जो होता है, जब होता है, जैसे होता है... वो होना ही होता है...
कभी मन ठहरकर यह सोचता है कि यदि जीवन के कुछ बुनियादी सत्य समय रहते स्पष्ट हो जाएँ,कोई हमें समय रहते ही उस सत्य से अवगत करा दे, तो कितनी जटिलताएँ अपने आप हल हो जाएगी... शायद बहुत-सी उलझनें जन्म ही न लें, शायद निर्णयों में वह अनावश्यक भटकाव न हो जो अक्सर शरीर और मन दोनों को थकाकर छोड़ देता है। ऐसा लगता है, जैसे समय से पहले मिली समझ जीवन को सहज, संतुलित और थोड़ी कम पीड़ादायक बना सकती है। पर इसी विचार के साथ एक दूसरा भाव भी उठता है भीतर किसी कोने में, चुपचाप... बिना शोर किए... क्या जीवन में सुलभता ही जीवन का उद्देश्य है? क्या बहुत जल्दी सब कुछ समझ लेना जीवन की उस कशिश को कम नहीं कर देता, जो उसे जीवंत,अनूठा और रहस्यमयी बनाती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि समय से पहले आई समझ जीवन को सुरक्षित तो कर देती है, पर उसे थोड़ा सपाट भी बना देती है...सुनियोजित.... पूर्वनिर्धारित..... जीवन शायद केवल सही ढंग से जीने की प्रक्रिया नहीं है, वह अनुभव करने की एक यात्रा भी है। और अनुभव अक्सर वहीं जन्म लेते हैं जहाँ समझ अधूरी होती है। जहाँ व्यक्ति सब कुछ जानता नहीं, पर सब कुछ जानने की बेचैनी उसे नए प्...