिक परिवेश पर प्रश्नचिह्न बनकर उभरी है...   परवरिश के बदलते स्वरूप   - आज के माता-पिता बच्चों को खुला माहौल देना चाहते हैं — आत्मविश्वासी, स्पष्टवक्ता और निडर बनाना उनकी प्राथमिकता है। यह निश्चय ही आवश्यक भी है, लेकिन कहीं न कहीं इस प्रक्रिया में मर्यादा और विनम्रता की रेखा धुंधली होती जा रही है...आत्मविश्वास और अभिमान के बीच का फर्क मिटता जा रहा है। यह घटना हमें यह सोचने को बाध्य करती है कि बच्चे...

अपने या सपने

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रात के एकांत में जब मनुष्य खुद से संवाद करते हुए अपने निर्णयों को टटोलता है, तो अक्सर उसके सामने दो ही राहें होती हैं-  अपने या सपने...  कोई  अपनों की मुस्कुराहट के लिए अपने सुनहरे सपनों को तिलांजलि दे देता है, तो कोई अपने सपनों की ऊँचाई के लिए अपनों  से ही दूर चला जाता है.... मगर सच कहें तो  दुःखी दोनों ही हैं.. . पहला व्यक्ति जब रात को बिस्तर पर करवटें बदलता है तो उसके भीतर एक हूक उठती है— “काश, मैंने वो सपना पूरा किया होता !”  और दूसरा जब अपनी सफलता की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा होता है, तो उसे भी कहीं न कहीं अपनेपन की कमी सालती है— “काश, ये सब बाँटने के लिए अपने साथ होते !” दरअसल, जीवन किसी गणितीय समीकरण की तरह सरल नहीं है... यहाँ ‘सही’ और ‘ग़लत’ का तराजू अक्सर परिस्थितियों और स्वभाव से झुकता है.. कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और रिश्तों का दबाव हमें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जिससे अपने सपनों को रोकना पड़ता है.… और कभी हमारे भीतर का स्वभाव—आज़ादी की प्यास, उड़ान की ललक—हमें अपनों से दूर खींच ले जाती है... जरा सोचिए, जो पुत्र गाँव में रहकर ...

क्या भारत में हो सकते तख्तापलट ?

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क्या भारत में हो सकता तख़्तापलट? भारत आज़ादी के बाद से जिस लोकतांत्रिक राह पर बढ़ा है, वहाँ तख़्तापलट की संभावना पर चर्चा अपने आप में रोचक भी है और गंभीर भी...अभी जिस तरह से दक्षिण एशियाई देशों में जिस तीव्रता के साथ   रातों-रात सत्ता बदलते देखा है,उससे इस बिंदु पर विचार करना लाज़मी हो गया है...कई देशों में बंदूक़ की नली पर लोकतंत्र को गिरफ़्तार कर लिया गया, लेकिन भारत के मामले में सवाल उठता है—क्या यहाँ ऐसा संभव है ? इसका उत्तर है— इतनी आसानी से नहीं.. . इसके पीछे कई ठोस कारण हैं, जो हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव को दर्शाते हैं... सबसे पहली बात, भारत का संविधान सिर्फ़ एक कानूनी किताब नहीं है, बल्कि यह समाज की विविधता और लोकतंत्र की गहराई को समेटे हुए है... इसका सबसे बड़ा गुण है लचीलापन...  जब भी देश में सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ा, तो संविधान ने संशोधन और व्याख्या के रास्ते खोल दिए..यही वजह है कि किसी भी वर्ग या समुदाय को ऐसा महसूस नहीं होता कि उनकी आवाज़ पूरी तरह दबा दी गई है.. दूसरी बात आती है भारत के संघीय ढाँचे की... यहाँ सत्ता सिर्फ़ केंद्र...

नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

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नेपाल में उठती अशांति और भारत की चिंता नेपाल की सड़कों पर जो हलचल मची है, उसकी गूँज केवल काठमांडू की गलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के कानों तक भी पहुँच रही है। पिछले तीन वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में हिंसक और अराजक तख़्तापलट हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सचमुच जनता की स्वतःस्फूर्त आवाज़ है या इसके पीछे कोई गहरी साज़िश बुन रही है? अक्सर लोग मान लेते हैं कि यह सब छात्रों या GenZ युवाओं के आकस्मिक आंदोलन हैं, लेकिन यह सोच सरासर भ्रम है.. दरअसल, दुनिया की बड़ी ताक़तें किसी भी देश में अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए अदृश्य चालें चलती रहती हैं। जब तक सत्ता उनके अनुकूल रहती है, सब ठीक रहता है। लेकिन जैसे ही कोई मज़बूत नेतृत्व उनके हितों पर रोक लगाता है, तभी ये महाशक्तियाँ सक्रिय होकर उस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती हैं। उनकी चाल का तरीका भी तय होता है। सबसे पहले विपक्ष को मज़बूत किया जाता है, चुनावी फंडिंग कराई जाती है और अपने मीडिया नेटवर्क व इंटरनेट कंपनियों के माध्यम से वातावरण बनाया जाता है। जब यह उपाय नाकाम होते हैं, तब तख़्तापलट की योजना ...