जो होता है, जब होता है, जैसे होता है... वो होना ही होता है...

कभी मन ठहरकर यह सोचता है कि यदि जीवन के कुछ बुनियादी सत्य समय रहते स्पष्ट हो जाएँ,कोई हमें समय रहते ही उस सत्य से अवगत करा दे, तो कितनी जटिलताएँ अपने आप हल हो जाएगी... शायद बहुत-सी उलझनें जन्म ही न लें, शायद निर्णयों में वह अनावश्यक भटकाव न हो जो अक्सर शरीर और मन दोनों को थकाकर छोड़ देता है। ऐसा लगता है, जैसे समय से पहले मिली समझ जीवन को सहज, संतुलित और थोड़ी कम पीड़ादायक बना सकती है।
पर इसी विचार के साथ एक दूसरा भाव भी उठता है भीतर किसी कोने में,  चुपचाप... बिना शोर किए... क्या जीवन में सुलभता ही जीवन का उद्देश्य है? क्या बहुत जल्दी सब कुछ समझ लेना जीवन की उस कशिश को कम नहीं कर देता, जो उसे जीवंत,अनूठा और रहस्यमयी बनाती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि समय से पहले आई समझ जीवन को सुरक्षित तो कर देती है, पर उसे थोड़ा सपाट भी बना देती है...सुनियोजित.... पूर्वनिर्धारित.....
जीवन शायद केवल सही ढंग से जीने की प्रक्रिया नहीं है, वह अनुभव करने की एक यात्रा भी है। और अनुभव अक्सर वहीं जन्म लेते हैं जहाँ समझ अधूरी होती है। जहाँ व्यक्ति सब कुछ जानता नहीं, पर सब कुछ जानने की बेचैनी उसे नए प्रयोग के लिए प्रेरित करती,वही बेचैनी जीवन में नया रंग भरती है...
समझ एक प्रकार का ठहराव है। वह चीज़ों को परिभाषित करती है, सीमाएँ तय करती है, सही और गलत के बीच रेखा खींचती है। समझ आने के बाद जीवन में आश्चर्य कम हो जाते हैं... घटनाएँ चौंकाती नहीं, लोग हैरान नहीं करते, परिस्थितियाँ पूरी तरह अपरिचित नहीं लगतीं। यह स्थिति आरामदेह है, थोड़ी अनुकूल है... पर क्या यही जीवन की संपूर्णता है?
दूसरी ओर, प्रतिकूलता जीवन को असुविधाजनक बनाती है, पर वही असुविधा व्यक्ति को भीतर तक झकझोरती है। वह सोचने को मजबूर करती है, प्रश्न खड़े करती है, आत्मसंवाद को जन्म देती है। जीवन के कई मौलिक विचार किसी सुसज्जित वातावरण में नहीं, बल्कि असहज स्थितियों में जन्म लेते हैं। जहाँ सब कुछ ठीक चल रहा हो, वहाँ सोच अक्सर ठहर जाती है...सब कुछ ठीक न होना सोच की गतिशीलता के लिए लाज़मी है...

पर,यहाँ एक सूक्ष्म भ्रम भी है...सोच का एक अजीब सा फरेब...प्रतिकूलता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। हर कष्ट गहराई नहीं देता, हर संघर्ष दृष्टि नहीं देता। कई बार प्रतिकूलता केवल थकान छोड़ जाती है। इसलिए यह मान लेना कि अनूठापन केवल कठिनाइयों से ही पैदा होता है, उतना ही एकांगी है जितना यह मान लेना कि समझ से सब कुछ सुधर जाता है।

असली खेल उम्र का है.. हर उम्र की अपनी एक अंतर्धारा होती है। कुछ अनुभव यदि बहुत जल्दी आ जाएँ, तो वे बोझ बन जाते हैं। और कुछ समझें यदि बहुत देर से आएँ, तो वे पछतावे का कारण बनती हैं। इसलिए समस्या यह नहीं है कि समझ कब आई, समस्या यह है कि वह उस उम्र के साथ कितनी संगत थी....
युवावस्था में यदि जीवन बहुत अधिक स्पष्ट हो जाए, तो संभव है कि वह जिया कम जाए और संभाला अधिक जाए...और सम्भतः जीवन के प्रति एक अरुचिपूर्ण निराशा का भाव उत्पन्न हो जाये... वहीं यदि जीवन बहुत देर तक केवल प्रयोग बनकर रह जाए, तो एक समय के बाद भीतर एक रिक्तता उभरने लगती है... ऐसा लगता है कि बहुत कुछ घटा, पर कुछ भी ठीक से आत्मसात नहीं हुआ...कुछ खाली-खाली सा है...

आज का तकनीकी समय इस द्वंद्व को और तीखा कर देता है। जानकारी आसानी से उपलब्ध है, विचार तैयार अवस्था में मिल जाते हैं। समझ अब अनुभव से पहले आ जाती है। व्यक्ति जान तो लेता,समझ तो लेता है, पर जी नहीं पाता...शब्द तो मिल जाते हैं, पर उनके पीछे की खामोशी नहीं...बेचैनी नहीं...पाने की कसक नहीं...

पुरानी पीढ़ियों के पास अनुभव था, पर विकल्प सीमित थे। नई पीढ़ी के पास विकल्प हैं, पर अनुभव अधूरे हैं। एक के पास ठहराव था, दूसरे के पास गति है। दोनों में ही कुछ कमी है। जीवन शायद इन दोनों के बीच कहीं अपना संतुलन खोजता है...क्योंकि  जीवन न तो चमचमाती सड़को पर भागती कार है और न ही किसी ट्रैफिक जाम में घण्टों फंसी गाड़ी....असल में, जीवन दो खम्बों के बीच बंधी रस्सी पर चलना है...न अधिक गतिशीलता और न ही पूर्ण ठहराव...

संतुलन ही जीवन का सत्य है...न तो समझ को अंतिम सत्य  बनाया जाए और न ही रोज नए प्रयोग को सफलता की कसौटी...
अनूठापन तब पैदा होता है जब व्यक्ति पूरी तरह तैयार नहीं होता, पर पूरी तरह अनजान भी नहीं होता...जब भीतर कुछ स्पष्ट होता है और कुछ धुँधला सा....वही हल्का सा धुँधलापन खोज को जन्म देता है, और  स्पष्टता टूटने से,बिखरने से बचाती है...
शायद परिपक्वता का अर्थ यही है कि जीवन को न तो पूरी तरह समझ लेने की हड़बड़ी हो, और न ही समझ से बचते रहने की जिद...उम्र की कशिश तभी बनी रहती है जब हम हर पड़ाव पर थोड़े अधूरे बने रहते हैं... अधूरा होना विफलता नहीं,प्रगतिशीलता का प्रमाण है...और तब यह चिंता भी धीरे-धीरे शांत हो जाती है कि समझ देर से आई या जल्दी...
क्योंकि तब यह एहसास गहरा होता है कि जो समझ आई, वह उसी समय आई जब जीवन उसे समझ के आत्मसात कर पाने की स्थिति में था.... इसलिए, जो होता है...जब होता है...जैसे होता है...वो होना ही होता है...

प्रभाकर कुमार 'माचवे'

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