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एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट -5

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हर बीतते समय के साथ, रोहित का प्रेम बढ़ता ही जा रहा था...एक दिन रोहित अपने स्कूल के कैम्पस पार्क में यूं ही बैठा कुछ लिख रहा था,तभी उसके पास काव्या आकर बैठती है...रोहित अपने लिखने में खोया था,उसे पता नहीं चला कि कोई उसके बगल में यूं बैठी...रोहित उस वक़्त अपनी माँ को चिट्ठी लिख रहा था,ये उसकी बचपन की आदत थी...अपने मन की बातें वो चिट्ठी में माँ को लिखकर अपने एक छोटे से लकड़ी के बक्से में डाल देता था...  जब वो चिट्ठी लिख चुका तो उसका ध्यान काव्या पर जाता है,वो थोड़ा सा सकपका जाता...  काव्या बड़ी सहजता से कहती कि रोहित,तुम आज के जमाने में भी चिट्ठी लिखते हो ! रोहित कहता है,हाँ... मुझे चिट्ठी लिखना बड़ा पसन्द है,अपने दिल की बात को सच्चाई के साथ हम ख़त में ही लिख सकते हैं... काव्या मन ही मन खुश होती है,उसे भी बचपन से चिट्ठी लिखना बड़ा पसन्द है,मगर ये बात वो रोहित को उस वक़्त नहीं बताती... काव्या रोहित की सादगी,उसकी मासूमियत और भोलेपन से बहुत प्रभावित थी,मगर वो ये नहीं जानती थी कि रोहित उससे इस कदर बेतहाशा प्यार करता है... दोनों में आपस में बातचीत शुरू हो गयी,काव्या से बात करके रो...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-4

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 रोहित के दिलोदिमाग पर पूरी तरह काव्या का कब्जा हो गया था,उसके भीतर संवेदनशीलता थोड़ी बढ़ गयी थी...अब वो गार्डेन में फूलों को बड़ी देर तक निहारने लगा था...सुबह सवेरे उठकर टहलने लगा था...उसकी आँखों मे एक अज़ीब सी चमक आ गयी थी...बातों में शालीनता... सच में, प्रेम होता ही ऐसा...आदमी को पूरी तरह जीवंत कर देता..  अब वो बेवजह मुस्कुराने लगा था...अकेले में अपने आप से बतियाने लगा था... उगता हुआ सूरज और डूबते हुए सूरज को देखना उसे और भी अच्छा लगने लगा था...और रोज रात को घण्टों अपनी माँ से बाते किया करता था...अपने दिन भर की सारी कहानी उनसे बेझिझक सुनाता...  माँ जो भले उससे बहुत दूर थी...उन तारों के बीच...मगर,बचपन से वो ही रोहित की सबसे अच्छी सहेली थी...जिनसे वो अपनी हर बात कर लेता था...  रोहित के दोस्तों और उसकी मासी को रोहित का यह बदला बदला अंदाज़ साफ दिख रहा था,मगर उन्हें लग रहा था इसकी वजह नया कॉलेज है...लेकिन,रोहित समझ पा रहा था इसकी वजह कॉलेज नहीं बल्कि कॉलेज में पढ़ने वाली वो लड़की काव्या है....  कॉलेज के कुछ दिन यूँ ही बीत गए,धीरे-धीरे रोहित का प्रेम रूहानी हो...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट -3

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 सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसका ध्यान सीधे घड़ी पर गयी,घड़ी में 7:30 हो गए थे...8:30 वाली उसे बस पकड़नी थी,वो झटपट उठा और तैयार होकर निकलने को हुआ...लेकिन,वो आज बार-बार खुद को आईने में देख रहा था...एक दबी-दबी सी मुस्कान..उसके चेहरे पर बार-बार आ रही थी... कुछ ऐसा ही होता है,जब हम किसी खास से मिलने जा रहे होते हैं...असल में,कॉलेज जाने की पहली बस पकड़ने की यह जल्दबाज़ी की वजह कॉलेज जाना नहीं काव्या को देखना था... बस स्टैंड पर 8:20 में ही पहुंचकर रोहित बार-बार कभी घड़ी देखता तो कभी अपने आस-पास... समय इतना धीमा क्यों चल रहा...घड़ी की सेकंड की सुई इतनी धीरे-धीरे क्यों घूम रही...बस,आज इतनी देर से क्यों आ रही...ये तमाम सवाल पता नहीं क्यों,आज उसके दिमाग में कौंध रहे थे... इस 8-10 मिनट उसे सदियों सी लग रही थी,तभी बस आ गयी...रोहित झट से उस पर चढ़ गया...और एक खिड़की वाली सीट पर बैठ गया...और हर दूसरे मिनट पर खिड़की से बाहर उचक-उचककर देखता ! आज जीवन में पहली बार उसे ऐसा लग रहा था कि बस कितनी धीमी चलती है... तभी,वो बस स्टैंड आ गया...जिसका उसे पिछली रात से ही इंतेज़ार था...मगर, ये क्या ? जिसका इं...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-2

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रोहित ने उससे ज्यादा सवाल करना मुनासिब नहीं समझा...मगर,पहली ही मुलाकात में रोहित पर उस लड़की का जादू चढ़ गया था...और आज वो कुछ ज्यादा ही खुश दिख रहा था... तभी उस लड़की की सहेली आयी और उनदोनों ने एक-दूसरे को गुलाब देकर गले लगाया रोहित ने जब देखा गुलाब अपनी सहेली को दिया जा रहा...पता नहीं,उसे एक शुकुन का एहसास हुआ और दिल में सम्भावना की एक जोर सी घण्टी बजी... ज़िन्दगी में पहली बार रोहित को ऐसा एहसास हो रहा था,वो हड़बड़ाना नहीं चाह रहा था...इतने वर्षों तक कोई भी लड़की उसे इतनी अच्छी नहीं लगी थी,मगर इस लड़की में जरूर कुछ खास था...ऐसा लग रहा था कि इसके साथ कुछ न कुछ जनमों का नाता है...मगर,अफ़सोस वो अब तक उसका नाम तक नहीं जान पाया था... तभी, बस ठीक हो गया...और सभी उस बस पर चढ़ गए...बस पर काफी भीड़ होने की वजह से रोहित को जगह नहीं मिल पाई,उसकी सीट पर एक बूढ़े व्यक्ति बैठ गए थे, जिन्हें उठाना रोहित को ठीक नहीं लगा... रोहित खड़े होकर बार-बार उस लड़की को चोरी की निगाहों से देखता आ रहा था,उसकी खिलखिलाती हँसी और हँसी के साथ गालों पर बनने वाले डिंपल पर तो रोहित का दिल एक नहीं कई बार आने लगा था... मन ...

एक अनूठी प्रेम कहानी पार्ट-1

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अनजानी राहों पर एक अज़नबी से मुलाकात हो गयी...फिर क्या था ? थोड़ी बात हुई,बातों ही बातों में दिल को करार आ गया...एक-दूजे को एक-दूजे पर प्यार आ गया... रोहित का आज कॉलेज का पहला दिन था,जिस बस से वो कॉलेज जा रहा था वो एकाएक खराब हो गयी। और, कम्बक्त बेमौसम बरसात ने भी उसके मूड को थोड़ा ज्यादा ही खराब कर दिया...एक तो कॉलेज जाने की जल्दी और दूसरा ये रुकावट... खींझकर वो बस से नीचे उतरा और वहीं बस स्टैंड पर खड़ी एक प्यारी सी लड़की को देखकर ठिठक सा गया,जिसके हाथों में एक गुलाब का फूल था और उसके आंखों में किसी के लिए बेकरारी भरी इंतज़ार...बार-बार उसका इधर-उधर देखना इस बात की गवाही दे रहा था कि किसी न किसी का वो इंतेज़ार कर रही...तभी उसकी भी निगाह स्मार्ट सा दिखने वाले रोहित पर ठहर गयी...रोहित था ही इतना चार्मिंग,स्कूल लाइफ में कई लड़कियों का क्रश...एकदम मासूम सा... क्यूट, चॉकलेटी बॉय... लड़की अपनी क्रीम कलर की साड़ी जिस पर फूल के छाप थे,एक दम फूल की जैसी खिली दिख रही थी...बालों में लगे गजरे से आ रही भीनी खुशबू से रोहित उसकी ओर खींचा चला गया और बारिश से भींगने से बचने के लिए वहीं उसके बगल में...

क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ ?

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क्या मैं जिम्मेदार हूँ ? बड़ा चालबाज है हमारा मन,अपने पक्ष में तर्क गढ़कर खुद को निर्दोष साबित करने में इसे महारत हासिल हो गई है । अगर काम मनमाफिक पूरा हो जाए तो बड़े गर्व के साथ यह उद्घोषणा करता है कि मैंने किया है और सारा श्रेय लेने में कोई संकोच नहीं करता है । वहीं यदि नतीजा उल्टा निकल जाए तो बड़े तथ्यों के साथ हमारा मन इज साबित कर देता है ,कि मैं तो बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हूं...  और कोई नहीं मिलता जिस पर गलती की जिम्मेदारी डाली जाए तो ऊपर तो एक बुद्धू बैठा ही है जिसे हम बड़ी दृढ़ता से उसकी मर्जी का नाम दे देते हैं...  एक बात तो स्पष्टता से मनाना होगा कि आज मैं जैसा भी हूं इसके लिए मैं ही पूरी तरह से जिम्मेदार हूं । यह स्वीकार करते ही 'कल कैसा होना चाहिए' यह सपने देखने का मुझे अधिकार है । हम सभी अपने जीवन की योजना बनाने का काम खुद करने लगे हैं,जो हमारे दुख का एक बड़ा कारण है। जीवन की योजना बनाने का काम हमें ईश्वर या प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए, हमें बस उसके द्वारा निर्मित योजना को पूरा करने के लिए कर्म को ही अपना धर्म मानना चाहिए ।  यकीन मानिए... अपने मूल ...

जिस बात से डरते थे,वही बात हो गयी...

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जिस बात से डरते थे,वही बात हो गई !  जीवन का गणित बड़ा विलक्षण है यह बड़े ही रोचक तरीके से काम करता है। आप जिन घटनाओं से बचना चाहेंगे और बचने की चाह में बार-बार उसी के बारे में सोचने लगेंगे यकीन मानिए वह होकर रहेगा। इसे एक उदाहरण से समझते हैं...  आप साइकिल चलाते हुए बड़े ही खुशमिजाजी से जा रहे हैं तभी रास्ते के गड्ढे पर आपकी निगाह पड़ी और आपने सोचा कहीं मैं इस गड्ढे में ना चला जाऊं !  आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 12 फीट चौड़ी सड़क में महज एक फीट चौड़ा गड्ढा आपके अवचेतन को इतना आकर्षित कर लेगा कि आप गड्ढे में गिरेंगे...  मन जो बात को नहीं चाहता वही होकर रहता है .. जीवन में यदि कुछ प्रतिकूल हो रहा है और इसके लिए यदि आपने ग्रहों और नक्षत्रों  को ठीक करने का प्रयास शुरू कर दिए तो यकीन मानिए संभवत ग्रह व नक्षत्र अपनी चाल से सही चल रहे हो मगर वह आपके जहन में इतने हावी हो जाएंगे कि आपको अपनी हर प्रतिकूलता की वजह वही लगने लगेंगे और आप चिंता में इतना डूब जाएंगे की ग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर आपके मन के चक्कर लगाने लगेंगे...  "समस्याएं खुद-ब-खुद नहीं आती,अनजान...