संदेश

जून, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता !

चित्र
मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता ! सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...                     जब कोई सरकार जनता की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो उसकी यह मौलिक जिम्मेवारी बनती है कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले उसे वो पब्लिक डोमेन में लाए,इससे उसके निरंकुश व्यवहार का अंदेशा कम होगा...  जिस तरह से सोशल मीडिया पर बिना किसी फ़िल्टर के सूचनाओं का बेतरतीब प्रवाह हो रहा उसमें यह बेहद जरूरी है कि किसी भी  ऐसी योजना को लागू करने से पूर्व केंद्र सरकार को राज्य सरकार और विपक्ष को भी समायोजित तरीके से अपने पक्ष में करने की कोशिश की जानी चाहिए... मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता ! सत्ता में काबिज़ एक पूर्ण बहुमत की सरकार को यदि ऐसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर सूचना, प्रबन्धन और समायोजन के स्तर पर उसकी सबसे बड़ी विफलता है...    ...

विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन !

चित्र
विपक्ष का हिंसा को मौन समर्थन ! आज पूरे देश में अग्निपथ योजना के विरोध में जिस तरह के हिंसात्मक रुख देखने को मिला है,उससे यह बात तो स्पष्ट है कि सेना में भर्ती के लिए इच्छुक युवा कभी भी देश की सम्पत्ति को जला नहीं सकता,और यदि वो ऐसे हिंसा को जायज मानता है तो निश्चित तौर पर उसके सेना में आने का कोई मतलब नहीं !                                       मैं मानता हूँ, एक अभ्यर्थी होने के नाते इस नई योजना के प्रति सन्देह होना स्वाभाविक है,सवाल किए जाने चाहिए...यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है...किन्तु, जिस प्रायोजित तरीके से इसे हिंसात्मक रूप दिया गया है वो निश्चित तौर पर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करता है...      देश के किसी भी शीर्षस्थ विपक्षी नेता का एक भी ट्वीट इस हिंसा के विरोध में न आना कहीं न कहीं उनके मौन समर्थन को रेखांकित करता है...                                        ...

लोकतंत्र में ऐसा विरोध कितना जायज !

चित्र
लोकतंत्र में विरोध का यह तरीका कितना जायज ! आज सुबह बिहार के लखीसराय स्टेशन पर खड़ी ट्रैन विक्रमशिला एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया...विरोध करने वाले लोग केंद्र सरकार के द्वारा जारी नई आर्मी भर्ती योजना "अग्निपथ" का विरोध कर रहे हैं... अग्निपथ योजना के प्रावधानों को लेकर अभ्यर्थियों में संशय की स्थिति है,महज़ 4 वर्ष की सेवा को लेकर भी कई तरह की बातें की जा रही है,कुछ लोग इसे आर्मी का निजीकरण करना कह रहे तो कोई इससे भी गम्भीर आरोप लगाते हुए विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया के चूल्हे में भारतीय युवाओं को झोंकने तक की योजना का नाम दे रहे... विरोध करने वाले में कई स्वर तो यह भी कह रहे कि यह मोदी सरकार की देश में साम्प्रदायिक माहौल तैयार करने की एक सुनियोजित योजना है...                       और मुझे लगता है, ये सारे सन्देह का उत्पन्न होना लोकतंत्र की जीवन्तता का प्रतीक है...लोकतंत्र में सत्ता का विरोध,उनकी नीतियों पर सवाल उठाना इसकी मौलिक प्रवृति है...और ये होना चाहिए... किन्तु,           ...

कबीर...एक फक्कड़

चित्र
कबीर...एक फक्कड़... समय की कसौटी पर परखा गया वो आदमी जिसने अपनी निडरता से, अपने बेख़ौफ़ अंदाज़ से, बेबाकी से पूरे समाज की दिशा व दशा को बदलने का साहस किया... कबीर...हिंदी साहित्य के जेम्स बांड है, जो काशी के चौराहे से हिन्दू संस्कृति की रूढ़िवादिता पर सीधा तंज कसने का जिगरा रखते हैं...पूरे देश में जिस वक्त मुस्लिम आक्रांताओं के भय से कोई घरों से निकलने का दुस्साहस नहीं करता था उस वक़्त जो मौलानाओं के भोरे के अज़ान को बहरे खुदा को सुनाने की बात कहने, का साहस शायद ही किसी और में हो... मैं जब भी कबीर को पढ़ता हूँ न...मेरे भीतर एक अज़ीब सी शक्ति का संचार हो जाता, एक निर्भीकता आ जाती... व्यक्तित्व में एक अलग ही फक्कड़पन आ जाता.... बुद्ध और महावीर का सन्यास भौतिकता की चरमता पर पहुंचकर हुई विरक्ति से पैदा हुआ है,किन्तु कबीर...एक ऐसा प्रबुद्ध पुरूष जो बिल्कुल ही सामान्य जुलाहे की ज़िंदगी जीकर ईश्वर के प्रति इतना गहरा अनुराग रखकर भौतिकता की तुच्छता का भान रखते हैं... कबीर आम आदमी का एक विश्वास है,कि परमानन्द को पाया जा सकता...बुद्ध और महावीर की प्रबुद्धता को देखकर तनिक संशय होती कि इतना तप,संय...

पत्थरबाज़ी का जुम्मा कनेक्शन !

चित्र
पत्थरबाज़ी का जुम्मा कनेक्शन ! नमस्ते दोस्तों ! ये हर 'शुक्रवार' को कोई ना कोई कांड धारावाहिक की तरह क्यों रिलीज़ हो रहा है भाई?  देश के अलग-अलग इलाकों में जुम्मे की नमाज़ के बाद पिछले 2-3 जुम्मे से  मुस्लिम अनुयायियों के द्वारा पत्थरबाजी और आक्रोशक जुलूस निकालें जा रहे हैं...इसके पीछे कभी किसी बीजेपी नेत्री के बयान का हवाला दिया जाता तो कभी पाकिस्तानी के पूर्व प्रधानमंत्री के मृत्यु के अफवाह का...मगर, मुझे इस पत्थरबाज़ी में जुम्मा कनेक्शन दिख रहा है..  आज, रांची के ही मामले को लें, तो नमाज़ पढ़कर लौट रहे लोग एकाएक बिना किसी पूर्व सूचना के पथरबाज़ी करते हुए किसी जुलूस का हिस्सा कैसे बन जाते हैं,कौन सी ऐसी एकात्मक संगठन है जो इन्हें इतनी जल्दी एकजुट कर सकती ! पिछले सप्ताह भी कानपुर में नमाज़ पढ़कर आने के बाद,एकाएक इतनी बड़ी संख्या में लोग जुलूस का हिस्सा बनकर पथरबाज़ी कैसे करने लगें ! क्या मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ के बाद इन्हें कोई सूचना दी जाती है ? क्या कोई अलगाववादी ताकत इनके भावनाओं को भड़काकर देश के माहौल को बिगाड़ना चाह रही है ? वोट के धार्मिक ध्रुवीकरण क...