डिजिटल भीड़ - लोकतंत्र की नई चुनौती

कभी-कभी लगता है कि आज की युवा पीढ़ी क्रांति को बस एक फूहड़ मजाक बनाकर रख दी है...कैमरे के सामने चीख-चीखकर बेतुके तर्कों से किसी एक पक्ष को दिखलाना ही उन्हें नायक घोषित  कर देता..आज शोर को साहस समझ लिया गया है और अपमान को जागरूकता... यही वह जगह है जहाँ से डिजिटल भीड़ जन्म लेती है।

डिजिटल भीड़ वह है जो प्रश्न कम और प्रदर्शन अधिक करती है। जो पद को व्यक्ति से अलग करके देखने की समझ नहीं रखती। जो किसी अधिकारी या शिक्षक को कैमरे के सामने कठघरे में खड़ा कर स्वयं को जननायक घोषित कर देती है। यह भीड़ मानती है कि जितनी ऊँची आवाज़, उतनी बड़ी सच्चाई...

पर इतिहास गवाह है, सच्चाई का स्वर प्रायः धीमा होता है, पर स्थायी होता है...

हमारे स्वतंत्रता संग्राम की परंपरा में इसके अनेकों उदाहरण मिलते हैं।महात्मा गांधी ने साम्राज्य को चुनौती दी, उनके स्वर में गाली नहीं, आग्रह था। वे जानते थे कि व्यवस्था से लड़ते हुए भी मनुष्यता को नहीं खोना है। संघर्ष उनके लिए तप था, तमाशा नहीं...

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने व्यवस्था की कठोर आलोचना की, पर वे भीड़ के भरोसे नहीं चले... उन्होंने पुस्तकें पढ़ीं, तर्क गढ़े, कानून बनाए...उन्होंने अपने गुस्से को संवैधानिक अधिकार के रूप में अगली पीढ़ी को भरोसा दिया, अगर वे चाहते तो आक्रोश को आग बना सकते थे, पर उन्होंने उसे दीपक बनाया जो आज भी रोशनी दे रहा है।

और भगत सिंह, जिनका नाम आज बड़ी आसानी से ले लिया जाता है, वे केवल जोश का प्रतीक नहीं थे, वे वैचारिक क्रांति के नायक थे...वे पढ़ते थे, लिखते थे, सोचते थे। उनका विद्रोह कैमरे के लिए नहीं, चेतना के लिए था...वे जानते थे कि क्रांति का अर्थ अराजकता नहीं, परिवर्तन है...

आज की डिजिटल भीड़ इन प्रतीकों को आधा पढ़ती है और इनका मनचाहा उपयोग करती है। कुछ युवक पद का अपमान करते हैं, मानो वे किसी विदेशी सत्ता से लड़ रहे हों। शिक्षक को घेर लेना, अधिकारी पर चिल्ला देना, वीडियो को संपादित कर वायरल कर देना, और फिर उसे शिक्षा की शक्ति कहना निरी मूर्खता है...यह शिक्षा की शक्ति नहीं, कैमरे की शक्ति है...और इसके निकट भविष्य में बहुत ही नकारात्मक प्रभाव होंगे...

सच यह है कि हमारे समाज में समस्याएँ हैं...कहीं विद्यालय पढ़ाई से अधिक औपचारिकता बन गए हैं, कहीं योजनाओं में गड़बड़ी है... इन प्रश्नों को उठाया जाना चाहिए। पर प्रश्न उठाने का भी एक संस्कार होता है। लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं, मर्यादाओं का भी नाम है। यदि हर असंतोष कैमरे के सामने चीख में बदल जाएगा, तो संवाद की जगह अविश्वास ले लेगा..और इससे समाधान नहीं सिर्फ अराजकता फैलेगी...

ग्रामीण भारत अभी भी सम्मान की नींव पर खड़ा है। वहाँ सार्वजनिक अपमान आग की तरह फैलता है। यदि युवा पीढ़ी अपमान को क्रांति समझने लगेगी, तो कल वही संस्कृति परिवारों और समाज में भी उतर आएगी। तब कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं होगा; हर कोई अपने कैमरे का न्यायाधीश बन जाएगा...और व्यवस्था पूरी तरह अव्यवस्थित हो जाएगी...

वायरल होना सफलता नहीं है...वह बस कुछ क्षणों की चमक है, जैसे अँधेरे में जुगनू की रोशनी... स्थायी प्रकाश दीपक देता है, जो धीमे-धीमे जलता है और निरंतर उजाला करता है। हमें तय करना है कि हमें जुगनू बनना है या दीपक...

युवाओं से मेरा विनम्र आग्रह है, आदर्श चुनते समय सावधान रहिए... जो केवल ध्यान आकर्षित करने के लिए मर्यादाएँ तोड़ते हैं, वे आपके भविष्य के मार्गदर्शक नहीं हो सकते... सच्चा साहस संयम में है, सच्ची शिक्षा शालीनता में है, और सच्ची क्रांति चरित्र में है...

लोकतंत्र की रक्षा तलवार से नहीं, संस्कार से होती है। यदि डिजिटल भीड़ हमारे संस्कारों पर हावी हो गई, तो हम स्वतंत्र होकर भी भीतर से असभ्य हो जाएँगे। इसलिए आवश्यक है कि हम शोर से अधिक स्वर को महत्व दें, प्रदर्शन से अधिक प्रक्रिया को, और भीड़ से अधिक विचार को...तभी हमारा लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा और हमारी युवा शक्ति सही दिशा पाएगी...

प्रभाकर कुमार  'माचवे'

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