श्रद्धा जैसा साथ चाहिए तो मनोज जैसी आग भी हो...
12th fail फ़िल्म ने एक बार फिर से हर प्रेमी को एक आदर्श प्रेमिका का स्वप्न दिखा दिया है...हर लड़का अपनी प्रेमिका के रूप श्रद्धा जैसी साथ निभाने वाली साथी की तलाश में लग गया है... मैं व्यक्तिगत तौर पर इस फ़िल्म को दूसरे नज़रिए से देख रहा...हो सकता है,मेरे इस नजरिए से मेरे पुरुष मित्र मंडली मुझसे खफ़ा हो जाये...लेकिन, सच को बेपरवाही से कहने में मुझे कोई संकोच नहीं...कोई भय नहीं...
मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि तुम्हारे भीतर मनोज जैसी आग है,तभी तुम श्रद्धा जैसा साथ पाने के हकदार हो...क्योंकि,प्रेम वही पाता जो हकदार हो...
यदि खुद के लिए कोई सपना देखे हो...तो तुम्हारे भीतर भी वही मनोज जैसा धैर्य,लगनशीलता और जिद होनी चाहिए...फ़िल्म में सिर्फ श्रद्धा की आदर्शता देखने वाले को ये नहीं भूलना चाहिए कि वो वही लड़की थी जिसके घर पहुंचने पर उसे बिना पानी पिएं लौटने के लिए कहा गया था...मनोज एक असफल प्रेमी की तरह दोस्तों के बीच आकर करुण क्रंदन नहीं कर रहा था, उसने अपने आंसू पोछें और अपनी सपने को सच करने में लग गया.... श्रद्धा जैसी लड़कियां आपके भीतर के मनोज जैसे आग को देखकर अपना सब कुछ समर्पित कर सकती है...और ये आग एक दो दिन की नहीं...जो सिर्फ भभकता हो...श्रद्धा लगभग दो-तीन साल से मनोज की इस आग की धधक को लगातार देखते आ रही थी...
ओ मेरे भरतवंशी...
यदि श्रद्धा सा साथ चाहते हो तो मनोज जैसी आग रखो...और प्रेम की याचना करना बंद कर दो,क्योंकि याचना करने से भीख मिलती है...प्रेम नहीं...प्रेमी बनो,भिखारी नहीं...तुम खुद को मनोज बना लो कोई न कोई श्रद्धा तुम्हारा हाथ जरूर थामेगी ...
प्रभाकर कुमार 'माचवे' की कलम से...
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